Saturday, 4 March 2023

दरवेशों को भी इल्मे ग़ैब होता है।

अज़ीज़ नाज़रीन, 

आज का मुद्दा इल्मे ग़ैब से निस्बत रखता है। क़ादियानी फ़िर्क़ा का यहूदी एजेंट जॉर्जिस बोलता है की रसूले अरबी को इल्मे ग़ैब नहीं था।  साथ वोह संघी और यहूद की पैरोकारी करते हुए हज़रते आयेशा सिद्दीक़ा और नबी सल्लम के अज़वाजी रिश्ते में आई कशीदगी को दलील बनाता है।  ऐसा ही तो संघी दहशत और यहूद बोलतें हैं और हज़रते आयेशा और नबी के अज़वाजी रिश्ते का मज़ाक़ बनातें हैं मुँह से अदना दर्जे की ग़लाज़त निकालतें हैं।  यही जॉर्जिस बोल रहा है जब हज़रते आयेशा पर तोहमत तराशी की गयी तो नबी सल्लम ने आप हज़रते आयेशा से मुँह फेर कर मुख़्तलिफ़ जानिब देखने लगे।  अगर उनको इल्म होता तो फ़ौरन मक्कारों को जवाब दे देतें की तुम झूठे हो आयेशा पाक हैं।  इस जॉर्जिस और संघी यहूद दहशत की बातों में मुमासलत है बस फ़र्क़ इतना है की संघी और यहूद बरजस्ता गलीज़ बात मुँह से करतें हैं और इस जॉर्जिस ने वही बात अदब के दायरे में की लेकिन लुब्ब-ए-लुबाब तो वही था नबी की अज़मत कम करना, नबी को भरे बाज़ार इस्तग़फिरउल्लाह सुम्मा इस्तग़फिरउल्लाह ज़लील करना रूसवा करना।

दूसरा है तौसीफ रहमानी जो नबी के मेराज को ख़्वाब ख़याल बोलता है।  उस मेराज का मज़ाक़ बनाता है।जो लोग नबी की मेराज को हक़ीक़ी बोलतें हैं नबी सल्लम ने जागती हुई आँखों से ख़ुदा का दीदार किया कुफ्र कर रहें हैं नबी पर बोहतान लगा रहें हैं।  अब ऐसी ही बातें तो क़ादियानी करतें हैं। 

तो इल्मे ग़ैब की निस्बत से क़ुरान वाज़े दर्स दे रहा है सूरे कहफ़ में रब तआला ने बनी इस्राएल के एक दरवेश का बयान किया है।  जिनके इल्म,  रूहानियत  और फ़लसफ़ों को देख कर मूसा अलैहे सलाम उनके हमराह हो गए ताके वोह भी कुछ उनकी सोहबत से सीख पाएं।  दरवेश ने कहा तुम मेरे साथ चल सकते हो लेकिन मेरे किसी भी अमल पर सवाल मत करना।  मूसा ने कहा आप मेरे को साबीरों में पायेगें। 

चुनाचे दोनों चले दरिया पार करने के लिए कश्ती ली जो बेहतरीन कश्ती थी और बेऐब थी।  दरवेश ने उस कश्ती को ऐब दार बना दिया थोड़ा सा तोड़ दिया।  मूसा अल्हे सलाम ने सवाल किया दरवेश ने जवाब दिया क्या मेने नहीं कहा था मेरे किसी भी अमल पर सवाल नहीं करोगे। 

जब कश्ती साहिल पर पहुंची तो क़स्बे के कुछ बच्चे खेल रहे थे दरवेश ने एक हसीन बच्चे को क़तल कर दिया।  आगे पहुंचे तो उन दरवेश ने एक गिरती हुए दिवार की मरम्मत कर दी और उसका कोई उज्र नहीं लिया।  बाद में उन तमाम बातों की हक़ीक़त उन दरवेश ने मूसा अलैहे सलाम पर ज़ाहिर की।  अगर दरवेश को इल्म ना होता तो जिस मासूम को क़तल किया जिसकी उम्र अभी खेलने की थी उसकी जवानी तक का अहवाल कैसे पता पड़ गया। 

दूसरी बात अगर मेराज महज़ ख़्वाब ख़याल होती तो क़ुरान में अल्लाह सूरे यूसुफ़ में जब ख़्वाब का ज़िक्र कर सकता है तो मेराज का ज़िक्र भी अल्लाह वैसा ही करता हमने हमारे बन्दे को ख़्वाब दिखाया।  बल्कि सूरह बनी इस्राएल में जो अलफ़ाज़ है वोह यह हैं की पाक है वोह ज़ात जो रात को अपने बन्दे को मस्जिदे हराम से मस्जिदे अक़्सा तक ले गया ताके हम उसे अपनी कुदरत और निशानियां दिखाए।    

अगर नबी सल्लम को इल्मे ग़ैब नहीं होता तो साहब किराम को क़यामत तक के अहवाल कैसे बयान कर दिए।   फलां बिन फलां में तुमको वहां मिलूँगा में तुमको होज़े कोसर पर मिलूँगा। 

नाज़रीन सहाफ़ी कोई बोहोत बड़ा आलिम या दीन दार नहीं है बदकार गुनाहगार है लेकिन जो भी बात तहरीर करता है इल्म फ़लसफ़ों और तहक़ीक़ की बुनयाद पर तहरीर करता है।  बा एक वक़्त एक से दो जगह पर किसी वली की मौजूदगी या फना और बक़ा पर भी कई सवाल उठते हैं।   Advo सईद फ़य्याज़ साहब है जो तनक़ीद का मरकज़ हैं।  और वलिओं, कश्फ़ करामात, फना बक़ा पर उनको यक़ीन नहीं।  दिलों के हाल जानने वाले को सईद फ़य्याज़ साहब शैतानी अमल बोलतें हैं।  वोह अपने शैतानों से काम करवा रा।   

नाज़रीन इस मुद्दे पर तवील तहक़ीक़ की है और बोहोत पुरानी बात नहीं हम जदीद लोग है तो जदीद बात करेगें।  नबी की ज़ात तो बोहोत आला है लेकिन उनकी नस्ल से एहले मुस्लिम में अभी भी कई ऐसे पोशीदा दरवेश हैं जो अभी तक ज़ाहिर नहीं हुए।  कुछ हक़ीक़ी बातों पर आप हज़रात की तवज्जो चाहूंगा। 

हमारे दादा पीर हज़रत मौलाना अब्दुल बारी रेहमतुल्लाह अल्हे, की बा एक वक़्त जगह ज़ाहिर होने की करामात रॉबिंसन ने अपनी किताबउलेमा ऑफ़ फिरंगी महलमें तहरीर की है।  साथ में उन पांच हज़रात की ज़ुबानी नक़ल कर किताब में तहरीर भी की है जिनके ऊपर वोह करामात ज़ाहिर हुई थी। 

यह क़िस्सा ब्रतानियाँ दौर का है, कुछ यूं हुआ १८ वी सदी का इख़्तेदाम होने को था।  अंग्रेज़ पहले ही क़ादयानी फ़िर्क़ा कायम कर चुके थे ताहम मज़ीद मुसलमानों की क़ुव्वत, ताक़त और जज़बा हुर्रियत को तोड़ने के लिए वहाबी फ़िर्क़ा का आगाज़ किया।  अब बेहेस होती बा एक वक़्त मुख़्तलिफ़ जगह नबी मौजूद हो ही नहीं सकते कैसे एक बन्दा एक से ज़ाइद जगह मौजूद हो सकता है वोह तो अल्लाह की सिफ़त है।  मौलाना साहब ने ऐसे अफ़राद को धर पकड़ा, हज़रत फिरंगी महल की नीचले सेहन में तशरीफ़ फ़ार्मा थे आपने पाँचों को एक वक़्त पर मुख्तलफ़ जगह पर भेजा।  तो पाँचों ने क्या देखा की हर उस मुक़ाम पर उनकी मुलाक़ात मौलाना बारी से हुई है और मुख़्तलिफ़ पैरहन में हुई।  जब पांचो फिरंगी महल आये तो आप मौलाना साहब उसी जगह तशरीफ़ फ़ार्मा थे दुसरे कपड़ों में।   फिर उनसे जो गुफ्तगू हुई थी उसके बारे में भी मौलाना साहब ने बताया। 

दूसरा क़िस्सा हज़रत अब्दुल रज़्ज़ाक़ रेहमतुल्लाह अलैहे बांसा शरीफ़ सूबा शुमाल आप हज़रत अब्दुल रज़्ज़ाक़ अला रेहमा और नबी सल्लम की एक जैसी सिफ़त थी।  अब मदरसों के तालिबे इल्मों में बहस छिड़ गयी नबी नूर थे या बशरी उमूर और आप नबी सल्लम के बदने अतहर से कपड़ा निकल जाता था।  कुछ तालिबे इल्म इस बात पर बहस कर रहे थे।  हज़रत अब्दुल रज़्ज़ाक़ रेहमतुल्लाह ने सुना तो बोले अरे नबी की ज़ात तो बोहोत आला है अभी भी उनके ग़ुलामों के ग़ुलामों में वोह सिफ़त मौजूद है। 

चलो मुझे एक रस्से से बांधों तालिबों ने आपको एक पिलर से रस्से से बांधा आप रस्से की गिरफ़्त से बहार निकल आये।  कुछ बोले नहीं रस्से ढीली बंधी होगी आपने कहा फिर से बांधों।   इस बार मज़ीद मुस्तहेदी से बांधा गया और तहक़ीक़ कर ली की कहीं से रस्सी खुली या टूटी तो नहीं है आप फिर रस्सी की गिरफ़्त से बहार निकल आये। 

यही बात इस सहाफ़ी ने अपने हर मज़मून में कही है आज जो कुफ़्फ़ारों, मक्कारों की इतनी हिम्मत हो गई की नबी उसके बाद क़ुरान उसके बाद अल्लाह फिर नमाज़ सभी को तो रुस्वा कर रहें हैं।  जब्कि अगर किसी वली की शान में किसी काफ़िर ने गुस्ताखी की होती तो पहली ही फुर्सत में उसको माक़ूल जवाब दे दिया जाता तो इनकी हिम्मत नबी अल्लाह क़ुरान और नमाज़ तक पहुंच ही नहीं पाती।  

कियोंके हमने अभी तक हक़ीक़ी वली को ही नहीं पहचाना उसमे भी शक और शुकूक कर रहें हैं।  कोई भी वली अपनी मर्ज़ी का मालिक नहीं होता है उसको अल्लाह की जानिब से यह ओहदा और सनद मिलती है और उसकी करामात अगर ज़ाहिर हो रही है तो उसमे अल्लाह की मर्ज़ी शामिल हाल होती है, तभी तो ज़ाहिर हो रही है।  

हमने हक़ीक़ी वली या दरवेश की अज़मत नहीं की इसलिए संघी दहशत शिद्दत पसंद हिन्दू और यहूद की हिम्मत इतनी बढ़ गई के वोह नबी आले नबी अज़वाजे नबी की बेहुरमती करते हुए अर्शे मोअल्ला बारगाहे ख़ुदा वन्दी तक पहुंच गए। 

सहाफ़ी ज़ुबेर

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