अज़ीज़ नाज़रीन,
आज तीन मुद्दों को ले कर आप हज़रात के सामने पेशे ख़िदमत होने का शर्फ़ हासिल हुआ है।
१. सबसे अहम मुद्दा है भारत की माशी बदहाली। जिसके सबब अब हूकूमते हिन्द को अपने इख़राजात को पूरा करने के लिए मोदी (फ़क़ीर) को मिले तोहफे फ़रोख़्त और नीलाम करने पढ़ रहें हैं। गुजिश्ता दो सालों में मोदी को मिले तोहफों की ४ बार नीलामी की गई है। इस मर्तबा १३ से १७ अक्टूबर तक तोहफों की नीलामी रखी गई है। मिले जिन तोहफों की नीलामी हुई, उनमें बाबरपुर की राम मंदिर,, तस्वीरें, मुज्जसमे, लोक फन मरकबें, कपडे, शॉल, पगड़ी-टोपी, रस्मी शमशीरें और वाराणसी की काशी विश्वनाथ मंदिर की नक़ल किये हुए तोहफे शामिल हैं। इस साल १२०० से ज़्यादा तोहफों को नीलामी के लिए रखा गया था। जिनकी नीलामी की बुनयादी रक़म १०० रूपये से आगाज़ हो कर १० लाख रूपये तक रखी गई है।
२. मुद्दा है भारत में बढ़ती हुई बेरोज़गारी जिसके सबब तालीमी आफ़ता नौजवानों को अपना मुस्तक़बिल सियाह दिख रहा है। कियोंकी उमर तो बढ़ती ही चली है और हुकूमत की जानिब से ऐसा कोई फैसला नहीं हुआ है की ५० साल तक हूकूमती दफ्तरों में काम पर लग सकतें हैं। बेरोज़गारी इस क़दर अवाम पर हावी हो रही है की सूबे शुमाल में १५ से १६ अक्टूबर UPSSSC PET २०२२ के इम्तेहानात का आग़ाज़ हुआ, जिसमे ३७ लाख तुलबात ने हिस्सा लिया। जिसके चलते रेलवे स्टेशन पर तालिबे इल्मों और बेरोज़गारों का भारी हुजूम देखने को मिला। इस ज़िम्न में कई तालिबे इल्म ऐसे हैं जिनका रिज़र्वेशन या तो ऐ सी या सिलीपीर क्लास में था लेकिन हुजूम की वजह से वोह बोगी में चढ़ ही नहीं पाए। किसी ने ट्रैन का दरवाज़ा ही नहीं खोला। आलम यह हो गया की ट्रेनों में स्टूडेंट्स भेड़ बकरियों के जैसे ठूसे गए थे। कई तालिबे इल्मों ने इस बदनज़्मी और बढ़ती हुई बेरोज़गारी की वजह से सख़्त नाराज़गी का इज़हार किया है।
३. मुद्दा भारत में बढ़ती हुई भुकमरी, मुफ़लिसी और ग़ुरबत से है। आलमी भुकमरी फेहरिस्त में भारत की पस्ती और ज़वाल का सिलसिला चालू है। गुजिश्ता साल के मुक़ाबले भारत आलमी भुकमरी फेहरिस्त में मज़ीद पस्ती की जानिब चला गया है। इस साल भुकमरी फेहरिस्त में भारत १०७ पायदान पर रहा है उसका दर्जा जुनूबी एशिया मुमालिकों में अफ़ग़ानिस्तान से ही बेहतर है। गुजिश्ता साल भारत का यह दर्जा १०१ था।
मोदी जी, बीजेपी, संघी, शिद्दत पसंद हिन्दू लंगूर और लँगूरनियों ने अवाम के हाथ में कटोरा थमा दिया और उनको भिकारी बना दिया। लंगूर-लँगूरनियाँ अगर वक़्त रहते हुकूमत से सही और दुरुस्त मुद्दों पर सवाल करतें। अगर संघी, बीजेपी वाले शिद्दत पसंद हिन्दू बजाये हुकूमत की ग़लत हिकमते अमली पर उसका दिफ़ा करने के उससे सवाल करते तो हालात इतने कशीदा ना होते।
जब बदनामी और ज़लालत तेरा और तेरे वतन भारत का मुक़द्दर बन जायेगा लंगूर और लँगूरनिओं, खूब पाकिस्तान के वज़ीरे आज़म का मज़ाक़ बनाते थे। भैसें बेच कर पाकिस्तान का ख़र्चा चल रहा है। इमरान खान मेट्रो में घूम रहें हैं उनके पास पैसे नहीं हैं। अब मोदी जैसा ज़ालिम दरिंदा शैतान राक्षस अपने तोहफे बेच कर खर्चे पूरे कर रहा है भिकारी। भिकारी देश का फ़क़ीर हाकिम।
अब बताइएं भारत की मोदी जी ने क्या हालात कर दी। तोहफे नीलाम कर के हुकूमत चलाई रही है। तोहफे तो नायाब आशियात होतें हैं जो मरने के बाद भी अजायबखाने में रखे होतें हैं ताके आती दुनियां देख सके की फ़क़ीर को कितने क़ीमती तोहफे मिले थे। लेकिन फ़क़ीरी का वोह आलम हो गया के दाने दाने के लाले पड़े थे फ़ाक़े हो रहे थे तो बेच दिया अपने तोहफों को। यह कहाँ ले आये भारत को। लेकिन हिन्दू शिद्दत पसंदों ने, संघी दहशतगर्दों ने, बीजेपी वालों ने और लंगूर लँगूरनियों ने अवाम के दिलों दिमाग़ में ज़हर भरा था। बीजेपी को लाना है अब्दुल और उसके फ़रज़न्द को टाइट रखना है। चाहे कुछ भी कर लो आएगी तो बीजेपी ही। आ गयी बीजेपी और साथ लाई तबाही, बर्बादी, मुफ़लिसी, ग़ुरबत, तक़सीम।
इस जंग में अगर सबसे ज़्यादा नुक़सान किसी का हुआ है तो वोह है हिन्दू अवाम। जिन हिन्दू नौवजवानों की नौकरी थी वोह बेरोज़गार हो गए, नौकरी वक़्त पर नहीं मिलने से उमर रसीदा हो गए। जिनकी तिजारत थी वोह बर्बाद हो गए मुफ़लिस हो गए। हिन्दू नौजवान बेरोज़गारी से परेशान हैं तिजारती तब्क़ा माशी बदहाली से परेशान हैं। जहाँ तक अब्दुल के फ़रज़न्द का सवाल है उसके पास ना तालीम हैं और ना रोज़गार। जैसा पहले था वैसा ही रहा। क्या बोलते थे संघी पंचर बाज़।
दरअसल यह लंगूर-लँगूरनियाँ, बीजेपी वाले, संघी दहशतगर्द और शिद्दत पसंद काफिर २०१४ से पकिस्तान को अब्दुल के फ़रज़न्द को बर्बाद करने के चक्कर में लगे थे। कभी पाकिस्तान की जासूसी कभी अब्दुल की जासूसी। कुछ हाथ नहीं लगा बल्कि अपना खुद का मुस्तक़बिल तबाह कर बैठे। और खुद फ़क़ीर पर फ़क़ीर होते गए। वहीँ पाकिस्तान का रुपया दुनियां में सबसे तेज़ी से मज़बूत होने वाला रुपया है। और यह रिपोर्ट भी पाकिस्तान के ख़बरनानों की नहीं बल्कि भारत के टाइम्स ऑफ़ इंडिया के बिज़नेस टाइम्स की है। जो की एक संघी न्यूज़ पेपर है।
अब्दुल और उसके फ़रज़न्द के पास खोने को कुछ था ही नहीं तो वोह बर्बाद नहीं हुए बल्कि लेकिन असली बर्बादी तो हिन्दू अवाम की हुई है।
Zuber
No comments:
Post a Comment