अज़ीज़ नाज़रीन,
ये बात किसी भी बा विक़ार और तालीमी आफ़ता दानिशमंद, बल्कि अब तो एक बग़ैर तालीम
आफ़ता मज़दूर ग़रीब रिक्शा पुलर, ठेला धकाने वाला,
बोझ उठाने वाले से भी पोशीदा ना रही की संघ
उससे मुनसलिक अवाम (शिद्दत पसंद हिन्दू) या उनकी सियासी रहनुमा बीजेपी वतन परस्ती का
झूठा नक़ाब पहन कर हर उस बदकारी, बदआमाली और गुनाहों में मुलव्विस रहतें हैं जिसका गुनहगार
भारत के दस्तूर, क़ानून की किताबों में और अदालती निज़ाम के हिसाब से सख़्त सज़ा का मुस्तहिक़
होता है. ये बात अलहदा है की अभी तक किसी
भी संघी दहशतगर्द, शिद्दत पसंद या किसी भी बीजेपी के रकून, वज़ीर या नुमाइंदे को सज़ा
होते हुए नहीं देखी है.
सही देखा जाए तो ये ग़फ़लत पिछली हुकूमतों की है की उन्होंने उस ज़हर, वायरस को
फरोग दिया जिसकी खेती होते ही इस सहाफी ने मुतावातिर तब की मरकज़ की कांग्रेस हुकूमत
के वज़ीरे अज़ाम सोनिया गांधी, वज़ीरे दाख़ला, वज़ीरे ख़ारजा, आला तरीन अदालत, सदरे जमुहरिया
बल्कि उसी तर्ज़े अमल पर महाराष्ट्र, वेस्ट बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के हुक्काम
के सभी आला ओहदेदारों को ना सिर्फ मोहताद किया था, बल्कि खदशा भी ज़ाहिर किया था अगर
इन जैसे अनासिरों को वक़त रहते ताबे नहीं किया तो उसकी तलाफ़ी शायद मुस्तक़बिल में आप
ना कर पाएं. वो तमाम ख़ुतूत और हुकूमत से किये
हुए राब्ते उसके ऊपर हुकूमत के जवाबात मेहफ़ूज़ कर के रखे हुए हैं.
इंदौर में जब २०१० में आर.अस.अस. ने लाठी डंडों और पिस्तौल के साथ मुज़ाहेरा
किया था और जुलूस निकाला था तब भी मरकज़ को इत्तेला की गई थी. १४ नवंबर २०१० को इस सहाफी ने मर्कज़ और मध्य प्रदेश सरकार को और सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट इंदौर को एक ख़त लिखा था. Who is the real army in India, Indian
Army or RSS?... भोपाल में जब संघ के दहशतगर्दों ने राणा प्रताप
जयंती के जश्न पर गोली चलाई थी और उसमे उनका ही एक दहशतगर्द मारा गया था तब भी इत्तेला
की गई थी. की इस तरह के जानलेवा हथियारों के
साथ मुज़ाहिरे सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम और क्रिस्टी अकलियतों को ख़ौफ़ज़दा करने के लिए निकाले
जा रहे हैं. उस ख़त में और बोहोत से सवालात
किये थे जिसकी एक कॉपी तब के वज़ीरे आला मध्य प्रदेश को भी भेजी गई थी.
कहने का मक़सद यही है की आज जो ज़हर का पेड बोहोत ही बड़ा हो गया है और भारत तक़सीम
की देहलीज़ पर आ गया उसकी वजह माज़ी में की गई हुकूमतों की ग़फ़लत है और संघ की दहशत थी. सोनिया गाँधी को सख़्त अलफ़ाज़ में ताकीद की गई थी
अगर ज़्यादा सख़्त क़दम उठाने की जुर्रत की तो तुमको भी तुम्हारे शोहर और सास के पास भेज
देंगे. अब सवाल ये ही उठता है उस वक़्त दहशतगर्दों
के ख़ौफ़ और डर से कोई सख़्त क़दम नहीं उठाया उनको रोकने के कोई इक़दाम नहीं किये तो आज
उसका कफ़्फ़ारा बड़ा अदा करना पड़ रहा है. दूसरी बात अगर हुकूमत का आला तरीन नुमाइंदा हक़ की
आवाज़ को नहीं सून रहा है और दहशतगर्दों से ख़ौफ़ ज़दा है तो उसको अपने ओहदे पर बने रहने
का कोई हक़ नहीं है. चाहे वो अदलिया हो या इन्तेज़ामियाँ.
२००८ में जनाब असादुद्दीन और उनके वालिद जब हयात थे तब उनको एक ख़त लिख
कर मुसलमानों के मसाइल से वाक़फ़ियत की थी.
फिर कांग्रेस हुकूमत के मुतवातिर ग़ैर मुनसेफाना, मुत्तासिब और मुस्लिमानों के
खिलाफ मुतावातिर ना इंसाफ़ी के ऊपर असाउद्दीन को एक ख़त लिखा था की आप कांग्रेस से अलग
हो कर मजलिस को मुस्तहकम करें और अपनी पार्टी की इमेज खुद बनाये. हिंदुस्तान में मुस्लिम आबादी कमो बेश १८% के क़रीब
है और ८० से ज़ाइद हलकों में मुसलमान अपने पसंद के नुमाइंदे का इंतेखाब कर सकतें हैं.
उस वक़्त तक इस सहाफी की ना कोई पहचान थी और ना ही उसका कोई तार्रुफ़ था. लेकिन असदुद्दीन ने इसकी राये को माना जैसा की एक
जमुहरियत पर यक़ीन करने वाली पार्टी को करना चाहिए किया और आज मजलिस की क़ौमी हैसियत
पर अलग पहचान है.
उस ख़त के बाद जब असदुद्दीन ओवेसी ने तंज़ीम कांग्रेस से अपने ताल्लुक़ात मुनतक़ा किये उसके ऊपर इस सहाफी ने एक ख़त उनको और तमाम मुस्लिम सियासतदानों को लिखे थे. Single cause with thousand differences.
उस ख़त के बाद जब असदुद्दीन ओवेसी ने तंज़ीम कांग्रेस से अपने ताल्लुक़ात मुनतक़ा किये उसके ऊपर इस सहाफी ने एक ख़त उनको और तमाम मुस्लिम सियासतदानों को लिखे थे. Single cause with thousand differences.
अब चलिए अपने एहम मुद्दे पर आतें हैं. ऐसा नहीं है की ज़ाफ़रानी दहशत और हिटलर को कोई सलाह
नहीं दी थी. जब २०१४ में वो वज़ीरे आज़म मुंतखिब
किया गया था उसको भी सलाह मशोरा दिया था. लेकिन
उसने सलाह तो नहीं मानी बरक्स जितनी भी ११ सलाह दी थी उसके मुख़्तलिफ़ काम करना शुरू
कर दिया. अब भुगत रहा है. भारत के आज ३६५ टुकड़े हो चुके हैं हर शहर में एक
टुकड़ा मौजूद है, और हर शहर टुकड़ों में तक़सीम हो चूका है.
इससे पेशतर इस सहाफी ने तीन क़ौमी नज़रिये पर एक राये पेश की थी. उसके ऊपर फौरी अमल किया जाए. एक और सालाह मरकज़ को देता हूँ. तीन क़ौमी नज़रिये से अगर मरकज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं रखती है तो मज़ीद सलाह देता हूँ, जिससे भारत की सालमियत भी बनी रहेगी और तक़सीम के अजदेह का भी फ़ौत होने के इमकान हैं.
१. तमाम संघ के दहशतगर्दों और शिद्दत पसंदों को जिला तून किया जाए. बचे हुए को हलाक़ कर दिया जाए.
२. बीजेपी तंज़ीम को मंसूख कर
दिया जाए और उसके तमाम रकून, नुमाइंदों को सेक्युलर तंज़ीमों में शामिल कर दिया जाए.
३. २०१४ तक संघ से ताल्लुक़ रखने वाले, बीजेपी के रकून, वज़ीर और शिद्दत पसंदों
के हमदर्द तमाम मुसलमानों को हलाक कर दिया जाए.
एक भी ऐसा मुसलमान ना रहे जो हिन्दू शिद्दत पसंदों और हिन्दू दहशतगर्दों का
हमदर्द हो उसको कहा जाए ये मुल्क आपका नहीं है आप पाकिस्तान, बंगलदेश या अफगानिस्तान
चले जाओ.
अगर इन तीन नज़ारियात पर हुकूमत अमल करती है तो शायद बात बन सकती है और
भारत का ना सिर्फ तक़सीम रूक जाएगा बल्कि भारत बनेगा एक आलीशान, अज़ीम और कामयाब मुल्क. इन तीन
में से अगर २ नंबर के नुक़्ते पर फ़ौरी अमल नहीं भी किया तो कोई हर्ज नहीं. २ नंबर वाला तो इख़्तियारी है. लेकिन १ और ३ लाज़मी हैं. क्योंकि जिस तरह की ज़हरीली ज़ेहनियत पनप चुकी है और इस तरीक़े के क़रारदार
हिन्दू मज़हबी ऐवान (धर्म संसद) में इख़्तेयार किये जा चुके हैं तो अब बाक़ी कुछ भी नहीं
बचा है.
मोदी इन्तेज़ामियाँ में अगर हिम्मत और क़ुव्वत हो तो ख़ुद इस बात की तस्दीक़
करे की उसकी मक़बूलियत में ज़बरदस्त पस्ती और ज़वाल आया है. फिर जिन जिन मसलों पर मोदी हुकूमत इस सहाफी और दानिशमंदों
मुस्लिम सियासतदाओं से मुख़्तलिफ़ राये रखती थी अब वही बोल रही है. जैसे की कल दिए हुए वज़ीरे दाखला का लव जिहाद पर
ऐवान में दिया हुआ क़ुबूलनामा की ऐसा कोई भी तरीकेकार हिकमत जांच एजेंसिओं की नज़र में
नहीं आया है. और ये महज़ अफवाह है.
फिर २०१३ से ले कर जनवरी २०२० तक जिस हिकमते अमली को ले कर मीडिया के
लंगूर और लँगूरनियाँ उधम मचा रहे थे, वो तो मुक्कम्मल नहीं हो सकी. २०१४ के बाद तो मोदी की मक़बूलियत का वो अलाम था
की तमाम अवाम गुलामी की ज़ंजीरों में अपने आपको क़ैद करने को तैय्यार था. मोदी, बीजेपी की हर अवामी तक़रीर से क़ब्ल हर चौराहे
हर नुक्कड़ पर मोदी अक़ीदत मंद बैठे हुए होते थे.
जो मोदी रुपी ग़ुब्बारे को देखते ही चिल्लाना शुरू कर देते थे. मोदी मोदी मोदी. और ये सब हिकमत मोदी ने मीडिया के लंगूर और लँगूरनियों
को फरोख्त कर के पैदा की थी. बावजूद इतना सब
कुछ होने के ये सहाफी हर दम मोदी के मुखालिफ में खड़ा था. और मोदी की हर हिकमत का खुल
के मुख़ालेफ़त करता था.
सियासी हल्क़ों
में अगर बात की जाए तो सिर्फ असदुद्दीन ओवेसी और अकबर उद्दीन ही मोदी की मुख़ालेफ़त करते
थे. लेकिन २०१३ से ले कर २०१७ तक काफी दबे
अलफ़ाज़ में और उतनी सख़्ती से हर मसले पर खुल के सामने आने से बचते थे. ख़ैर ये उनकी सयासी मजबूरी हो सकती थी. लेकिन ट्रिपल तलाक़ मुद्दे के बाद और मोदी के शरीयत
में तरमीम के बाद तो ओवेसी ब्रादरान जंग में खुल के उतर गए. लेकिन अभी भी तक़सीम पर ख़ामोशी इख़्तियार किये हुए
हैं. हर चंद दस्तूर अदलिया और हिन्दुस्तान
की सालमियत की दोहाही देते हुए नज़र आ रहे हैं.
में असद भाई से भी कहना चाहता हूँ की अब तिलों में तेल नहीं बचा है. ज़्यादा
निचोड़ के भी उतना ही निकलेगा जितना निकल चूका.
जितना मवाद, आलूद और ज़हर शिद्दत पसंदों के दिलों दिमाग़ में था वो सब ख़ारिज हो
चूका है. यहाँ तक की ज़ाफ़रानी कसाई सूबे का
वज़ीरे आला, गुज्जु कसाई वज़ीरे दाखला जब मार काट खून रेज़ी की बातें करना शुरू कर दें
तो समझने में देर नहीं करना चाहिए की अब अलहदा मुल्क की तहरीक शुरू करना होगी. इतना ही नहीं ख़ुद वज़ीरे आज़ाम जब कपड़ों से इंसान
की शिनाख्त करना शुरू कर दें तो बचा ही क्या है.
उसपे आला तरीन अदलिया का नुक़्ताये ऐ नज़र मुसलमानों के लिए मुत्तसिब तो आखिर
जो क़िला और मेहफ़ूज़ घर था वो भी तबाह और बर्बाद हो चूका है.
रही सही कसर फौज के सेपह सालार की ज़हरीली ज़ुबानी जामिया और अलीगढ़ के
तुलबा पर ऐतेराज़ करना. कश्मीर में १२ से १७ साला ना बालिग़ों को डिटेंशन केम्पों में
भेजने की ताईद और सिफारिश करना ऐ सब क्या है.
डिटेंशन सेंटर नहीं ऐ ज़ालिम फौजी दरिंदे उन मासूमों को गैस चेम्बर में रख कर
ज़हरीली गैस छोड़ कर हलाक करने की हिकमत पर अमल कर रहे हैं. ऐसा ही हिटलर की फौज ने किया
था और यही मोदी कर रहा है.
में असद भाई से गुज़ारिश करूंगा की ऐवान में खुल के तक़सीम पर मुबाहेसा
करें. फिर अगर कोई शैताने ऐवान बोलता है की
तुमको पाकिस्तान दे दिया वहां चले जाओ तो उसको खुल के जवाब देना चाहिए की ठीक है पाकिस्तान
की हुदूत और सरहद मज़ीद बढ़ाइए हम चले जायेगें.
३० करोड़ मुसलमान कहाँ रहेगें. दूसरी
बात १९४७ तक़सीम पर आज आप भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाओगे तो आज की सूरते हाल को ले कर
फिर से दोनों मुल्कों की सरहदें तरमीम होंगी.
हो सके तो सरहद तरमीम बिल लाना चाहिए.
इतना सब होने के बावजूद मोदी की साख और हिन्दुस्तान की तक़सीम बच सकती है. शर्त वही है संघ के दहशतगर्दों से जंग. एक एक दहशतगर्द को हलाक कर के फौज की कमान एक अच्छे क़ाबिल सिपह सालार के हाथ में सौंप दी जाए. इस जंग में संघ, बीजेपी और शिद्दत पसंद हिन्दू अवाम से मुवाफ़िक़ात रखने वाले मुसलमानों को भी हलाक कर दिया जाए या उनको पाकिस्तान, बांग्लादेश की सरहद तक महदूत कर दिया जाए.




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