अज़ीज़ नाज़रीन,
जैसा की आप तमाम हज़रात को बा ख़ूबी इल्म होगा की इस सहाफी का और उसकी तहक़ीक़ाती टीम का काम काज का तरीक़ेकार अमल लंगूर-लँगूरनियों से अलहदा होता है. जो सिर्फ हुकूमत की ज़ुबान बोलतें हैं और हक़ बायानी पर कफ़न डालते रहतें हैं.
नाज़रीन जिस हिसाब के हालात भारत में चल पड़ें हैं भारत तक़रीबन तक़सीम के मुहाने
पर आ खड़ा हुआ है, इसकी नीव खुद हुकूमत ने रखी है.
मोदी इन्तेज़ामियाँ को ना जाने कहाँ से इतना ग़ुरूर और तकब्बुर आ गया था की वो
किसी भी नुमाइंदे की बात सुनने को ख़ाली ना थे.
वो अपने ३६५ रकूने ऐवान पर पुर एहतेमाद थे, तो हर काम अवाम की हक़तल्फ़ी का कर
रहे थे. उनको ग़फ़लत हो गई थी की भारत अब कभी मज़ीद तक़सीम ना होगा.
इस सहाफी की तहक़ीक़ात २०१० से तक़रीबन सो फी सद दुरुस्त और सही होती है.
चाहे वो गुजरात २००२ की
ख़ून रेज़ी की तहक़ीक़ात हो या हैदराबाद और सहारंगपुर उत्तर प्रदेश में २०१४ में सिख और मुस्लिम दंगे और उसके बाद दीगर फसाद की हक़ीक़त बयानी, चाहे वो पठानकोट देहशती हमला हो ऊरी, या पुलवामा हर मसले पर सबसे क़ब्ल सही और दुरुस्त जानकारी देना ही इस सहाफी का मक़सदे ऊला है.
यहाँ तक की बेरुन मुल्क पाकिस्तान, श्री लंका, नूज़ीलैंड, इंग्लैंड, अमेरिका, अफ़ग़ानिस्तान, कुवैत जैसे मुमालिकों में जो भी देहशती वारदातें हुई उसमे भी तहक़ीक़ात तक़रीबन सही और दुरुस्त रही.
दहशतगर्द जाधव की फ़ासी भी इस सहाफी की तहक़ीक़ात पर मुनस्सिर है. जिसको लाहौर हमले के बाद बे नक़ाब किया गया था और साफ़ अल्फ़ाज़ में कहा था की पाकिस्तान को मज़ीद तोड़ने की साजिश बरसों से हो रही है और अब तो गले लग कर पीठ में खंजर घोपा जाएगा, दोस्त बोल कर गर्दन काटी जायेगी. भरोसे में ले कर क़त्ल किया जाएगा. नवाज़ शरीफ दर असल मोदी की ग़ुलामी में डूबा हुआ था. उसको पाकिस्तान को तोड़ने और दहशतगर्द जाधव के केस को आलमी अदालत में पस्त करने के लिए बोहोत बड़ी रक़म अदा की गई थी. वो तो सही वक़्त पर इमरान खान के हाथों पाकिस्तान की हुकूमत आ गई और पासा एक दम पलट गया. फिर उन तमाम ख़ुतूत पर फिर से तब्सिरा शुरू हुआ जो तहक़ीक़ात इस सहाफी ने आलमी बरादरी को मोहिय्या की थी.
नाज़रीन इस सहाफी को जिस हिसाब से रूझानात इन्तेख़ाब में मिलते हैं उसी तर्ज़े अमल पर किसी भी तंज़ीम की मक़बूलियत
और नुमाइंदे की जीत और हार का ग्राफ तेज़ी से तब्दील होतें हैं.
वैसा ही हालाते हाजरा पर भारत में तेज़ी से तब्दील हो रहें हैं. अपने गुजिस्ता मज़मूनों में इस सहाफी ने इस बात को मन्ज़रे आम किया है भारत की तक़सीम होने पर सेक्युलर भारत में अगर कोई वज़ीरे अज़ाम बनने का एहल है उसमे तीन सियासतदानों का नाम सामने आये थे.
१.
राजनाथ सिंह
२.
उद्धव ठाकरे और
३.
असदुद्दीन.
लेकिन देखिये महज़ २० या २५ दिनों में जिस तरह से तेज़ी से हालात तब्दील हुए हैं अवाम के नज़ारियात भी उसी तेज़ी से तब्दील हो रहे हैं. भारत की तक़सीम पर ज़्यादातर अवाम का मांनना है की हर रोज़ की इस अज़ीयत से और बखेड़े से एक बार का हिन्दू राष्ट्र बन जाए. लेकिन उसमे जो सेक्युलर सोच वाले हिन्दू हैं वो नहीं रहना चाहते तो साफ़ ज़ाहिर होता है फील वक़्त दबे अलफ़ाज़ में बटवारे की बात कर रहें हैं क्योंकि संघ, शिद्दत
पसंद हिन्दू राष्ट्र की बात करतें हैं, संघ के मोहन भगवत के हिसाब से भारत में रहने
वाला हर इंसान हिन्दू है, बाद में वो दुसरे किसी मज़हब का है. हिन्दू अवाम का एक हिस्सा अभी तक हिन्दू मुस्लिम
सिख ईसाई वाले भाईचारे के फलसफे के साथ सेक्युलर हिन्दुस्तान में रहने का क़ाइल है,
वो गांधी वादी सोच को फ़रोग़ करते हैं, और हिन्दू राष्ट्र में नहीं रहना चाहते. दानिशमंद ऐसी सूरत में एक और तक़सीम देख रहें हैं.
उसी हिसाब से अवाम के दरमियान सेक्युलर भारत में वज़ीरे अज़ाम की फेहरिस्त में भी काफी तब्दीली देखने को मिल रही है. जैसा की इस सहाफी ने अपने एक खबरनामे में तीन नाम तज़वीज़ किये थे उसके बरक्स अवाम की पसंद तब्दील है.
और वो वज़ीरे अज़ाम के लिए अपनी पहली पसंद असदुद्दीन को मानते हैं.
चाहे वो सेक्युलर हिन्दू हों या क्रिस्टी, सिख हो या दलित. मुस्लिम अवाम में तो १००% नज़रिया उनके ही हक़ में है.
जो तीन नाम निकल कर आये हैं वो इस तरह हैं.
१. असदुद्दीन ओवेसी
२. अरविन्द केजरीवाल
तीसरे नंबर पर एक नहीं दो नाम हैं.
३. राजनाथ सिंह और उद्धव ठाकरे.
अगर ये दोनों सेक्युलर भारत में रहतें हैं तो वज़ीरे अज़ाम की तीसरे नंबर की पसंद इन दोनों में से एक हैं.
अगर भारत की नूमाईंदगी मुस्लिम अवाम के हाथों आती है या भारत का एक मज़ीद तक़सीम मुस्लिम मुल्क की हैसियत से होता है तो दोनों ही सूरतों में वज़ीरे अज़ाम के लिए असदुद्दीन अवाम की पहली पसंद हैं. दूर दूर तक दूसरी और तीसरी नंबर की फेहरिस्त में कोई भी नहीं है. फिर भी दुसरे और तीसरे नंबर के लिए अवाम अकबरुद्दीन और अमानतुल्लाह के ऊपर तब्सिरा कर रहें हैं. दोनों ने ही अपने अपने हल्क़ों में रिकॉर्ड तोड़ जीत दर्ज की है.
जहाँ अकबरुद्दीन सबसे पहले जीत दर्ज करने वाले नुमाइंदे बने थे और महज़ २ घंटों में रिकॉर्ड १ लाख वोटों से ज़ाइद जीत दर्ज की थी वहीँ अमानत उल्लाह ने जीत का अपना खुद का पिछला रिकॉर्ड तोड़ डाला है.
नाज़रीन ख़ाकसार को एक सहाफी और तहक़ीक़ात करने वाला होने के नाते ऐसा कोई भी रास्ता नज़र नहीं आ रहा है की ये एहतेजाज की आतिश से बीजेपी और हुकूमत जल्द ही बरीउज़ज़िम्मा होंगे. भलें ही बीजेपी अपनी गलती मान ले और बोल दे की हमसे गलती हो गई भलें ही इस बात के वादे भी कर ले की ऐसी हिमाक़त मुस्तक़बिल में नहीं होगी
तब भी हुकूमत एहतेजाज से अपना पीछा नहीं छुड़वा सकती है.
ऐसा कहंतें हैं बीजेपी ने लंगूरों के ज़रिये शहद खाने के चक्कर में बया के घर को तोड़ डाला लेकिन उसको क्या पता था उस बया के घर के पास शहद का छत्ता है और अब वो सभी उसके पीछे पड़ गए. फिर सिर्फ अपनी गलती को तस्लीम कर लेने भर से वो क्या इन तमाम मुद्दों से पीछा छुड़वा सकती है. बिल
फ़र्ज़ मोदी हुकूमत ने अपनी गलती मान ली तो वो:-
१. क्या ऐसे तमाम पुलिस वालो के ऊपर एक्शन लेगी जिन्होंने अमन पसंद एहतेजाज करते हुए अवाम पर निशाना लगा क़त्ल करने की नियत और मंसूबे से सर और छाती पर गोलियां चलाई.
२. क्या मोदी हुकूमत ऐसे तमाम पुलिस वालों और हिन्दू दहशतगर्दों पर एक्शन लेगी जो रात के १२ बजे के आस पास मुसलमानों के घरों पर हमलरेज़ होतें हैं और ज़ईफ़ इंसानों के पैरों पीठ पर डंडे मार मार के उनको अधमरा कर देतें हैं. क्या ये ज़ईफ़ इंसानों को मेहफ़ूज़ रखने जैसे क़ानून की खिलाफ वर्ज़ी नहीं है.
३. घरों की मस्तूरातों पर जब्र करतें हैं बंदूक दिखा कर मासूम बच्चो को ख़ौफ़ज़दा करतें हैं इन सब की चीख़े उनको सुनाई नहीं देती.
क्या ये मस्तूरातों को मेहफ़ूज़ रखना बच्चो को मेहफ़ूज़ रखने जैसे क़ानून की खिलाफ वर्ज़ी नहीं है.
४. क्या मोदी हुकूमत ऐसे हिन्दू अनासिरों पर कारवाही करेगी जो अस.पी सियसतदाँ के ना सिर्फ बंगले में घुसे बल्कि उनके बंगले की पूरी दिवार तोड़ डाली और घोड़े के हाथ पैर तोड़ दिए. क्या ये जानवर पर ज़ियात्ती रोकने क़ानून की खिलाफ वर्ज़ी नहीं है.
५.
इतना ही नहीं पुलिस वाले और हिन्दू दहशतगर्द डाका ज़नी करतें हैं जिस मुस्लिम बच्ची की शादी के ज़ेवर और नक़द रखा था उसको लूट कर ले जातें हैं. क्या ये तजिराते हिन्द में दफा ३९८ के तहत डाकाज़नी, नकबज़नी का जुर्म नहीं बनता है.
बिल फ़र्ज़ मोदी इन्तेज़ामियाँ अपनी तमाम क़ुव्वत और शिद्दत के बल पर इन सभी मामलो
के ऊपर कफ़न डाल के उनको हलाक कर भी दे तो जो एहतेजाज की फेहरिस्त है वो तवील और तवील
होती जा रही है, उसका क्या करेगी. अभी तो डॉक्टर कफील की रिहाई के लिए एहतेजाज शुरू होगा.
जो ट्वीटर पर ट्रेंड कर रहा है. उनके ऊपर किस वजह से योगी हुकूमत ने रा.सू.का. कानून लगाया है. उसके बाद जितने भी बे गुन्हा जेलों में हुकूमत के खिलाफ एहतेजाज करते हुए बंद कर दिए गए योगी हुकूमत के खिलाफ उनके लिए एहतेजाज होगा.
जामियां मिलियाँ इस्लामियां और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पुलिस एक्शन पर एहतेजाज. फिर जे.एन.यूं. में हिन्दू दहशतगर्दों के हमले पर एहतेजाज. हाल ही में गार्गी का नया मामला सामने आ चूका है. वहां पर तुलबाओं के साथ ना वाक़िफ़ अनासिरों ने जय श्री राम के नारे लगा कर तुलबाओं पर जिन्सी हमला किया था वो भी एहतेजाज तूल पकड़ता जा रहा है. अल ग़र्ज़ अगर एहतेजाज की फेहरिस्त गिनाना शुरू करूंगा तो कमो बेश १० से ज़ाइद ऐसे पेचीदा और ग़ैर कानूनी मसले हैं जिन पर एहतेजाज होगा.
अभी तो शाहीन बाग़ का मसला हल नहीं हुआ और मज़ीद १० से ज़ाइद मामले एहतेजाज की फेहरिस्त को छु रहे हैं. ऐसे में अगर हर एहतेजाज को कम से कम २ महीनों का वक़्फ़ा भी माना जाए तो भी २० साल तक मोदी इन्तेज़ामियाँ एहतेजाज से पीछा नहीं छुड़वा सकती है.
अभी तो ये एहतेजाजिओं की फेहरिस्त है. संघ और हुकूमत की जानिब से मज़ीद नए मसले जिसमे फिर से टकराव होगा वो तो लिए ही नहीं हैं. जैसे यकसां क़ानून उसकी सुगबुगाहट शुरू हो गई है. बुर्का बेन, कसरते अज़वाज, ब्रेस्ट टैक्स (मूल कर या नंगी प्रथा) जैसे कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर अगर तब्सिरा किया गया तो हालात बद से बत्तर हो जायेगें.
कुल मिला के मसले का लब्बो लुबाब ये निकल कर आया है की अब ये आग हरगिज़ हरगिज़
नहीं बुझेगी. इसमें ये सहाफी हिन्दुस्तान के
मुस्तक़बिल को जलता हुआ देख रहा है. इस आग में
जलेगा हर वो इंसान जो इस आतिशबाज़ी में और ना इंसाफ़ी में शामिल था. इसमें वो बीजेपी के मुस्लिम रहनुमा भी जलेगें जो
हर ज़ुल्म के ऊपर अपने आकाओं और दहशतगर्दों के मुहाफ़िज़ बनते हैं. चाहे वो सय्यद हो या जीलानी. नाम के आगे सय्यद लगा लेने से कोई आले रसूल नहीं
हो जाता उसी तरह पीछे जीलानी लगा लेने से कोई बड़े पीर साहब जितना बुजुर्गवार और मुतक़्क़ी
नहीं हो जाता. दूसरी बात अगरचे तुम हक़ीक़ी सय्यद
ज़ादे हो, तो भी तुम्हारे बद अमाल और बदकारियाँ
तुमको इताबे इलाही से नहीं बचा सकते. जब नूह
अलैहे सलाम के खुद बेटे को ग़र्क़ाब कर दिया गया.
क्योंकि वो ज़ालिमों और काफिरों में शामिल उनकी ताईद करता था. इस मुद्दे पर दो मज़मून लिख चूका हूँ. वहीँ अस्हाबे
कहफ़ के साथ जो पांच बारगुज़ीदा बन्दों के बीच
रहा उनकी हिफाज़त की तो उसके ऊपर रेहमत बरसी.
तो भारत में जो भी मुस्लिम अपने नाम के आगे सय्यद और पीछे जीलानी लगा कर बीजेपी
की ग़ुलामी करतें हैं, संघ और शिद्दतपसनदों के पैरोकार हैं ऐसे तो पहले आतिशे नार में
जलेगें. सिर्फ किताब देख लेने भर से कोई
आलिम नहीं हो जाता, बीजेपी की ग़ुलामी लिखवा लेने उनकी २ इंच को अपनी जागीर समझ लेने
से कोई अमीर नहीं हो जाता.
असली अमीर तो वो है जिसने हक़ीक़ी सौदा किया और हक़ पर क़याम रहा. ये बात तो इन मुनाफ़िक़ों को भी मालूम होंगी के ज़ुल्म
की ताईद कर के वो कुछ तो ग़लत कर रहे हैं. लेकिन
क्या करें मजबूर हैं. अब इनके गलों में लानत
का तोग डाल दिए गए हैं और कानों में सीसा,
के उनको चीख़ बाज़ों के हक़ की चीख़े सुनाई ही नहीं देती हैं.
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