अज़ीज़ नाज़रीन,
दौरे
मुनाफ़ेक़त, कुफ्र और साजिश में मुस्लिम अवाम को बोहोत ही मोहताद रह कर काम करने की ज़रुरत
है। जो दीनी इदारे हैं वोह किसी भी सूरत से
हुकूमत के ग़ुलाम ना बनें, ख़्वाहा वोह किसी भी मसलक और फ़िरक़े से हो। अगरचे बात इस्लाम, मुसलमानों की फलाह और हक़ की आ
जाए तो सभी मुस्लिम एक परचम के नीचे आ जाए हक़ का परचम। ना तिरंगा ना इरंगा मेरा परचम हक़ का।
इस ज़िम्न में मुस्लिम हक़तल्फ़ी से मुत्तलीक़ कुछ बातें आप हज़रात के रू बरू रखना चाहता हूँ। जब हिन्द में कोई भी ऐसा काम जो हुकूमत, फौज, जंग या खेल के मैदान में अक्सरियत अवाम के बूते की बात ना रहे तो मुस्लिम अवाम याद आतें हैं।
मुझे गुजिश्ता वर्ल्ड कप का फाइनल याद आ गया जिसमे कीवी के साथ खेलते हुए मोहम्मद समी को बहार रखा गया था। वहीँ पाकिस्तान के ख़िलाफ़ खिलाया गया था। नतीजा सामने आया पाक के ख़िलाफ़ भारत जीता था और कीवी के ख़िलाफ़ २४० तक नहीं बना पाया। मतलब मुस्लिम अवाम भारत के अक्सरियत अवाम के ग़ुलाम हैं। जब उनकी ज़रुरत पड़ेगी तभी बुलाया जाएगा उनका कोई ओहदा या एक मुक़ाम नहीं है। क्या मुस्लिम अवाम भारत में रोलिंग बॉल हैं। जिस किसी के समझ में आया उनको लात मार दी और जब खुद के ऊपर बात आई तो पुचकार लिया।
यही
हाल मोहम्मद समी का इस वर्ल्ड कप में हैं।
आया राम गया राम हैं। जिस तरह से जिस्म
की गंदगी सिर्फ उसी वक़्त ख़ारिज की जाती है जब जवानी चढ़ जाती है या कभी बाथरूम में बहा
दी जाती है वैसा ही हाल समी का है। अगर थोड़ी
सी भी अपने वेक़ार और इज़्ज़त के लिए जीता है समी तो हरगिज़ ऐसे वक़्त में भारत की टीम लिए
नहीं खेलेगा जब वोह मुसीबत में होगी। ऑस्ट्रेलिया
से खेलते वक़्त जब भारत की टीम तक़रीबन हार गई थी तब समी याद आया। और समी ने ना सिर्फ हेट ट्रिक ली बल्कि कप्तान को
भी मायूस नहीं किया और भारत को जीत दिलवा दी।
लेकिन अब समी को अपनी एहमियत दिखानी होगी।
अगर प्लेइंग ११ में नहीं तो जब ज़रुरत पड़ेगी तब भी नहीं।
मुसलमानों
को अपनी एहमियत दिखाना चाहिए सिर्फ वतन वतन के नाम पर नहीं बल्कि तुम्हारी क़ाबिलियत
के हिसाब से तुमको हर ओहदे पर फ़ाइज़ होने की ज़िद्द होना चाहिए। नहीं तो तुम नीचे लटकने वाले सिर्फ गोश्त का लोथड़ा
बन कर रह जाओगे। जब ज़रुरत होगी तुमको हाथ लगाया
जाएगा पुचकारा जाएगा जब ज़रुरत नहीं कपडे में लैपट कर रख दिया जाएगा।
नाज़रीन आपको ब्रिगेडियर उस्मान याद हैं। जब पाकिस्तानी फौज भारत में तबाही मचा रही थी। भारत के १२ फ़िज़ाई अड्डे तबाह कर पाकिस्तानी टैंक तेज़ी से भारत के अंदर दाख़िल हो रहे थे, तब ब्रिगेडियर उस्मान ने पाकिस्तान की धज्जिया उड़ा दी थी और तमाम टैंक अपनी कारगरदेगी और फौजी सलाहियत से तबाह कर दिए थे।
लेकिन
आज उस क़ुर्बानी का किया सिला मिला जिस मुस्लिम ब्रिगेडियर उस्मान का हिंदुस्तान की
फतह में अहम किरदार था उनकी नस्लों को ज़लील किया जाता हैं क़ुरान जलाये जातें हैं। मस्जिदों पर डाका डाला जाता है, ख़ानख़ाह मदरसों को
तोड़ा जाता है। और इन सब में सिर्फ हिन्दू दहशत
ही शामिल नहीं है बल्कि हुकूमत की जानिब से ऐसे कामों को अंजाम दिया जा रहा है।
जितने
भी मुस्लिम हैं ख़ेल के मैदान में या फौज में अगर उनको इस्तेमाल किया जा रहा है और सिर्फ
ज़रुरत के वक़्त ही याद किया जाता है बाक़ी वक़्त एक अछूत के जैसे दूर रखा जाता है बे यारो
मददगार तो अपनी एहमियत दिखाए और ऐसी हिकमत का हरगिज़ हिस्सा ना बने जब भारत को या किसी भी भारतीय टीम को तुम्हारी
ज़रुरत हो तभी तुमको याद किया जाए।
अगर
एक मुसलमान फुल टाइम काम पर है तो उसकी मुलाज़मत को भी लो लेकिन सिर्फ जब भारत, कुफ्र
मुसीबत में पड़ जाए तभी मुस्लिम अवाम को याद करोगे तो फिर हमको हिस्सा बराबर का चाहिए। अगर जंग है तो हमको ज़मीन का हाकिम बनाओ और ख़ेल है
तो प्लेइंग ११ में रखो।
आज
हिंदुस्तान में हुकूमत की सरपरस्ती में बेटिओं के सरों से हिजाब उतारा जा रहा है बेटों
को पढ़ाई से रोका जा रहा है। मुस्लिम रोज़गार,
घरों को बर्बाद किया जा रहा है। नौजवानों को
गोली मारी जाती है या जेल में डाल कर उनकी ज़िन्दगी बर्बाद की जा रही है। बेटियों के साथ ज़िना और गिरोह गर्दाना ज़िना करने
वालों को ना सिर्फ बाइज़्ज़त बरी किया जा रहा है बल्कि उनकी इज़्ज़त अफ़ज़ाई की जा रही है। वोह तो मोअज़्ज़ीब खानदान से हैं इसलिए छूट गए ऐसे
बयानात किया जलते हुए ज़ख़्म पर नमक रगड़ने जैसा नहीं है। सोचो
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