Wednesday, 21 October 2020

आपस में निफ़ाक़ से झगड़ों से अल्लाह की रेहमत उठा ली जाती है।

 अज़ीज़ नाज़रीन,

आज आप लोगों के दरमियान इस्लाम और मुसलमानो के बीच इख़्तेलाफ़ फैलाने और नबी की मोहब्बत को पामाल करने की यहूद-नसारा, काफिरों और मुनाफ़िक़ों की साजिश को ले कर हाज़िर हुआ हूँ.  हर वक़्त ईद मिलाद के नज़दीक कुछ खुसूसी मौलानाओं की जमात के हमले तेज़ हो जातें थे, इस साल अल्लाह का करम है कोई भी वीडियो या बयान नहीं आया।   उसकी वजह मार्च २०२० से अल्लाह का क़ेहर जिसमे सभी को सबक़ मिला।   नमाज़ें गई, जुमे गए, रमज़ान गए, ईद गई, हज गया रौज़ए अक़दस की ज़्यारत गयी।  


ये बात इस सहाफी ने अपने बोहोत से मज़्मूनों में वाज़े अलफ़ाज़ में कह दी है नबी सल्लाहो अलैहे वस्सलम का फरमान है की अगली उम्मत में ऐसे ऐसे मुसलमान आएंगे जिनके ज़िक्र, नमाज़ों और इबादात के आगे हर कोई अपनी इबादत को पस्त जानेगा.  जिनका हर अमल इस्लाम के हिसाब से होगा.  तक़वा होगा, तहम्मुल होगा, ज़िक्र होगा, इबादत होगी, परहेज़गारी होगी.  लेकिन वो लोग दीन से ऐसे ख़ारिज होंगे जैसे की कमान से तीर.   इतना सब होने के बाद कमी फिर किस चीज़ की होगी, वो होगा अदब मुस्तुफा और इश्क़े रसूल.     

 

इस सहाफी का फलसफा है और वो ये मानता है की अँधेरे को रोशन करने के लिए एक ही चिराग़ काफी है और अँधेरा करने के लिए तमाम चिरागों को गुल करना पड़ेगा.  फिर जिस हिसाब से ये मौलानाओं की ख़ास जमात नबी के ऊपर हमलारेज़ होते हैं अगला निशाना और हमला इनका काबा तूल अल्लाह, क़ुरान और फिर इस्लाम ही होगा.  वो कैसे में समझाता हूँ.


१९२०-२५ तक नबी सल्लाहो अलयहे वस्सलम के अबाही घर पे तमाम हाजी हज़रात जाते थे और वहां पे बा क़ायदा खड़े हो कर सलात और सलाम पेश करते थे.  २४ घंटे  मिलाद का एहतेमाम खुद इंतेज़ामिया और सऊदी हुकूमत की जानिब से होता था. फिर उस घर ऐ मुबारक को मिस्मार कर दिया गया.  जन्नतुल बक़ी से तमाम साहब ऐ किराम रिज़वानुल्लाहे अजमईन के मज़ारात ख़ातूने जन्नत का मज़ारे मुबारक  तहलील कर दिए.  दलील ये दी गई के नबी के घर में हाजी हज़रात जा कर बिदअत करते थे हदीस और क़ुरान में कही भी नबी के घर की ज़ियारत और उसकी अज़मत और क़ब्रों की ज़ियारत का ज़िक्र नहीं आया है सिवाए मस्जिदे नबवी के.  ठीक है बिलकुल सही है.  

 

लेकिन आप क़ुरान का हुकुम मान के नबी की निशानियां नहीं मिटा रहे हो, बल्कि यहूद मंसूबे को पूरा करने की वजह से आप तमाम निशानियां मिटा रहे हो.  जिस नबी की वजह से आज इस्लाम को लोग जानतें हैं कल ये ही निशानियां सबूत होंगे की इस्लाम हक़ मज़हब है और क़ुरान जिसकी दलील दे रहा है.  अगर दलील के बाद सबूत ही नहीं होंगे आप सबूत ही मिटा दोगे तो ५०००, १०००० साल बाद आपकी किस बात पे अवाम यक़ीन करेगा.

दूसरी बात अल्लाह क़ुरान में फार्मा रहा है की सफ़ा और मरवा की पहाड़िया अल्लाह की निशानियों में से हैं.  इन्तेज़ामियाँ ने पूरी सफ़ा और मरवा की पहाड़ियों को ढांक दिया अब सिर्फ ऊपर ऊपर थोड़ी थोड़ी पहाड़ की नोकें बची हैं.  मतलब अल्लाह की निशानियों को पोशीदा कर दिया.

 

वोह पेड़ जिसके साये तले नबी पाक ने सहाबा की बैत ली थी जिस पेड़ का और नबी के हाथ में साहिबा की बैत का ज़िक्र क़ुरान २६वे पारे में अल्लाह खुद कर रहा है.  और उस पेड़, नबी और उनके साहबियों पर अल्लाह की रेहमत है।   वोह पेड़  कहाँ गया उसको उखाड़ कर फेकने के  पीछे  क्या  फलसफा  है. वैसे भी दुनयावी हिसाब से देखा जाए और अक़वामे मुताहिदा के क़ानून के हिसाब से हरे भरे पेड़ को बिलडोज़र से जड़ से उखाड़ फेकना क़ानूनन जुर्म है, ऐसा करने वाले मुल्क के खिलाफ आलमी फौजे एक्शन ले सकती हैं।  ग़ारे हिरा को बूझा देने या पोशीदा करने के  पीछे  की क्या मंसूबा बंदी है। 


कुछ नहीं यह यहूद-नसारा, काफिर और मुनाफ़िक़ों की  साजिश  है, अगर  किसी  क़ौम  को  तबाह  करना  है  और  तारीख़  में  उसको  ख़तम  करना  है  तो  उसके  रहबर  और  क़ायद के  लिए  बदगुमानी  पैदा  कर  दो.  वोह  इश्क़  ही  ख़तम  कर  दो  जिसकी  वजह  से  वोह क़ौम अपने क़ायद के लिए मर मिटने पर तैयार रहती है।  और यहाँ सवाल सिर्फ क़ायद का नहीं बल्कि अल्लाह की  ख़ास  तवज्जो  और  रूहानी  कूव्वत  का भी है।  नबी सल्लम की मोहब्बत ख़त्म अल्लाह की ताक़त और क़ुव्वत ख़तम फिर हम हो जायेगे इनपर ग़ालिब।  पहले  इन  लोगों  ने  बुर्ज़ुर्गाने  दीन के  ख़िलाफ़  बदगुमानी  पैदा  की, उनके  इश्क़  को  ख़तम  कर  दिया.  उसके  बाद  अगला  हमला  खुलफ़ा  ऐ  राशिदीन  और  सहाबा  ऐ  इकराम फिर नबी की आल दुख्तराने जन्नत और इमामे हुसैन  की मोहब्बत को ख़त्म कर  दिया  बिल  आखिर  हमला  रसूले  अरबी  की  ज़ात  पर  हुआ.  आख़िर  हमला  काबातुल्लाह  और सीधा  अल्लाह के  वजूद  पर  ही  होगा.  यह अरब अगर मुस्लिम हमदर्द होते तो बाबरी मस्जिद जो अल्लाह का घर है उसके ऊपर काफिर दहशतगर्दों के ऊपर हमला कर देते।   दिल्ली में क़ुरान की पूरी की पूरी अलमीरा जला के राख कर दी मस्जिदों की बेहुरमती की लेकिन अरब खामोश रहे।   इनको यहूद का इशारा था की कुछ मत बोलना।   चलो नबी की ज़ात से तुमको तकलीफ है लेकिन क़ुरआन तो अल्लाह का कलाम है, मस्जिद तो अल्लाह का घर है, फिर क्यों ख़ामोशी इख्तियार की।  दज्जाल ऐसे  ऐसे  शैतानी  करिश्मे  दिखायेगा  की  बद अक़ीदा  और  कमज़ोर  ईमान  वाले  जिनके  पास  इश्क़  और  मोहब्बत  का  ईंधन  कमजोर  होगा, जिनके  पास  खुशबू  की  कमी  होगी  उनके  चिराग  बुझ  जायेगे  वही  लोग  बहक  जायेगे  और  दज्जाल  को  ही  ख़ुदा तस्सव्वुर कर सजदा  रेज़  हो  जायेगे.  लेकिन  जिनको  अल्लाह  हिदायत  दे  देगा  और  जिनके  पास  मुस्तुफा की  मोहब्बत  का  ईंधन  लबरेज़  होगा  जो  लोग  मुस्तुफा  के इश्क़े  हक़ीक़ी  से  बखूबी  वाक़िफ़  होंगे  वोह  लोग  मेहफ़ूज़  रहेगें.

सीधा  सा  फलसफा  है  किसी  हस्ते  खेलते  खुशहाल  घर  को  बर्बाद  करना  है  तो  मिया  बीवी  के  दरमियान  की  मोहब्बत  वाल्दैन और  औलाद  के  दरमियान  की  मोहब्बत  को  न  इत्तेफ़ाक़ी  और  नफरत  में  बदल  दो.  वही  फलसफा  क़ौम  और  मिल्लत  पर  लागू  होता  है.  किसी  हस्ती  खेलती  क़ौम  को  बर्बाद  करना  है  तो  उनमे  आपस  में नाइत्तेफ़ाक़ी  और  नफरत  भर  दो.  उनके  रहबर  और  क़ायद  के  ख़िलाफ़  बुग्ज़  कीना  और  बदगुमानी  भर  दो  वोह  क़ौम  अपने  आप  अल्लाह  की  रेहमत  से  दूर  होती  जाएगी.  क़्योंके इश्क़  एक  ऐसी  दवा  है  जो  अच्छे  अच्छे  मूज़ी  मर्ज़  को  ठीक  कर  देता  है. ख़्वाह  वोह  इश्क़  हक़ीक़ी  हो  या  इश्क़े  मजाज़ी.  अगर  कोई  दो  नर  मादा  आपस  में  उस  हद  तक  प्यार  करते  हैँ  की  अगर  दोनों  में  से  कोई  एक  जुदा हुआ  तो  दोनों  मर  जायेगे  तो  ऐसे  जोड़े  के  प्यार  में  अल्लाह  अपनी  कायनात  के  निज़ाम  भी  तब्दील  कर  देता  है.  और  वही  फलसफा  इश्क़े  हक़ीक़ी  के  लिए  है.  अगर  कोई  मोमिन  या  मोमिना  मुस्लिम  या  मुस्लिमा रसूले  अरबी  से  उस  हद  तक  इश्क़  करे  की उनकी शान  में  एक  बदगुमानी  उसकी  जान  पर  बन  जाए  तो  अल्लाह  ऐसे  प्यार  करने  वालों  के  ऊपर  रेहमत  नाज़िल  करता  है.  फिर  जब  इश्क़  का  जूनून  मज़ीद  आगे  बढ़ता  है  और  अल्लाह  से  प्यार  का  सिलसिला  शुरू  होता  है  तो  अब  ऐसे  बन्दे  की  रज़ा   और दिली तस्कीन के  लिए  अल्लाह  अपने  निज़ामे  कायनात  को  भी  तब्दील  कर  देता  है.  फिर  होता  क्या  है  अब  जैसा वोह  आशिक़  सोचता  है  चीज़ें वैसी होना शुरू हो जाती है।   सिर्फ  दिल  में  ख़्याल  करता  है  अल्लाह  उसकी  मर्ज़ी  को  फ़ौरन  पूरा  करता  है.  दूसरी  बात  ऐ  इश्क़  सिर्फ  नमाज़  पड़ने  से  नहीं  होता.  यह  आशिक़  और  माशूक़  का  फलसफा  ही  अलग है.  यह  तसव्वुफ़ की  पहली  सीढ़ी  होती  है.  वार्ना  तो  इब्लीस  ने  कम  सजदे  नहीं  किये, सबसे  अज़ीम  और  फरिश्तों  का  सरदार  था.  फुकहा  बतातें  हैँ  दोनों  आलम  का  कोई  सा  ज़र्रा  और  खित्ता  बाक़ी  ना  होगा  जहाँ  इब्लीस  ने  सजदा  न  किया  होगा.  लेकिन  महज़  एक  सजदा  ना  करने  से  राहे गांजा हुआ  और  लानत  का  तोग   सुबह  क़यामत  तक  उसके  गले  में  लटका  दिया.

अब  इब्लीस  को  काम  भी  बारी  तआला  ने  वही  दिया,  जा  तू  बहका  हर  मोमिन-मोमिना  को  हर  मुस्लिम  मुस्लिमा को  और  आलमे  इंसानियत  को  तबाह  कर  बर्बाद  कर  तेरे  को  सुबह क़यामत तक खुली  छूट  है.  लेकिन  ऐसा  करते  वक़्त  अल्लाह  ने  एक  शर्त  रख  दी  लेकिन  जो  मेरे  अज़ीज़  और  प्यारे  बन्दे  होंगे  फिर  भी  तेरे  बहकावे  से  दूर  रहेंगे.  अब  में  उन  लोगों  से  पूछना  चाहता  हूँ  जो  बुज़र्गाने  दीन  से  आगे  बढ़ कर  रसूल्ललाहा  तक  पहुंच  गए  हैँ  और  आमाल  की  बातें  करतें  हैँ.  के  जब  अल्लाह  ने  शैतान  को  इतनी  क़ुव्वत  दी  के  वोह  कुछ  भी  कर  सकता  है  उसका वार आगे  से  पीछे  से  ऊपर  नीचे  से  कही  से  भी  हो सकता है वोह कही से भी  बहका सकता  है  तो  जिन  लोगों का  अल्लाह  ने  ज़िक्र किया  है,  क्या  उनको  इतनी  क़ुव्वत  फ़राहम  नहीं  करेगा  की  वोह  शैतान  को  क़ब्ज़े  में  कर  सकें.  जिस  शैतान  को  अल्लाह  ने  सब  कुछ  करने  की  क़ुव्वत  दी  तो  उसका  उल्टा  करने  की  क़ुव्वत  क्या  बुज़ुर्गाने  दीनों को  अल्लाह ने नहीं  दी   होगी  बिलकुल  दी  है.  


और  शैतान  का  फितना  यही  से  शुरू  होता  है  पहले  ऐसे  बुज़ुर्गों  के  लिए  बदगुमानी  पैदा  करो  जो  उसको  इख़्तेयार में करतें  हैँ,  उसके  बाद  अल्लाह  के  रसूल  पर  बदगुमानी  फिर  अल्लाह  के  लिए  बदगुमानी  फिर  दीन  से ख़ारिज.  मेरा  फलसफा  एक  दम अलग  है,  अगर  किसी  वली की कोई करामात ज़ाहिर हुई  तो  वोह बुज़ुर्ग अल्लाह  के  नज़दीक  है  ना  की  वोह  बुज़ुर्ग ही  अल्लाह है.  और  वही  सोच  का  फ़र्क़  है.  अगर  यह  मान  लिया  की  कोई  भी  बुज़ुर्ग  ही  सब  कुछ  कर  सकतें  हैँ  और  अल्लाह  नहीं  तो  गए  काम  से.  लेकिन  अगर  यह  माना  की  अल्लाह  ने  इनको  ताक़त  अता  की  है  इस  काम  को  करने  के  लिए  इनको  मुताइन  किया  है  तो  वही  सही  बात  है.  जिस शैतान को अल्लाह अपनी नाफरमानी करने पर सुबह क़यामत तक तमाम क़ुव्वत और ताक़त दे सकता है तो क्या अल्लाह के फर्माबरदार बन्दों को अल्लाह बतौर इनाम कुछ भी क़ुव्वत और ताक़त नहीं देगा।    

 

शैतान  को  किसी  भी  इंसान  को  ख़ास  मोमिन  को  गुमराह  करने  में  एक  सेकंड  नहीं  लगता  है.  और  वस्वसे  शक  शुकूक के  वही  नज़र  होते  है  जो  सिर्फ  अल्लाह  वाले  हैँ.  क़्योंके शैतान  भी  सिर्फ  अल्लाह  वाला  था  और  उसका  वसीला  भी  नमाज़  थी.  उसने  अपनी  नमाज़ों  पर  तक्क्बुर  किया  ग़ुरूर  किया  “अना ख़ैरुन मिनहूम” बस  वही  पर  दच्चा खा  गया. 


ऐसे सभी मुसलमान जो ईद मिलाद को बिदअत और गलत मानते है.  ईद मिलाद की मुबारकबाद नहीं देते, मिलाद में शरीक नहीं होते, नाते रसूल नहीं पड़ते, ईद मिलाद के जुलूस और इजलास का एहतेमाम नहीं करते और ना ही शिरकत करते हैं. फिर अगर वो अपने वतन के किसी भी क़ौमी इजलास में शरीक होते है तो वो गुनाहे कबीरा कर रहे है. ख़्वाह वो वतन दारूल अमन ही क्यों ना हो. अगर वो गलत है तो ये भी गलत है.

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