Thursday, 27 February 2020

मुबारक ताहिर आप दुसरे एहसान ना बन सके.

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था हम दिल्ली में अब दूसरा १९८४ नहीं बनने देंगे.  ख़ैर कोर्ट के नज़ारिये को तो पुलिस और आतंकिओं ने अपनी शर्मगाह से निकलते हुए पानी में उड़ा दिया.  लेकिन ताहिर जिनके पीछे आज लंगूर और लँगूरनिया फ़िज़ूल पड़े हैं में उनसे कहना चाहता हूँ मुबारक आप दुसरे एहसान जाफरी नहीं बने.  ये मुबारक बाद आपको सिर्फ सहाफी जुबेर की जानिब से है और तमाम १५ करोड़ मुस्लिम अवाम की जानिब से नहीं है.  क्या पता कोई जुम्मन मियां उठ के बोल दे तुम्हारे १५ करोड़ मुसलमानों मे, में नहीं शामिल हूँ.  दिल्ली को जो सज़ा मिली है वो इन जुम्मन मियाओं की वजह से ही मिली है.  हर मसले पर जो अपनी एक टांग ले कर भागते हैं उसकी सज़ा है.  घरों से निकाल निकाल कर काट डाला.

दिल्ली हिन्दू दहशतगर्द हमले की कालिख़ जैसे जैसे साफ़ हो रही है बे हद डरावनी तस्वीरें मज़ीद सामने आ रही हैं.  किस तरह से मस्जिद के इमाम साहब का चेहरा पूरी तरह से जल चूका है.  किस तरह से खूनम झार मुस्लिम शख़्स बरहना अपनी जान बचा के भागते हुए देखा जा सकता है.   इस दंगे मे ३ मस्जिदे २ मज़ार और एक मदरसा पूरी तरह जला के राख कर दिया गया.  लेकिन मज़े की बात ये रही की चाँद पुर ७०% मुस्लिम आबादी और महज़ ५% ब्राह्मण बाक़ी दीगर अवाम लेकिन एक भी मौत किसी भी हिन्दू भाई की नहीं हुई और जो तीन मंदिरें थी वो भी मेहफ़ूज़ हैं.  अभी तक किसी भी मंदिर को तोड़ने या किसी भी हिन्दू इबादत गाह को इज़ा या नुकसान पहुंचाने की कोई ख़बर नहीं है.

ख़ैर जो होना था सो तो हो गया जो दहशतगर्द सरग़ना कपिल मिश्रा चाहता था वो तो हो गया.  अब उसके महज़ निशान बाक़ी रहेंगे.  जो कभी नहीं मिटेंगे और जब जब अवाम उनको देखेगा अगली पारी खेलेगा.  इस सब गहमा गहमी में ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर और लँगूरनियाँ कहाँ से एक मुस्लिम कॉर्पोरेटर को पकड़ लाये की उन्होंने दंगों में अपने घर पर पथ्तर और बम जमा किये थे.  अव्वलन तो ये सब बकवास है और झूट है फरेब है सिर्फ और सिर्फ हिन्दू दहशत को पोशीदा रखने की एक कावायत और कपिल मिश्रा जैसे आतंकी को बचाने की साजिश. 

दूसरी बात ताहिर हुसैन ने अगर कुछ भी अपनी हिफाज़त के लिहाज़ से किया है तो बिलकुल सही है दुरुस्त है. में ताईद करता हूँ उनके इस जज़्बे की और अमल की, उनका अमल बाइसे फख्र है ना की बाइसे मज़्ज़म्मत.  लंगूर क्या चाहते थे की वो दुसरे एहसान जाफरी बन जाते और उनकी बेवा भारत की अंधी अदालत के चक्कर पे चक्कर लगाती रहती.  जैसे की आज बुढ़ापे में एहसान की बेवा अदालत के चक्कर लगा लगा कर मायूस हो गई लेकिन इन्साफ नहीं मिला. 

अगर ये दंगा होता और पुलिस का मुनसेफाना किरदार होता सभी फ़रीक़ों के एक नज़र से देख कर दंगा रोकने की हिकमत होती तो ताहिर का अमल मज़्ज़मत के काबिल होता.  लेकिन ये ना तो ये दंगा था और ना ही वो पुलिस जो अवाम की हिफाज़त करती है. पुलिस तो खुद ही दंगा कर रही थी, मुस्लिम अवाम की दुकाने तोड़ रही थी.  दहशतगर्दों के साथ गोलिया चला रही थी.  बे गुनाह मुसलमानों को घरों से निकाल कर रोड पर गन्दी गन्दी गालियां दे कर पीट पीट के शहीद कर रही थी.  इतना ही नहीं ज़ख़्मियों को हॉस्पिटल नहीं जाने दे रही थी. मर जाने दो इनको इनके लिए इस देश में कोई जगह नहीं है, ऐसे तास्सुरात.  पुलिस का काम होता है अवाम को तहफ़्फ़ुज़ देना उनकी जान माल की हिफाज़त करना.  लेकिन जब पुलिस एक दहशतगर्द की तरह काम करना शुरू कर दे, पुलिस जब डाकू की तरह काम करना शुरू कर दे पुलिस जब शैतानों दरिंदों की तरह काम करना शुरू कर दे, बे गुनाहों को सिर्फ मज़हब की बुनयाद पर जब्र करना शुरू कर दे खून करना शुरू कर दे तो उसको पुलिस तसुव्वर करना फ़िज़ूल है अब ऐसे दरिंदे, शैतान, ज़ालिम और दहशतगर्द की जो सजा है वही पुलिस को भी देना चाहिए मतलब सज़ा ये मौत.

फिर जिस दहशतगर्द कपिल मिश्रा ने तमाम दंगे की शुरूवात की थी जिसकी संगे बुनयाद उसने इंतेखाब से क़ब्ल ही रख दी थी और अपनी खुनी दरिंदा सिफ़त सोच को ज़ाहिर कर दिया था जब उसने कनॉट पैलेस पर कम से कम ५ से १० हज़ार वाली भारी भरकम हुजूम को उकसाने वाला नारा दिया था.  उसके बाद गोलियां भी चली.  फिर दंगा हो गया.  अब उसके बाद भी संघी और उसकी मुहाफ़िज़ कपिल मिश्र के मुवाफ़ेक़त मे बयान दे रहे हैं.  बोल रहे हैं हमें फख्र है कपिल तुम पर मुल्लो को अच्छा सबक़ सिखाया. 

जब आतंकिओं की ये सोच है तो हमारी सोच भी फिर वैसी है बनेगी.  बात ये है की ऐसे तमाम हालात किस की पैदा करदा है.  मोदी और बीजेपी के.  क्या वजह है की आज अवाम का ख़ास मुस्लिम अवाम का पुलिस, क़ानून, फौज पर से यक़ीन उठता जा रहा है. उनकी सुप्रीम कोर्ट पर एतेमाद की धज्जियाँ किस ने उड़ाई.  क़ानून पर उनके यक़ीन का क़त्ल किस ने किया खुद सुप्रीम कोर्ट ने.  उसके ऊपर पुलिस का एक तरफ़ा हमला और कारवाही तो ये दिन अभी आगे मज़ीद देखने को मिलेंगे. 

अगर ताहिर ने कुछ भी अपनी हिफाज़त के लिए किया है तो कुछ भी गलत नहीं है.  इससे पहले की अवाम उनको हलाक कर देता और पुलिस खड़ी खड़ी तमाशबीन बनी रहती कम से कम आज वो ज़िंदा तो हैं.  उन्होंने ना सिर्फ अपनी बल्कि अपने अहले ख़ाना की दरिंदों से दहशतगर्दों से खाकी आतंकिओं (पुलिस) से जान बचाई है.  एहसान जाफरी को खूब एतेमाद था मोदी पर क्या हुआ.  फोन पर फोन लगाते रहे. अस.ओ.अस. भेजते रहे लेकिन ना सिर्फ उनको बल्कि उनके साथ ९७ लोगों को ज़िंदा जला दिया.  इतना ही नहीं पहले उनके हाथ पैर काटे फिर उनकी दौलत लूटी बिल आखिर आतिशे नार कर दिया.  

केजरीवाल अपना पड़ला झाड़ रहे हैं और बोल रहे हैं ताहिर को दुगुनी सज़ा दीजिये बिल फ़र्ज़ अगर मुजरिम आप ही पाए गए तो क्या सज़ा तज़वीज़ करते हो अपने लिए. 

Journalist Zuber 

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