Saturday, 8 October 2022

तमाम अहले नास को ईद ऐ मिलाद मुबारक।

(इस्लामिक हर मसलक के मौलानाओं दानिशवरों से गुज़ारिश है की मज़मून का पूरा मोतला करें।  और कुफ्र, बुतपरस्ती के मरकजों को इस्लामिक रियासतों से हटाने की हिकमत करें।   इस गुज़ारिश में संघी, बीजेपी से मुनसलिक मौलाना शामिल नहीं हैं)।  

अज़ीज़ नाज़रीन,

पुर नूर क़ल्बे सुरूर आमदे रसूल ख़ातमुन नबी अहमदे मुजतबा सरकारे दो आलम की आमद जश्ने मिलाद पर तमाम अहले इंसानियत, हवा, पानी, शजर, हजर, ज़मीन, जानवर अल गरज़ हर जानदार शै को मुबारक। 

नाज़रीन आज जो तमाम आलम में हालात चल पड़ें हैं फिर भी अगर मस्जिद की मिम्बर पर बैठ कर बड़ी बड़ी तक़रीरें करने वाले मौलाना उसको अपनी गफलत नहीं समझे तो फिर ऐसे ही मौलानाओं के लिए अल्लामा इक़बाल ने सख़्त तनक़ीद की है। 

नाज़रीन आज एक फ़िरक़ा ऐसा है जो हक़ीक़ी सूफ़ी, अल्लाह के वालिओं यहाँ तक नबी सल्लम से अज़हद कीना और बुग्ज़ का मुर्तकिब है।  हर मजलिस में हर महफ़िल में गाहे बगाहे उनको कहीं से भी नबी की सीरत पर बयान करते हुए इल्मे ग़ैब, जश्ने मिलादे रसूल और नबी की शाने रिसालत को ऊपर तनक़ीद करने की आरज़ू रहती है।   तमाम आलम में यहूद ऐसा करतें हैं नबी के हर मोजज़े का मज़ाक़ बनाना नबी की शान को कम करने के लिए ऊल जलूल बकवास करना।   हज़रते आयेशा और नबी की अज़वाजी ज़िन्दगी पर तनक़ीद करना।  और यही हरकत  हिन्द में हर शिद्दत पसंद काफिर, हर संघी हर बीजपी वाला करता है। 

ऐसे ही बयानात तमाम आलम में कुछ ऐसे लोग हैं जो अपने आपको मौलाना और इस्लामिक स्कॉलर कहलाने की शौक़ीन होतें हैं वोह भी करतें हैं।  नबी की शान को कमतर कर के बयान करना।  इल्मे ग़ैब पर कुछ अलग ही फलसफा होना।  सरकार की आमद पर तनक़ीद करना, नबी को बशरी उमूर के साथ मुखातिब करना।  हज़रते आयेशा पर मुनाफिके मक्का की तोहमत लगाने वाले की ताईद करना।  उसमे दिखाना यह होता है की नबी को इल्मे ग़ैब नहीं था।  अगर होता तो वोह तोहमत लगाने वाले को ही झूठा करार कर देतें।   बस फ़र्क़ इतना है की जो मौलाना की जमात है वोह इशारे किनारे में नबी की अज़मत को कम करतें हैं और यहूद, सऊद और संघी  यह लोग अदना दर्जे की बदज़ुबानी बोलतें हैं।

लेकिन अल्लाह ने दिखा दिया ढाई से तीन साल तक जो लोग नबी की मिलाद बनाने पर तनक़ीद करते थे उनको अपने हरम से दूर रखा और ना ही रोज़ा ऐ रसूल की दीदार बक्शी।  फिर ऐसे कई मौलाना हिन्द में गिरफ्तार हुए जिनका नज़रिया मुख़्तलिफ़ था।  मौलाना कलीम सिद्दीक़ी, मौलाना जरजिस अंसारी हफीजुल्लाह को गिरफ्तार किया गया और ज़ाकिर नाइक को हिन्द बदर किया गया।  क्या यह अल्लाह की मार नहीं है।  अल्लाह के वालिओं पर तनक़ीद उनके आस्तानों पर मखौल उड़ाना नबी की आमद और मिलाद पर तनक़ीद, तो हदीसे क़ुदसी के हिसाब से इनके साथ सही हुआ।      

नाज़रीन अल्लाह के सच्चे वालिओं के आस्ताने पर जाने को कुफ्र बोला जाता है तो अबू धाबी, दुबाई, क़तर, मस्क़त (ओमान), कुवैत में तो मंदिर तामीर हो चुके हैं।  कुफ्र हो रहा है।  अल्लाह के सच्चे वली के जिस्म को ना ही मट्टी छु सकती है और ना ही कोई जानवर उनके जिस्म को खा सकता है उनका जिस्म अपनी अपनी आरामगाह में ऐसे ही मेहफ़ूज़ है जैसे की उनकी हयाते ज़िन्दगी था।  लेकिन एक पत्थर को नसब कर के अरब वर्ल्ड में बुत परस्ती का आगाज़ किया गया और कोई मौलाना उस मुद्दे पर आवाज़ नहीं उठाता है।  कियोंके उनको हाकिम से ऐसा ना करने की सख़्त हिदायत होती है। आवाज़ उठाएंगे तो किस के खिलाफ अपने ही मज़हबी भाई के खिलाफ, अपने ही मज़हब के पेशवाओं और वालिओं के खिलाफ।  अगर किसी सच्चे वली की बात हो या करामात ज़ाहिर होने की बात हो तो इनकी फ़ौरन गैरत जाग जाएगी कुफ्र है शिर्क है बिदअत है सब गलत है किसी भी इंसान को मरने के बाद इतनी क़ुव्वत नहीं के वोह ऐसे काम को सर अंजाम दे जो दुनयावी उमूर से हट कर हो।  लेकिन बूत परस्ती पथ्तर पूजा मंदिर पर कोई आवाज़ नहीं उठाई जाएगी। 

यही है दज्जाल क़ादियानी सुहैब क़ासमी पहचानो इस काली भेड़ को उम्मत मे निफ़ाक़ डालने वाला इस्लाम के हर क़ानून पर तनक़ीद करने वाला यह मुनाफ़िक़ संघी आतंक और ज़ाफ़रानी कारिंदा है। और ऐसे मुनाफ़िक़ की हदीस और इस्लाम की गलत तशरीह पर ज़ाफ़रानी लँगूर और लँगूरनियाँ इसको इस्लामिक दानिशमंद और मौलाना बोलतें हैं।

हज़रते उम्र की सावाने उमरी बयान करतें हैं शिर्क और बिदअत पर बयान करतें हैं क़ब्रों की पूजा पर तनक़ीद करतें हैं तो हज़रते उम्र की जो खिलाफत थी खिलाफते राशेदा उसी खिलाफत में अब तो मंदिरों की तामीर हो गई।  और तुम वालिओं के मज़ारात की ज़ियारत ना करने के पीछे पड़े हो। 

नबी मुकर्रम के रोज़ाये अक़दस के सामने दुआ नहीं मांग सकते उनको सलात सलाम नहीं भेज सकते उनके रोज़े की जानिब हाथ नहीं उठा सकते लेकिन मंदिर बनवा सकतें हैं।  जबकि करोना वबा और हिन्द में मुस्लिम अवाम पर होने वाले तशद्दुत नबी की बेहुरमती के बाद तमाम अरब वर्ल्ड से ज़्यादातर हिन्दू निकाले जा चुके हैं फिर मंदिर किस के लिए तामीर किये गए।  कौन उन मंदिरों में जा कर बूत परस्ती करेगा शिर्क करेगा। 

जुमे की नमाज़ एक मस्जिद में अदा करने का शर्फ़ हासिल हुआ।  लेकिन मौलाना साहब का क़ुत्बा सुना कर बोहोत ही रंझ हुआ।  अपने मदनी भाइयों पर बोहतान लगाया ऐसी बाते ख़ुत्बे में बोली जो सरा सर झूट पर मब्नी थी।  बोलतें हैं की ईद मिलाद की ऐसी महफ़िल का क्या फायदा जिसमे आवारगी होती है हँसी ठिठोली होती है लड़के लड़कियों का रक्स होता है।  आगे बोलतें हैं मदनी महफिलों में क्या होता है ज़रा जा कर देखो मदनी निकाह जिसमे बरहना रक्स होता है डीजे बजता है नाच गाना होता है और उसको मदनी निकाह बोला जाता है।  यह सब बातें झूट है और तोहमत हैं।  मदनी महफिलों में नूर होता है दिल में एक अलग ही कैफियत होती है अल्लाह के फरिश्तों का नुज़ूल होता है।  रहा सवाल अगर नबी की मिलाद में कुछ भी नंगा नाच हो रहा होता या आवारगी हसी ठिठोली हो रही होती तो रब तआला क्या ऐसी महफिलों को या ऐसे मुनक़्क़िद करने वालों को माफ़ करता उनको दुनिया में ही सज़ा मिल जाती।  कियोंके हर मोमीन को उसके किये की सज़ा दुनिया में ही मिल जाती है आख़ेरत में वोह पाक साफ़ हो कर जाता है।  यह हमारा ईमान है। 

रियासते मदीना पर तनक़ीद।  हर हाल में उन मौलाना को हुकूमत की जानिब से तम्बी आई होगी।  या गिरफ्तारी की तलवार गर्दन पर टांग दी होगी।  यह मस्जिद के मौलाना तो एक अदना सी खाकी वर्दी से डर जातें हैं।  इनमे एक वली की तरह रूहानियत नहीं होती है जो अपनी करामात दिखा कर उस खाकी जानवर को ही अपना मुरीद बना ले, और दाखिले इस्लाम कर ले।  

दूसरी बात लगता है मौलाना साहब मदनी महफिलों में गए ही नहीं हैं।  सुनी सुनाई बातों पर यक़ीन कर लिया।  मदनी महफिलें मस्जिदों में मुनक़्क़िद की जाती हैं।  और पूरी तरह से हर नमाज़ का एहतेमाम होता है।  बिल फ़र्ज़ हमारे जैसा गुनाहगार उन महफिलों में आ जाए तो उस महफ़िल के सर्वे सर्वा उसको रूहानी पाक करतें हैं।  क्योंकि हर वली दिलों का चोर होता है उनको पहले ही इल्म हो जाता है की फलां बिन फलां यह गुनाह कर के आया है।  लेकिन अब इन संघी मौलानाओं को क्या कहिये जब इनको नबी के इल्मे ग़ैब पर ईमान नहीं तो एक मदनी बुज़ुर्ग के इल्म पर क्या यक़ीन होगा। 

रियासते मदीना जब क़ायम होगी तो वोह उन बुतपरस्त कुफ्र के मर्कज़ इस्लामिक रियासतों से कई गुना आला होगी जहाँ शराब खोरी, ख़िन्ज़ीर का गोश्त, फाहशी, हिंदी सिनिमा, डांस बार और मंदिरें आम हैं।  उस रियासते मदीना का ख़्वाब ईमानदार हुकूमत पर मब्नी होगा, जहाँ इन्साफ का निज़ाम होगा।  क़ानून की बालादस्ती होगी।  हाकिम हो या अवाम सब के लिए गुन्हा या जुर्म करने पर यकसां क़ानून होगा।  

Zuber

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