Tuesday, 20 September 2022

फ़तवे की हक़ीक़त।

मेरे अज़ीज़ बुज़ुर्गों और दोस्तों।

हज़रत जी मौलाना साद साहब की सवाने उमरी का मोताला कर रहा हूँ।  अगर आप हज़रात के पास मज़ीद मालूमात हो तो फ़राहम कीजिये।  नाज़रीन यह वही साद साहब हैं जिनके ख़िलाफ़ हिन्द के कुफ्र, दहशतगर्द और ज़ाफ़रानी मीडिया ने कोविद - १९ में  बदगुमानी फैला कर उसकी अज़मत, विक़ार और रूहानियत पर डाका डालने की नाकाम कोशिश की थी।  उनके मुताल्लिक़ बदगुमानी का वोह आलम था की उनको अरे तूरे के अलफ़ाज़ और अलक़ाब आतंकी तक का इस्तेमाल किया गया था।  उसी वक़्त तमाम ख़बरों पर तब्सिराते राये और मेरे मज़मूनों में वाज़े अलफ़ाज़ में कहा था की मौलाना साद साहब की परछाई को तक तुम काफ़िर छु नहीं सकोगे।  मेरे उस मज़मून और ख़बरनामों पर इज़हारे राये पर मज़ीद ख़बर आई की पुलिस ने मरकज़ निज़ामुद्दीन को चारो जानिब से घेर लिया है अब मौलाना साद गिरफ्तार होगा।  मुझे मेरे रब पर पूरा यक़ीन था की वोह किसी भी मोमीन को उस हद तक ही तकलीफ में डालता है जितनी की रब की मर्ज़ी होती है।  फिर जब पुलिस बेरंग रही तो मीडिया ने ख़बर फैला दी की मौलाना साद फरार हो गया।  उस पर साद साहब ने फ़ौरन मरकज़ निजामुद्दीन से वीडियो शाया किया और कहा में तो मरकज़ के अंदर ही हूँ।  कोई पुलिस आई ही नहीं।  और जैसा मेने कहा था वैसा ही हुआ अल्लाह का सच्चा बन्दा तुम्हारे सामने होगा और तुम उसको देख नहीं पाओगे।  वही साद साहब के साथ हुआ।  

बारहाल जो रूसवाई इन काफ़िरों ने सच्चे मोमेनीनों के लिए की थी उसका इज़ाला इनको अपनी जानों से देना पड़ा।  आगे और देना होगा।  अब बात मुद्दे इस्लामिक फ़तवे की हक़ीकत की करतें हैं।  मेरे अज़ीज़ बुज़ुर्गों दोस्तों जहाँ तक फ़तवे का सवाल है अगर दारुल हर्ब है मतलब हिन्दू रियासत तो इस्लामिक फतवा हर ख़ासों आम पर लागू नहीं होता है।  बल्कि सिर्फ मोमीनों पर लागू होता है।  वहीँ दारुल अमन है जैसा पाक मुल्क तो अब वोह फतवा हर ख़ासों आम पर लागू होगा।  और उसकी ख़िलाफ़ वर्ज़ी करने वाला हूकूमती सज़ा का मुस्तहिक़ होगा।  

काफिर मुल्क हिन्द में एक आम चलन हो गया है कोई भी दहशतगर्द, ज़ाफ़रानी साधू या ज़हरीली सियासी जमात का नुमाइंदा लंगूर लँगूरनियों के सामने बैठ कर ऐसे ऐसे अक़ल के मुफ़लिस मौलानाओं या दुर्गा वाहिनी की ख़ातूनों की धुल निकालतें हैं जिनको इस्लाम के ज़बर और ज़ेर में फ़र्क़ नहीं मालूम है।और मज़े की बात तो यह है की ज़ाफ़रानी मीडिया की लँगूरनियाँ और लंगूर इन अक़ल के अंधों को इस्लामिक स्कॉलर बोल कर मुख़ातिब करतें हैं। 

हर मुद्दे पर फ़तवे का ख़ौफ़ दिखाना।  अभी कुछ २ बरस क़ब्ल २०१९ के बाद साधू ने एक मुस्लिम को सूबे शुमाल में सिविल इंजीनियर के हूकूमती ओहदे पर मुलाज़मत के लिए रखा।  फिर साधू खुद उस मुस्लिम से फोन पर गुफ्तगू करता है और उससे पूछता है आपको किसी ने धमकाया तो नहीं,  हमारे पास काम करने के ख़िलाफ़ कहीं से कोई फतवा तो नहीं आया।  आगे साधू बोलता है आएगा भी नहीं क्योंकि आपको हमने मुलाज़मत पर रखा है कोई भी हमारे हुकुम के ख़िलाफ़ फतवा नहीं दे सकता।  उसकी ज़ूबान में इस क़दर तकब्बुर और अना पोशीदा था की बोली से ज़ाहिर हो रहा था।   फिर उस मामूली ख़बर को जहाँ ५०० की मुलाज़मत में महज़ एक मुस्लिम नुमाइंदा मुंतखिब किया गया लँगूरनियाँ ऐसी ख़बर को ब्रेकिंग न्यूज़ बना कर चला रही थी।  जबकि ब्रेकिंग न्यूज़ फ़तवे पर साधू का हमला नहीं होना था सही ब्रेकिंग न्यूज़ होना था सूबे शुमाल में मुस्लिम आबादी तक़रीबन १९ फीसद है और ५०० की मुलाज़मत में महज़ एक नुमाइंदा और साधू बातें बड़ी बड़ी कर रहा है।  क्या यही है सब का साथ सब का विकास। 

फिर साधू, बीजेपी वालों और शिद्दत पसंद काफ़िरों को में कहना चाहता हूँ की इस्लामिक फतवा सिर्फ़ मुस्लिम और इंसानों के ऊपर लागू होता है।  वोह किसी काफ़िर, दहशतगर्द, शैतान, दिमाग़ी मरीज़ (पागल) और हैवान पर लागू नहीं होता है।  बोहोत से मुर्तद बदगुमानी फ़ैलाते हैं की हम किसी फ़तवे से नहीं डरते।  अरे तुमको कौन डरा रहा है।  फतवा तुम्हारे ऊपर लागू ही नहीं होता है।  तुम तो मुर्तद हो चुके हो अब तुम हिन्दू बन कर जो काम करोगे वोह तुम्हारा अमल होगा।  हाँ लेकिन अगर मुसलमान बन कर इस्लाम को बदनाम करने की कोशिश करोगे या नबी मुकर्रम की शाने बे पनाह में बदकलामी करोगे तो तुम्हारा होगा "सर तन से जुदा"

अब तो खुल कर कहो की तुम हिन्दू हो चुके हो और तुम्हारा मज़हबे इस्लाम से कोई वास्ता नहीं है।  फिर तुम जो भी ग़लाज़त, नजासत खाना चाहो खाओ पीओ और वही अपने मुँह से उगलो। 

 

Zuber

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