अज़ीज़ नाज़रीन,
मौजूदा फितना अंगेज़ शख़्स शैतानी उलूम का माहिर दज्जाल मोदी जिसको मुनाफिके इस्लाम अपना नया पैग़म्बर तस्लीम कर चुके हैं, ऐसे मुनाफ़िक़ों और ख़ौफ़ज़दा मुसलमानों के लिए आगे की राहें हिन्दुस्तान में सख्त तक़लीफामोज़ होने वाली हैं। क्योंकि ऐसे मुनाफ़िक़ ना तो इधर के रहेंगें और ना ही उधर के। धोबी के गदेह के जैसी इनकी हालत होने वाली है। कियोंके १५ अगस्त २०२२ को हिन्दुस्तान में हिन्दू राष्ट का एलान किया जा चूका है। अब ऐसे तमाम मुस्लिमों का क्या होगा जो मोदी को अपना नबी अख़िरुज़्ज़ामा तस्लीम कर चुके हैं। उनके नज़दीक पैग़म्बर मुहम्मद सल्लम की अज़मत, इज़्ज़त और ताज़ीम मोदी से कमतर है। जैसे की बक़ौल दज्जाल सुहेब क़ासमी मरकज़ जमात हिन्द का मुनाफ़िक़ गुस्ताख़े नबी नूपुर शर्मा के मुवाफ़ेक़त में अवामी न्यूज़ चैनल पर बयान देता है। मज़ीद वोह बोलता है की नूपुर शर्मा को मुसलमानों को माफ़ कर देना चाहिए और बदला लेने की हिकमत नहीं करना चाहिए।
बोहोत
से खुशदिल मौलाना और मुनाफ़िक़े इस्लाम नबी सल्लम की रेहमतुल लील आलमीन के क़ुरानी आयात
को और सीरते नबवी को हथियार बना कर पेश करतें हैं। जो खुशदिल मौलाना हज़रात हैं उनके बयान में नबी
की खुश असलूबी, मासूमियत, हर अफ़राद को माफ़ करने की सिफ़त, किसी के ऊपर गुस्सा ना करने
की सिफ़त को एक मोजज़े की हैसियत से नबी की अज़मत और ताज़ीम को बताना मक़सद होता है। वहीँ जो दज्जाल मुनाफ़िक़ और नबी से हद दर्जे का बुग्ज़
और कीना रखते हैं वोह नबी के माफ़ करने की सिफ़त को कुफ्फार और गुस्ताख़े नबी के लिए एक
फरारी के हथियार के रूप में बयान करतें हैं।
और
दज्जाल नबी के हासिद बोलतें हैं जब नबी ने अपनी हयाते ज़िन्दगी में किसी से बदला नहीं
लिया नबी ने सब को माफ़ कर दिया तो उनके फ़ौत* होने के बाद तुम कौन होतें हो बदला लेने
वाले। (*दज्जाल और दुश्मन नबी उनको फ़ौत हो गए
या मौत आ गई ऐसा बोलतें हैं) जबकी खुश दिल हज़रात पर्दा कर लिया बोलतें हैं।
तो
उन दज्जालों को जवाब हैं नबी की हयाते ज़िन्दगी में उनको पूरा इख़्तेयार था की उनकी ज़िन्दगी
या अज़मत पर कोई हमलरेज़ हो तो वोह चाहे माफ़ करें या उससे क़िस्सास लें। उनको अपनी ज़िन्दगी का पूरा इख़्तेयार था। हम उनके उम्मती हैं, फिर उनके पर्दा करने के बाद
अगर कोई भी उनके खिलाफ ऊल जलूल बोलेगा तो हमें पूरा इख़्तेयार है की उस मलून से क़िस्सास
लिया जाए। कियोंके दिल आज़ारी हमारी हुई है। हाँ अगर नबी किसी आलिम, मुफ्ती या किसी वली के ख्वाब
में आ कर आज १४०० साल बाद भी बोल दें की इनको माफ़ करो तो माफ़ कर सकतें हैं। लेकिन वोह वली कामिल होना चाहिए। किसी खुद एलान कर्दा दज्जाल नबी अखिरुज़्ज़मा मोदी
का भक्त नहीं और ना ही किसी फ़िरक़े का गुलाम (बीजेपी, संघी, यहूद, नसारा) का पैरोकार
झूठा फरेबी झोला छाप नहीं होना चाहिए।
दूसरी
बात आज जो दज्जाल मुनाफ़िक़ नबी के गुस्ताखों को माफ़ करने की वकालत कर रहें हैं में उससे
पूछता हूँ अगर तुम्हारे वालिद के फ़ौत होने के बाद कोई भी उनको बूरा भला कहता है या
तुम्हारे वालिद के मुताल्लिक़ ऐसा झूट फरेब फैलाता हैं जो उनके अंदर मौजूद ही नहीं था,
तो क्या तुम उसको माफ़ करोगे। आज जो मुसलमान
नबी के उसवाये हसना सिर्फ कुफ्र और गुस्ताख़ को मेहफ़ूज़ करने के लिए बताते हैं ऐसे ज़मीर
फरोशों से में पूछना चाहता हूँ तुम तो तुम्हारे वालिद की जायदाद पर भी डाका डालने से
बाज़ नहीं आ रह हो। जब तक तुम्हारे वालिद हयात
थे उनको पूरा इख़्तेयार था वोह चाहे अपनी दौलत को जाइज़ तरह से जैसे चाहे खर्च करें। फिर उनके इंतेक़ाल के बाद मदरसों पर काहे को नहीं
लगा रहे हो। और खुद क़ाबिज़ हो कर क्यों बैठ
गए। काहे को दौलत का बटवारा कर दिया। चलो बनाओ आलिशान मस्जिद क्योंकि तुम्हारे वालिद
तो मस्जिदों में पैसा लगाने के हामी थे। तुम
नबी के उसवाये हसना की बात करते हो अपने वालिद
तक को नहीं पहचान पाए उन तक नहीं पहुंच पाए और नबी पर बात करने लगे। दोनों ही जगह तुम्हारा मफ़ात पोशीदा है। नबी की माफ़ करने की सिफ़त बयान कर के कुफ्र और गुस्ताख़े
नबी को बचाना और दौलत का बटवारा कर के अपने मफ़ात को बचाना।
आज हिंदुस्तान का मुसलमान इतना ख़ौफ़ज़दा हो चूका है जैसा की इससे पेश्तर एक मज़मून में बोलै है की अगर कोई भी इनकी गर्दन पर तलवार रख कर बोलेगा की तस्लीम कर मोदी नबी अखिरुज़्ज़ा है तो वोह यह भी तलसीम कर लेगें। फिर इनके नज़दीक पैग़म्बर सल्लम की अज़मत और इज़्ज़त भी कुछ नहीं रहेगी। और वही दज्जाल का फितना है। जब वोह फितना बढ़ेगा तो कुछ मुसलमान उसके हर्बे और हर क़िस्म के काम को करने को ले कर उसके शैतानी जाल में फस जायेगें और कुछ उससे और उस दौर के हाकिमे वक़्त के क़तल कर दिए जाने के खौफ से उस पर यक़ीन करने लगेगें।
जैसा
की इस शैतानी अमल और दज्जाल की सवारी पर अल्लाह के घर से फूलों की बरसात की जा रही
है। वीडियो महाराष्ट्र के धूलिया का बताया
जा रहा है। यह वही फ़िरक़ा है जो वालिओं के मज़ारात
की ज़ियारत करने को कुफ्र बोलता है। ग़ौसुल आज़म,
गरीब नवाज़ या निजामुद्दीन ओलिया यहाँ तक की नबी की मिलाद का ज़िक्र आतें ही इनको बुख़ार
आ जाता है और शिर्क बिदआत जहनुम्मी दीन में इज़ाफ़त क़बर पुज्जे और ना जाने क्या क्या
फलसफे आ जातें हैं। लेकिन एक दज्जाल शैतान
की सवारी पर फूलों की बरसात इनके नज़दीक भाईचारे की मिसाल है। गंगा जमुनी तहज़ीब है।
फिर
अगर नबी की मिलाद इतना बड़ा शिर्क है नबी ने नहीं बनाया, सहाबा ने नहीं बनाया क़ुरआन
से साबित नहीं हदीस से साबित नहीं। लेकिन एक
इस्लामिक रियासत दुबाई, अबू धाबी, क़तर, ओमान में तो तुमने खुद शिर्क के अड्डे का इफ़तेहताह
कर दिया। बुतपरस्ती तो सबसे बड़ा गुनाह है और
हर जगह क़ुरआन इसकी मुख़ालेफ़त करता है। नबी की
हदीस है की इस्लामिक रियासत कुफ्र शिर्क और बुतपरस्ती से आज़ाद हुई।
दूसरी बात यूं.ऐ.ई. का हाकिमे वक़्त ख़लीफ़ा खुद उस शैतानी मूरत को अपने सर पर रख कर आलिशान मंदिर में नसब करने गया था। तीसरी बात वोह मंदिर किस के कहने पर बनवाया एक ऐसे दरिंदा सिफ़त दज्जाल फ़िरोंन के कहने पर बनवाया जिसके मुल्क और हाकिमियत में पैग़म्बर की अज़मत में बदकलामी की जाती है क़ौमे मुस्लिम पर तशद्दुत की जाती है जान से मार डाला जाता है जिनकी मस्जिदों पर डाका डाल कर उनको गसप कर लिया जाता है। जहाँ क़ुरआन को आतिशे नार किया जाता है, जहाँ मदरसों को मिस्मार कर दिया जाता है, जहाँ शरीयत को ख़तम कर देने की साजिश की जा रही है। जहाँ हिजाब में एक खातून को रोड पर बरहना किया जाता है। जहाँ दुख्तरान मिल्लत की इज्तेमाई अस्मत रेज़ी की जाती है। #गुजरात #मुज़्ज़फ़्फ़रनगर
Zuber
No comments:
Post a Comment