देश का मुर्ग़ा केसा हो
अर्नब
चाचा
जैसा
हो
बांग
देता
हो
जो
झूठी
समझे
दुनिया
उस
ही
की
खबरों
से
उठती।
हर रात बोहोत ज़ोर दार
है
यह
चिल्लाता
समझ
बैठा
है
ज़माने
को
यही
है
हिलाता
हरक्यूलिस
की
यह
औलाद
नहीं
इसकी
कांधों
में
वोह
बिसात
नहीं
देश
का
मुर्ग़ा
केसा
हो, अर्नब
चाचा
जैसा
हो
एक
कुड़ी
की
अस्मत
लूटी
इसने
समझा
वही
है
अंडा
देने
वाली
मुर्ग़ी
पढ़ने
लगा
भगवा
शान
में
रोज़
नए
क़सीदे
इसको
क्या
पता
था
मराठा
वारिस
कर
देंगे
इसके
फजीते।
बस
एक
हुकुमतनामे
ने
बदला
इसका
रास्ता
फिर
घीघाने
लगा
दारोग़ा
जी
के
हुज़ूर
पगला।
देश
का
मुर्ग़ा
केसा
हो, अर्नब
चाचा
जैसा
हो
कहता
है
दफा
करो
मेरी
मन्सूख़
रफा
दफा
करो
दो,
मुझ
पर
केस
नहीं
है
इसमें
कोई
बेस
बदल
दूंगा
अपना
भेस,
देश का नेता केसा हो मराठा वारिस जैसा हो,
मराठा से कहाँ पड़ा था इसका पाला
एक एकेले ने दिखा दिया तारा
देश
का
मुर्ग़ा
केसा
हो, अर्नब
चाचा
जैसा
हो
भगवा
का
भी
कोई
दोश
नहीं
लालच
में
जब
होश
नहीं
हर
मुद्दे
पर
देता
था
चाचा
नया
अंडा
अब
तो
पड़ेगा
उसको
भी
भगवा
डंडा
सारे
अंडे
निकालने
के
चक्कर
में
भगवा
ने
कर
दिया
खुद
उसको
नंगा
बात करता था चचा अर्नब हर दम झूठी,
चलेगी
छुरी
उसकी
गर्दन
पर
मोदी
की।
देश
का
मुर्ग़ा
केसा
हो, अर्नब
चाचा
जैसा
हो
अब नहीं देता है बांग चाचा अर्नब सुबह और रात की.
ख़ौफ़ है इतना लालच, भगवा, और मोदी
खामोश
है आवाज़ तभी चचा अर्नब की।
सहाफी जुबेर।
No comments:
Post a Comment