अज़ीज़ नाज़रीन,
दरिंदा,
ज़ालिम तरीन, क़साई, जल्लाद हाकिम मोदी को हिटलर का लक़ब इस ख़ाकसार ने ही दिया था, और
अब मुनाफ़िक़ों का पैग़म्बर इसका दूसरा लक़ब है।
२०१० में मुसन्निफ़ सहाफत में आया था।
और ख़ाकसार ने ही इस मलून दरिंदे को हिटलर नाम दिया। अपने मज़मूनों और उस वक़्त सहाफी टाइम्स ऑफ़ इंडिया,
हिंदुस्तान टाइम्स और दैनिक भास्कर के लिए ऑन लाइन खबरनामों पर अपना तब्सिरा और राये
देता था। कई एक खबरनामों में इस मलून का नाम
हिटलर दिया। उसके बाद अहमदाबाद में हिटलर नाम
से एक होटल खोला गया जिस पर बवाल हुआ था। फिर
नई बंबई में भी हिटलर नाम से होटल या कोई शो रूम खोला गया था। जिस पर इजराइल के यहूद ने सख्त एहतेजाज किया, जिसका
बाद में नाम तब्दील किया गया। तहक़ीक़ात में
पता चला वोह सभी मोदी गुलाम थे, और जब उनके आक़ा को हिटलर नाम दिया गया तो उन्होंने
अपनी तिजारत का नाम भी हिटलर रख लिया।
मज़ीद
पोशीदा केमेरे में तहक़ीक़ात में पता चला की उन मोदी गुलामों का मक़सद एहले यहूद को ईज़ा
पहुँचाना नहीं था। बल्कि वोह चाहते हैं की
मोदी २००२ की तर्ज़ पर तमाम भारत में मुस्लिम अवाम के साथ ऐसा कारनामा करे जैसा की हिटलर
ने यहूद के साथ किया था।
फिर
यह मोदी नामी शैतान तो बोहोत ही बड़ा दरिंदा और दज्जाल फितना निकला वोह तो हिटलर से
ज़्यादा ज़हरीला नाग निकला। इसको शैतानी इल्म
की महरात थी सो इसने सबसे क़ब्ल सूफियों पर डाका डाला और उनको गुमराह किया। २००५ में सुन्नी मुस्लिम जमात के आला हज़रत फ़िरक़े
से कुछ मुस्लिम मौलाना उसको मिलने गए यह जानते हुए की यह शक़्स गुजरात में मुस्लिम नस्ल
कूशी का ज़िम्मेदार है और उस वक़्त इसकी ज़हरीली तक़रीरें तमाम सोशल मीडिया पर विराल थी। और उन्होंने उसको टोपी सर पर लगाना चाही लेकिन उसने
एक ही झटके से सर को अलग कर लिया जैसे किसी नाजिस्त और ग़लीज़ चीज़ को उसके सर पर रखा
जा रहा हो। और उसने अपने अर्दली को टोपी लेने
को कहा यहाँ तक की टोपी हाथ में भी नहीं ली।
लेकिन मौलाना की जमात ज़लील हो कर इस्लाम को रुसवा कर के ही ही ही हंस कर आ गए।
उसने
मुस्लिम टोपी सर पर क्यों नहीं पहनी क्योंकि उसको अक्सरियत जमात का ताऊन चाहिए था और
वोह खवाब हिन्दुस्तान का हाकिम (राजा) बनने के देख रहा था। बिल आख़िर उसके दिमाग की गंदगी २०१२ से आहिस्ता आहिस्ता
बहार आने लगी और उसको भी हिन्दुस्तान की हाकिमियत के खवाब सच्चे होते दिखने लगे। फिर उसने ३ रोज़े रखे अपने गुनाहों और मुस्लिम क़त्ले
आम का कफ़्फ़ारा। उस तीन रोज़ा मोहीम में उसने
ख़ाकसार को भी बुलाया था। हूकूमते गुजरात का VIP कार्ड भेज कर वज़ीरे आला की जानिब से अपने ३ रोज़ा मोहीम का हिस्सा बनने और अवाम
के फलाही कामों में किस तरह वोह आगे की जानिब बढ़ सकता है इसके लिए राह दिखाए। उसको जवाब दिया था की आप सभी फ़रीक़ों के साथ इन्साफ
कीजिये और जिसने भी २००२ में मुस्लिम क़त्ले आम किया है उसको सज़ा दीजिये। उसका VIP कार्ड अपने ख़ास नुमाइंदे के हाथों भेजने
की हिकमत उसी वक़्त समझ में आ गई थी वोह मुझे
बीजेपी का एजेंट बनाना चाहता था।
२०१७-१८
में निजामुद्दीन ओलिया के यौमे पैदाइश पर आलमी सूफी इजलास मुनक़्क़िद किया। जिसमे तमाम आलम यहाँ तक की बग़दाद से भी सूफी तशरीफ़
लाये थे। और भारत के सूफी मोदी के साथ बड़े
ही शान से सेल्फी लेते हुए पाए गए थे। उस खबर
पर भारत के सूफियों और फोटो बाज़ों के साथ मोदी
की तस्वीर और इजलास की इफ्तेताह पर “भारत ……… की जय” के जो नाज़ेबा नारे लगे थे
उस खबर पर अच्छी तरह से धो डाला था।
फिर मोदी ने जिस बेइज़्ज़त्ती से सूफियों और सय्यद ज़ादों को तकब्बुरामोज़ लहजे में मुख़ातिब किया था वोह बड़ी ही तशवीशनाक थे। मुख़ातिब करने से क़ब्ल नाम के आगे ना ही अलक़ाब, ना ही जनाब, ना ही कोई दाम जिल्लाकुम और ना ही कोई इज़्ज़त सीधा नाम ले रहा था। इजलास हुआ सूफी और गरीब नवाज़, निजामुद्दीन ओलिया की सवाने उमरी पर बातें और पहुंच रहें हैं हाकिम के दर पर फ़क़ीर। मतलब ज़ाहिर हो रहा है की यह फ़क़ीर दुनयावी उमूर में ज़्यादा दिलचस्पी रखते हैं। हाकिम के यहाँ जाना इनके लिए बाइसे इज़्ज़त होता है खवाह वोह इस्लाम दुश्मन ही क्यों ना हो। यह तो गरीब नवाज़, निज़ामुद्दीन ओलिया और तमाम खुदाई फ़क़ीरों और हक़ीक़ी सूफियों की तालीम की ख़िलाफ़वर्ज़ी है। क्योंकि कोई भी सूफी या हक़ीक़ी फ़क़ीर कभी भी किसी भी हाकिमे वक़्त से मुत्तासिर होता है और ना ही उसका गुलाम रहा और ना ही किसी ऐसे इजलास का हिस्सा बना जो हाकिम ने मुनक़्क़िद किया हो।
फिर
उन तमाम सूफियों को बखूबी इल्म होगा की मोदी का कोई भी इजलास दहशतगर्द संघ तैयार करती
है। उस इजलास में शिद्दत पसंद हिन्दू अवाम
का ताऊन होता है और हर इजलास में किस तरह से मुस्लिम अवाम को बर्बाद किया जाए इस्लाम
को तबाह किया जाए ऐसी मंसूबा बंदी होती है।
और मज़े की बात तो यह की उस इजलास से महज़ एक हफ़ते क़ब्ल ज़ाफ़रानी लंगूर अमीश देवांगन
ने गरीब नवाज़ की शान में बदकलामी की थी। उनको
ज़ानी और ज़ालिम जैसे अलक़ाब से मुखातिब किया था।
बाद में उसके खिलाफ केस दर्ज हुआ और उसने माफ़ी मांगी यह बोल कर की उसने वोह
तमाम अलक़ाब मोईनुद्दीन के लिए इस्तेमाल किये थे, ना की गरीब नवाज़ को मुखातिब किये थे।
खैर
अब तो यह बात साबित हो चुकी है की कुछ शिया मुसलमान, अहमदिया दज्जाल, कुछ मुनाफ़िक़ और
तमाम शिद्दत पसंद हिन्दू, संघी दहशतगर्द, बीजेपी वाले उसको पैग़म्बर तस्लीम कर चुके
हैं। तभी तो उसके दिल्ली की सल्तनत पर क़ाबिज़
होते ही अहमदाबाद में उसका मंदिर बना डाला था।
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