Thursday, 27 October 2022

क्रिकेट का खेल और हक़ीक़ी हालात।

 पाकिस्तान का मतलब क्या

ला इलाहा इल्ललाहा

तोसीह सरहद का मक़सद क्या

क़ानून शरिया नाफ़िज़ कर।

 । सहाफ़ी ज़ुबेर 

अज़ीज़ नाज़रीन,

गुजिश्ता एक हफ्ते जुमा २१ अक्टूबर से काफी मसरूफ रहा, चुनाचे किसी भी मुद्दे पर इज़हारे राये और मज़मून कुशाई नहीं कर सका सिवाए उन मुद्दों के जो उम्मत के लिए एहम थे।  ख़ास पाकिस्तान उसकी सियासत और माज़ी वज़ीरे आज़म मुजाहिद ख़ान साहब से मुताल्लिक़ मुद्दों पर ही मज़मून लिखे थे।बारहाल इस दरमियान पाकिस्तान और भारत के माबेन खेले गए क्रिकेट पर पाकिस्तान की शाकिस्त पर कोई मज़मून ना शाया करने पर अवाम के काफी रूझानात आये और उन्होंने इज़हारे तशवीश मेरी ख़ामोशी पर गुस्से को ज़ाहिर किया। 

नाज़रीन एक बात वाज़े कर देना चाहता हूँ यह सहाफी ना ही डरपोक है और ना ही किसी दहशत से ख़ौफ़ज़दा ख़्वाहा वोह काफिर हो, यहूद हो नसरानी या शैतानी।  बिंदास्त मुंबई और तमाम हिन्द बेरुन मुल्क घूमता अवामी हल्क़े में फिरता हूँ कही कोई ख़तरा नहीं।  अवामी आमदो रफ़्त लेता हूँ ताके कोई संघी यह इलज़ाम ना लगा दे की हम से डर गया या कोई उनका पैरोकार गुलाम मुनाफ़िक़ नो निहाद मुसलमान ऐसा ना बोल दे की बीजेपी का एजेंट है इसलिए इतना बिंदास्त है और इसके ऊपर कोई हिकमत नहीं होती।   

अब असल मुद्दे क्रिकेट मैच पर आतें हैं।  बरोज़ २३ अक्टूबर को खेला गया मैच एक बेईमान मैच बोल कर तारीख़ के सफों में दर्ज हुआ है। और जितना बवाल लंगूरों की टोली ने मचाया था उससे ज़ाहिर हो रहा था सच्चाई वोह नहीं जो दिखाई जा रही है।  वैसे भी ५ का अदद भारत को बोहोत भारी है और जिस रोज़ २३ तारीख को पाकिस्तान से मैच हुआ उस २३ तारीख को ३+२ किया जाए तो अदद ५ आतें हैं फिर उस रोज़ भारत हार गई थी लेकिन बेईमानी साजिश कर के जीत तो गए लेकिन उस जीत के नताइज भारी होने वाले हैं।  कियोंके बईमानी, साजिश, चीट, झूट और फरेब एक हद तक ही चलता है उसके बाद सब कुछ अवाम पर आशकार हो जाता है।  फिर मालिके मुतलक़ तो सब देख रहा है।  इस बईमानी का नेमूल बदल मालिके कायनात पाकिस्तान को बोहोत बेहतर देगा। 

दरअसल हर मोमीन का यह मानना अगर उसके साथ नाइंसाफी हुई उसकी हक़तल्फ़ी हुई और उसमे उसत और ताक़त है तो वोह अपना हक़ छीन ले या नहीं तो अल्लाह तबारक ताला से रूजू करे और उसको बताये की यहाँ हमारे साथ चीटिंग हुई और आप इसका बेहतर सिला देने वाले हैं। कियोंके आप से बेहतर इन्साफ करने वाला और कोई नहीं। फिर ख़ुद काफिरों के माज़ी किस्सों और हालात से ज़ाहिर होता है जिन्होंने चीट कर के जुव्वे में जीत हासिल की उनका क्या हाल हुआ।   कोरवों की अज़ीम फौज थी लेकिन चीटिंग बेईमानी के सबब उनका बेदर्द ख़ात्मा हुआ था।  वही हाल भारत में संघी दहशत का और भारत का होगा।  जिसका ज़िक्र मेने अपने १ अगस्त २०१९ को लिखे मज़मून "गज़वा ऐ हिन्द होगा और ज़रूर होगा" में साफ़ तोर से कर दिया है। 

उस मज़मून में भी क्रिकेट मैच और मुस्लिम हक़तल्फ़ी से मुत्तलीक़ बात को कहा गया है।  दूसरी बात अब मुद्दा क्रिकेट रह ही नहीं गया है अब तो वोह सरहदों की तोहसीह पर आ गया है।  तमाम शुमाल, शुमाली मध्य प्रदेश तक, आसाम, मग़रिबी बंगाल, शुमाली बिहार,  राजिस्थान का हल्क़ा, गुजरात, मग़रिबी साहिली महाराष्ट्र, केरला पाकिस्तान के सरहद तोहसीह का हिस्सा बना दो।  तभी उस बेईमानी का कफ़्फ़ारा पूरा होगा।  

उस चीटिंग और बेईमानी से जीते मैच पर बजाए तनक़ीद करने के और हकबयानी से बात को रखने के हू बहू महाभारत के किरदारों की तरह हर संघी का चेहरा नुमाया हो गया जिसने खेल और क्रिकेट को ज़लील कर दिया।  सुनील गावस्कर एक अज़ीम खिलाड़ी तक अपनी खेल जज़बात के बरक़्स बईमानी से जीते मैच में बजाये हक़ बयान करने के बच्चों की तरह रक़्स करने लगा था।  तो अब भारत के बच्चे भी ख़ूब हलाक हो रहें हैं।  नाचो पीटो सर को नोचों अपने बालों को।  गुनाह तो तुम कर बैठे अब कफ़्फ़ारे की बारी है।

लंगूर और लंगूरनिओं की टोली संघी हुड़दंगाईयों ने उधम मचा कर रख दिया था।  वैसे भी यह क़ाफ़िर गुंडे दिवाली, होली, गणपति, लव रात्रि में हुड़दंग मचाते हैं और दूसरों की नींद ख़राब करतें हैं।  हर रोज़ रात को १२ - १ बजे तक पटाखे फोड़ना चिल्लाना शोर मचाना अवाम को तकलीफ देना यह तो इनकी आदत है।  लखनऊ, पूना में इन हुड़दंगिओं ने पुलिस वाले पर हलमा बोल दिया उनको धो डाला।  इतने पर भी इन्तेज़ामियाँ बेदार नहीं हुई फिर जब लंगूर लँगूरनियों के गिरोह और अड्डे के गुंडे हुड़दंग मचाएं आतंक मचाएं पुलिस को मारे पीटें तो उनको सिर्फ हुड़दंगी बोला जाएगा यही कही अब्दुल का फ़रज़न्द सपड़ाई में आ जाता तो उसको आतंकी बना देते मीडिआ के गुलाम।  

नाज़रीन अल्लाह से रूजू करने का मतलब यह हर्गिज़ नहीं है की जद्दो जेहद नहीं करना चाहिए हर मुद्दे पर अपने हक़ के लिए लड़ना चाहिए ख़्वाह वोह जंग का मैदान हो या खेल का, बेहेस मुबाहिसा हो या कोई और मुक़ाबला अपना दिफ़ा पूरी क़ुव्वत और ताक़त से करना चाहिए बिल फ़र्ज़ अगर मोमीन जीत जाता या जीत के क़रीब था और उसको साजिश कर के चीट कर के बेईमानी से शाकिस्त दी तो अब अल्लाह से रूजू किया जाए और उसको बोला जाए ऐ हाकिमों के हाकिम ऐ तमाम कायनात के मालिके मुख्तार हमने ईमानदारी से अपने फ़र्ज़ को अंजाम दिया लेकिन दुश्मन ने बेईमानी की नाइंसाफी की चीट कर के हमको शाकिस्त दी और आप दुशमन की हर हिकमत का हर नाइंसाफी का हर बेईमानी का माक़ूल नेमुल बदल दीजिये तो बस हो गया सामने वाले दुश्मन का वाटोला।  कियोंके अल्लाह कभी भी बेईमानी, नाइंसाफी, धोखेबाज़ी, फ़रेब और झूट को पसंद नहीं करता।  फिर जो चीज़ अल्लाह पसंद नहीं करता और एक मोमीन के साथ वही हुआ तो दुश्मन का क़िला तबाह और बर्बाद हो जाएगा।   

नाज़रीन अगर मुक़ाबिल शैतानी ताक़त है तो अल्लाह के बारगुज़ीदा बन्दों और वालिओं से रूजू कीजिये उमरे फ़ारूक़, ग़ौसुल आज़म, गरीब नवाज़ या अपने कामिल मुर्शिद से।  कियोंके अल्लाह वादा ख़िलाफ़ी नहीं करता और शैतान को सुबह क़यामत या जब तक वोह क़तल नहीं कर दिया जाता तमाम क़ुव्वत और ताक़त दे रखी है और जहाँ अल्लाह ने शैतान को ताक़त दी है वहीँ अल्लाह के वालिओं को उसको अपने क़ाबू में करने की क़ुव्वत दे रखी है। 

ग़रीब नवाज़ के बोहोत से शैतानी अमलियात को क़ाबू में करने के और उस दौरे कुफ्रिया जादू के मरकज़ जगत पाल जोगी को शिकस्त देने मुसलमान बना कर अपने ग़ुलामों और मुरीदों में शामिल करने के एक नहीं बल्कि बोहोत से क़िस्से मौजूद हैं।  जिसकी शिनाख़्त अजमेर में आज भी हजर शजर सब करतें हैं।  आप ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की मौजूदा दौर में भी कई करामात ज़ाहिर हुई जिसके ऊपर कई मज़मून शाया किये जा चुके हैं। 

Zuber

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