चिराग़ रौशन हम करेंगें यहाँ
होगी दूर तारीकी वहां।
छाता खोलेगें हम यहाँ
गर करोगे बदगुमानी तुम वहां।
सहाफी जुबेर
अक़वामे मुताहिदा की इंसानी हुक़ूक़ की अंजुमन (UNHRC) में पाकिस्तान और नेपाल को फिर से मुंतखिब कर लिया गया है, वाज़े रहे जहाँ चीन के मुज़ाहिरे में ख़ासा ज़वाल आया और वह अदना मार्जिन से एक सीट जीत पाया है, वहीं पाकिस्तान ने ना सिर्फ रिकॉर्ड मार्जिन से जीत दर्ज की है बल्कि अपना गुजिश्ता रिकॉर्ड मज़ीद मुस्तहकम और बेहतर किया है.
जनरल असेम्ली में बरोज़ मंगल को
हुए राये शुमारी में मुख़्तलिफ़ मुमालिकों में बेहतरीन इंसानी हुक़ूक़ की अमल करदा मुल्कों
में पाकिस्तान सरे फेहरिस्त रहा। चीन को १३९
वोट मिले, जबकि २०१६ में उसे १८० वोट मिले थे.
इस मुद्दे और चीन के ज़वाल पर ह्यूमन राइट्स वॉच के यूएन डायरेक्टर लुइस चारबोन्यू
ने एक तन्ज़िया ट्वीट किया। जिसका लब्बो लुबाब
यह दिखाता है कि 'कई सूबों में चीन में इंसानी हुक़ूक़ की ख़िलाफ़वर्ज़ी के रिकॉर्ड से परेशान
हैं.
भारत के नक़्शे क़दम चलने वाला और हर मुद्दे पर भारत की पोशीदा या खुली हिमायत करने वाले सऊदी अरब को ४ सीटों के लिए हुए राये शुमारी में ज़बरदस्त हार का सामना करना पड़ा है। यह सहाफी इस हार में भारत का ज़बरदस्त नुकसान देख रहा है। क्योंकि भारत सऊदी का और सऊदी भारत का हिमायती बन कर उभर रहा था। कश्मीर, फलस्तीन हिन्द पाक रिश्तों पर हर वक़्त सऊदी की राय पाकिस्तान से मुख़्तलिफ़ हिन्दुस्तानी मुवाफ़ेक़त की होती थी। लेकिन मालिके कायनात ने दिखा दिया जो राये पाकिस्तान की वही राये उसकी।
भारत ने सऊदी को एक मोहरे जैसा इस्तेमाल करने की जुर्रत की और अपने ख़स्ता हाल बोसीदा इंसानी हुक़ूक़ की नुमाइंदगी खुद ना करते हुए सऊदी को बार्रे सग़ीर में एशियाई और अलकाहील मुमालिकों की नुमाइंदगी करने के लिए राज़ी किया लेकिन उसको ९० वोट ही मिले, जबकी राये शुमारी जीतने के लिए उसे ९७ वोटों की ज़रुरत थी. सऊदी अरब की मक़बूलियत में भी भारी ज़वाल और पस्ती दर्ज की गई है। क्योंकि इसने २०१६ में १५२ वोट हासिल किए थे.
पाकिस्तान को १६९ और नेपाल को १५० वोट मिले. ये दोनों जुनूबी एशियाई मुमालिक तीन साल और काम करेंगे. उज्बेकिस्तान १६९ वोटों के साथ के साथ एशिया बेहरे अलकाहील से मुंतख़िब चौथा मुल्क रहा. भारत और बांग्लादेश २०१८ में आखिरी बार मुंतख़िब हुए थे और अगले साल के आखिर तक बाहर कर दिए जायेगें।
सहाफी ज़ुबेर की हालाते हाजरा पर नुक़्ता ऐ नज़र
पाकिस्तान तरक़्क़ी याफ्ता मुमालिकों की फेहरिस्त में तेज़ी से गामज़न होता जा रहा है और एक के बाद एक हदफ़ हासिल करने में कामयाब हो रहा है। पाकिस्तान अपना अक्स मुस्तहकम करता जा रहा है, जिस आस्क के ख़िलाफ़ बदगुमानी कर के दुश्मने पाकिस्तान, दुश्मने इस्लाम ने ग़लीज़ और गन्दा करने की ना काम कोशिश की थी। लेकिन गुजिश्ता कुछ अर्से से ख़ास इमरान खान की क़यादत के बाद आलमी बरादरी के नज़दीक पाकिस्तान का अक्स शफ़्फ़ाफ़ और खुशनुमा होता जा रहा है, और दुश्मन ज़लील, रुसवा और बेइज़्ज़त होता जा रहा हैं। طمطراق تیرا طمطراق जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने अपनी १० अक्टूबर को शाया एक उर्दू नज़म में किया है।
अस्क शफ़्फ़ाफ़ हो गया मेरा जब,
आप जो अश्कबार हुए रातों में,
जिस्म पाक कर हम आपके दरबार में आतें हैं
रूह पाक हो गई जब हम आपसे मिलने आतें हैं।
दुश्मने पाकिस्तान का हर ग़लीज़ और पुरालूद हरबा पलट कर उस ही जानिब दो गुनी ताक़त और क़ुव्वत से लौटा दिया जा रहा है।
हाल ही में दो नए चेहरे सियासत और मज़हबी रहनुमाई के लिए जाने जायेगे। एक पाकिस्तान के इमरान खान और दूसरा सऊदी का अय्याश, हरामख़ोर शेहज़ादा सलमान। जहाँ एक जानिब पाकिस्तान के इमरान ख़ान तमाम गुनाहों और बदकारियों से तोबा कर के मज़हबे इस्लाम के फलसफे पर चल रहें हैं।जिस पर के चलने का हुकुम क़ुरान देता है, हदीस में बयान है और जिस पर चल कर बड़े बड़े हाकिमे वक़्त सल्तनते चलाते वक़्त अपने मज़हब को कभी भी फरामोश नहीं करते थे। जो इस्लाम का इन्साफ, हक़पसंदी का हुकुम वही उनका होता था। तो जहाँ इमरान ख़ान ने हिदायत पाई वहीँ दूसरी जानिब शेहज़ादा सलमान मुनाफ़िक़ों के हमराह चला और काफिरों, इस्लाम दुशमन, मुसलमानों के क़ातिलों की बोली बोलने लगा। फिर उस ही शहज़ादे ने नया मज़हब ईजाद कर डाला जदीद इस्लाम। पस ऐसे ही लोग अल्लाह की हिदायत से महरूम रहेंगे, और मज़हबी वाल्दैन के होते हुए भी नस्लें गुमराह हो जाएगी, और जिनको अल्लाह हिदायत देगा वोह गुमराही के अंधेरों से उजाले की जानिब आएंगे और कामयाब होंगे।
उइगर मुसलमानों के हक़ की ख़िलाफ़वर्ज़ी की बोहोत सी खबरे भारत में मन्ज़रे आम हुई और भारत ने एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया की चीन इंसानी हुक़ूक़ के हलके में क़दम ना जमा सके फिर उसने कई मुमालिकों को चीन के खिलाफ इंसानी हुक़ूक़ की ख़िलाफ़वर्ज़ी में अपना हमख़याल बना लिया, बावजूद उन सभी के एतेराज़ के चीन भले ही अदना मार्जिन से लेकिन जीतने में कामयाब रहा. चीन की जीत इस बात की तस्दीक़ करती है की भारत का चीन और पाक के खिलाफ झूठा प्रोपोगंडा कुछ काम ना आया। इस तरह भारत को तीन ज़बरदस्त झटके लगे और तीन क़िले भारत के तबाह हो गए।
१. पाक का रिकॉर्ड मार्जिन से मुन्तख़िब होना और तमाम मुमालिकों में सफे
अव्वल रहना।
२. जिस सऊदी पर भारत ने जूआ खेला और दाव लगाया उसका ना सिर्फ पस्त
होना बल्कि पहले के मुक़ाबले मज़ीद मकज़ोर होना।
३. चीन के खिलाफ उदगीर मुस्लिम अवाम के खिलाफ फैलाया हुआ झूट फरेब कुछ काम ना आना। अब भारत को चाहिए की हमदर्दी दीगर मुस्लिम अवाम के लिए दिखाने के बजाये अपने मुल्क के मुस्लिम अवाम के लिए काम करे।
जिस पाकिस्तान के इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर बोहोत इश्तेआल अंगेज़ी करते थे झूट फरेब पर हसी मज़ाक़ करना मखौल उड़ाना लेकिन जब से इमरान पाकिस्तान में बे पनाह मार्जिन से मुन्तख़िब हो कर आये थे फिर भी इस्लाम और रसूले अरबी के सादगी के पैग़ाम को फैलाते हुए नज़र आते थे तभी इस सहाफी ने अपने तमाम मज़्मूनों में कहा था अब पाकिस्तान की तक़दीर तब्दील होगी।
इमरान ख़ान का अमल इस बात की तस्दीक़ करता था की वोह इस्लाम के पैरोकार और नबी सल्लम की सुन्नतों की पैरवी कर रहें हैं, ना की दिखावा। और जिसने अल्लाह के मेहबूब की सुन्नतों की पैरवी की और उनके इश्क़ में अपने आपको फ़ना कर लिया वोह शख्स रुसवा और ज़लील हो ही नहीं सकता।अल्लाह उसको इज़्ज़त देगा। और यही बात मेरे २०१८ के तमाम मज़मून में मेने इमरान के मुन्तख़िब होने के बाद कही है।
महज़ सऊदी का बाशिंदा होने से अल्लाह के इनाम और इकराम नहीं मिलते हैं
जो गुनाह किये हैं उसकी रूसवाई और ज़लालत तो मिल कर रहेगी। सऊदी हुक्काम काफिरों मुशरिकों मुनाफ़िक़ों को क़रीब
करते रहे और अल्लाह को दूर। मोदी को इसी सऊदी
ने इंसानी हुक़ूक़ का मुहाफ़िज़ का तमगा दिया दूसरा सऊदी का सबसे अज़ीम तमगा ऐ इंसानी दिया
इज़्ज़त अफ़ज़ाई की जिसका ज़ाफ़रानी पार्टी ने जश्न मनाया और हिंदुस्तान पाकिस्तान में मुक़ीम
मुस्लिम अवाम पर सख़्त तनक़ीद की, हमारे मोदी जी तो सऊदी में भी मक़बूल हैं, जहाँ से इस्लाम फैला और रसूले अरबी की पैदाइश गाह
है, वहां भी मोदी जी मक़बूल हैं। लेकिन बारी
इलाह को तो कुछ और ही मंज़ूर था। क्योंकि सऊदी
सल्तनत पर मोदी का सेहर असर कर रहा था सो वोह ग़ाफ़िल हुए। अभी अक्टूबर के पहले हफ्ते में शेह्ज़ादा सलमान
सऊदी के नज़दीक एक जज़ीरे पर रात की तारीकी में मग़रिबी मस्तूरातों के साथ उस तहज़ीब का
हिस्सा बन कर अय्याशी करते हुए मीडिया के कैमरे में क़ैद हुआ। फिर उसका दूसरा गुनाह क़तल करने का साबित हो चूका
है। बग़ैर किसी शराई उज्र उसने सहाफी खगोशी
का क़त्ल करवाया। तीसरा गुनाह इस्लाम को अपने
हिसाब से चलाने का गुनाह और नया मज़हब बनाना जदीद इस्लाम। जिसमे तमाम क़िस्म के जूए, शराबखोरी, मस्तूरातों
के साथ तालुकात जाइज़ हैं।
यह भी देखें
ہر گھر افضل، گھر گھر مقبول
हर घर अफ़ज़ल, घर घर मक़बूल
जो मुनाफ़िक़े इस्लाम नबी की मिलाद और आमद का जश्न बनाने पर फतवे लगाते हैं, क्या उनकी ग़ैरत इस बात की इजाज़त देती है की की अय्याश शहज़ादे की ना क़ाबिले बर्दाश हरकतों के ख़िलाफ़ भी फतवे दे सकें। जब दीन में किसी भी क़िस्म की तरमीम और इज़ाफ़त इन मौलवियों को बर्दाश्त नहीं वोह बिदअत हो जाती है, यहाँ तो शहज़ादे ने एक नया मज़हब शुरू कर दिया है, उसके ख़िलाफ़ एक भी फतवा नहीं आया।
यह मौलानाओं की जमात भी हाकिमे वक़्त से ख़ौफ़ ज़दा रहती है, जबकि अल्लाह से नहीं। इनका एक भी फ़तवा शहज़ादे सलमान के नए मज़हब के ख़िलाफ़ नहीं दिखा वहीँ आम मुसलमान पर हर ईद मिलाद पर फतवे जारी हो जातें हैं। मज़हब में इज़ाफ़त मज़हब में ऐसा काम करना जो नबी ने नहीं किया बिदअत है और हर बिदअती दलाला और हर दलाल जहन्नुमी। इनका फतवा आम मुसलमान के लिए होता है, ख़्वाह वोह मुसलमान नबी की आमद का जश्न बनाये अपने घरों में मिलाद और दरूद का एहतेमाम करे इनके नज़दीक वोह सब जहन्नुमी हैं। जबकी ऐसी महफ़िल सजाना जिसमे नबी की शान बयान की जाए नबी की नाते पड़ी जाए तो उस महफ़िल में अल्लाह के फ़रिश्ते नूर और रेहमत की बारिश करते रहतें हैं। जबकी होता क्या है नबी की आमद पर तो फतवे दे दिए जातें हैं लेकिन शहज़ादे की अय्याशी पर नहीं, बेरुन मुल्क मस्तूरातों के साथ मग़रिबी तहज़ीब के हामी हो कर रात भर गुनाहों की महफ़िल में शामिल रहा लेकिन एक भी फ़तवा नहीं आया।
वही मोदी के मदू करने पर भारत में सूफी इजलास में तमाम मौलाना अपना घागरा ऊपर उठा कर मोदी जी की एहलिया बन कर उसकी हम जींस ख़्वाहिशें पूरी करने के लिए उसके हरम में पहुंच गए।जबकी मोदी मुस्लिम नस्ल कुशी करने वाला इस्लाम को इज़ा पहुंचाने वाला दरिंदा है। फिर इनको सूफी का मतलब तो भी मालूम हैं इनकी हरकतों ने सूफी ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती, ख्वाजा बन्दे नवाज़, निज़ामुद्दीन औलिया (महबूबे इलाही), सलीम उद्दीन चिश्ती, सय्यद अली मीरा दातार इन तमाम वालियों के उसवाये हसना की अनदेखी की है, कोई भी सूफी किसी भी वक़्त के हाकिम के हरम का गुलाम नहीं बना। जो भी हाकिम होता था उन फ़क़ीरों के दर पर चोखट पर एड़िया रगड़ते हुए जाता था।
No comments:
Post a Comment