वमा अर्सलनका इल्ला रेहमतुल लीलआलमीन,
ब्रादराने मिल्लते
इस्लामियाँ,
सब से पहले इश्क़े रसूल में डूबे और सराबोर हुए तमाम मुस्लिम अवाम को ईद ऐ मिलाद की मुबारकबाद पेश करना चाहता हूँ। इस मुबारकबाद के हक़दार वोह मुनाफ़िक़ और बदबख्त, बदअक़ीदा कत्तई नहीं हैं, जो मिलादे मुस्तफा को बिदअत और गुनाह क़रार देतें हैं। और बोलतें हैं ऐसी ईद को बनाने वाले तमाम बिदअती जहन्नुम का ईंधन होंगे।
यह ख़वारा की नस्लों वाले बदबख़्त और बद अक़ीदा वही हैं जो कम इल्मी और इश्क़ से महरूम रहने की वजह से बंजर हो गए। अब इनकी तादात घटती जा रही है। दरअसल इन लोगों ने इश्क़ किया ही नहीं, अगर यह लोग इश्क़ करते तो इनको पता पड़ता की दुनिया की आग तो क्या जहन्नुम की आग भी इश्क़ करने वाले को रहत और सुकून फ़राहम करती है। क्योंकि माशूक़ को चाहत होती है उस इश्क़ को ज़ाहिर करने की जो उसको अंगारों में भी सुकून फ़राहम कर रहा है। दूसरी बात आशिक़ और मजनू को यह होश किधर रहता है की उसको अंगारों पे लिटाया जा रहा है या उसको अज़ीयत दी जा रही है उसको तो सुकून मिलता रहता है अपने प्रियतम का दीदार करते हुए, और उसको उस मंज़िल को पाना है जहाँ पर पहुंचने की हर शे ख़्वाहिश होती है, वोह तो चाहत के जूनून में काम करता रहता है और अज़ीयत का उसको होश ही नहीं रहता, क्योंकि वो देख रहा होता है गेसुए मुबारक और हसीन रुख़्सारे मुस्तफा।
नाज़रीन आप लोगों को मुस्तुफा जाने रेहमत की शान में क़सीदे और पीरो तरीक़त के बारे में कलाम भेजता रहता हूँ और आप हज़रात उस कलाम से बा ख़ूबी वाक़िफ़ होंगे।
अब ज़रा वाहियात और ना ज़ेबा कलेमात भी मुलाहेज़ा फरमाइए, अभी तक आप हज़रात को पाक कलाम और नाते रसूल भेजता था लेकिन कुछ हज़रात को उस कलाम से इज़ा पहुँचती थी, और वोह इश्क़े रसूल को मिलादे मुस्तफा को बिदअत, गुनाह बोलते थे। तो अब इस सहाफी ने ते किया है अय्याशी वाले कलेमात ज़िना करते हुए मर्द और औरत (ब्लू फिल्मे) हरामकारी करते हुए वीडियो बरहना मर्द और औरतें शराबख़ोरी करते हुए ऐसे वीडियो और निहायत ही अय्याश नुमा दोहरे मायने वाले नग्मे शाया किया करूंगा।
महज़ दो सूरतें हैं एक पाक दूसरी ना पाक, इसके दरमियान तीसरी कोई सूरत ही नहीं है। अब आप तमाम हज़रात से गुज़ारिश करता हूँ जिनको अय्याशी और वाहियात हरामकारी करते हुए वीडियो पसंद हैं ऐसे गुनाहे कबीरा करने वाले दोहरे मायने वाले शेर पसंद हैं वोह उसको तस्लीम कर लें और जिनको नबी की शान में कसीदे पाकीज़ा शेर पसंद हैं नातिया कलाम पसंद है वोह उसको तस्लीम करे।
इन दो सूरतों में से आपको क्या पसंद है आप खुद ही ते कर लीजिये। अगर नातिया कलाम और पाकीज़ा शेरों से आपको घबराहट और तकलीफ होती है तो आपके लिए वाहियात और गलीज़ शेरों का रास्ता खुला है।
हमारी सोसाइटी में एक मुनाफ़िक़ रहता है शायद दज्जाल कादयानी होगा, उसको बुज़ुर्गाने दीनों से लिल्लाहि बुग्ज़ और कीना; रसूल से अदावत उनकी शान में ना ज़ेबा कलेमात बोलना और सबसे बड़ी बात उसको कभी भी जुमे की नमाज़ तरावीह जो दो तीन मस्जिदें हैं उनमे से किसी में नहीं देखा, मस्जिद में नमाज़ पढ़ते हुए नहीं देखा लेकिन ज़ाहिर ऐसा करता है जैसे की इस्लाम इसी के कंधो पर लदा हुआ है। पेशानी पर काला घट्टा दाढ़ी वगेरा सब कुछ लेकिन हर बार मिलादे मुस्तफा से पहले तन्क़ीदी उसका ही वीडियो सबसे पहले आता था। वतन के नाम पर मर मिटने की बातें उससे करवा लो और हर २६ जनवरी, १५ अगस्त उसको सरे फेहरिस्त देखा जा सकता है, उसको मिलादे नबी से नबी के जुलूस से तकलीफ है लेकिन भारत की योमे आज़ादी और योमे जमुहरिया में बढ़ चढ़ के हिस्सा लेने और जुलूस वगेरा में शामिल होने में उसको कोई तकलीफ और परेशानी नहीं। यहाँ तक की जन गण मन पढ़ने और वंदे जैसे ज़हरीले और दहशत को बढ़ावा देने जैसे नारों से उसको कोई तकलीफ नहीं।
२०१९ में ईद मिलाद से क़ब्ल वही मौलानाओं की ख़ास जमात जिनका वीडियो हर साल डालता था उस साल भी डाला. मौलानाओं की एक जामात लगी वही पुराना फलसफा बताने रसूल ने नहीं किया सहाबा ने नहीं किया क़ुरान से साबित नहीं हदीस में कही ज़िक्र नहीं फिर क्यों बनाते हो, उसके ऊपर बद्दुआ दी थी, दिल से निकल गई। वोह दिन शायद जुमे का था और नमाज़ पड़ कर आया और वीडियो देखा फिर क्या था बोल दिया की अब पड़ लो नमाज़ बाबरी में हम राम का साथ देंगे। फिर जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तो दिया ताना गई बाबरी हाथ से और भेजो मिलाद नबी के खिलाफ वीडियो, दूसरी बद्दुआ दी थी मिलाद का ज़िक्र क़ुरान में कही नहीं है तो उस हिसाब से रमज़ान का भी ज़िक्र नहीं है अब में मेरे तमाम चाहने वालों से कहूंगा की इस साल रमज़ान की कोई तैयारी ना करें, ना तरावीह पड़ने जाएँ और ना ही नमाज़ें पड़े, एक आम महीने के जैसे बनाये इस साल के रमज़ान। जबकि वोह मेसेज सिर्फ ५ लोगों को भेजा था और कोई वायरल भी नहीं किया था लेकिन अल्लाह का करना ऐसा हुआ की २०२० में वाट लग गई। रमज़ान गए, जुमा गया नमाज़े गई, मस्जिदें बंद, उसके ऊपर हज गया क़ुर्बानी गई।
अभी तो काबा और रोज़ाये रसूल बंद हुआ है, अगर अभी भी नहीं सुधरे तो अल्लाह की रेहमत के दरवाज़े बंद हो जायेगें। यह बद्दुआ है। तुम करने जाओगे सवाब का काम और दर्ज होगा गुनाहों की फेहरिस्त में। सरे बाज़ार बरहना नज़र आवोगे। रेहमतुलील आलमीन के मिलाद से जिनको तकलीफ है फिर ऐसे लोगों को नबी की दुनिया में रहने की कोई ज़रुरत नहीं है। ऐसे लोग अपना ठिकाना किसी और दुनिया में तलाश लें।
यह तो अपनी अपनी फ़ितरी सोच है। वैसे भी सोशल मीडिया कम अय्याशी का अड्डा नहीं है। यहूद और नसारा तो लगे हैं पीछे, तो बस अब तैयार रहो दो रास्तों को चुनने के लिए एक अय्याशी, हरामकारी वाला दूसरा रहमतों वाला। अब देखना यही होगा की इन रास्तों पर चल कर कौन भटकता है और किस को हिदयात नसीब होती है। फिर असली वली और अल्लाह वाला वही होगा जो तमाम कीचड, गंदगी और गलाज़त को पार कर के अपने पैरहन पर उस गंदगी का एक भी क़तरा नहीं लगने दे और पाक कपड़ों के साथ अल्लाह के हुज़ूर हाज़िर हो और नमाज़ क़ायम रखे।
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