Friday, 14 February 2020

सब कुछ लूटा के होश में आये तो क्या किया.

 احتجاج کی ایسی چلی آندھی 
کی ختم ہوی حاکم کی آزادی
جن طالبوں کےہاتھوں مے 
تھے کبھی قلم 
 انکے ہاتھوں نے اٹھا لیے پرچم 
ظالموں کے ہاتھوں مے اے ڈنڈے 
گفتار کے غازی ہوے ٹھنڈے 
              
صحافی زبیر  


एहतेजाज की ऐसी चली आंधी
के ख़त्म हुई हाकिम की आज़ादी
जिन तालिबों के हाथों में
थे कभी क़लम
उनके हाथों ने उठा लिए परचम
ज़ालिमों के हाथों में आये डंडे
गुफ़्तार के गाज़ी हुए ठन्डे

सहाफी ज़ुबेर 
               

अज़ीज़ नाज़रीन,

बिल आखिर बीजेपी को अक़्ले सलीम ही गई और अपनी गुजिस्ता की हुई ग़लतियों पर पशेमानी ज़ाहिर कर रही हैलेकिन अब ऐसी ग़लतियों के लिए कोई तलाफ़ी नहीं हैऔर अब तो काफी देर हो चुकी हैअब बीजेपी और शिद्दत पसंदों का पेवस्त किया हुआ ज़हर अपना काम कर चूका हैअब अगर तलाफ़ी और होशमंदी की बातें ये बीजेपी के नुमाइंदे और वज़ीर कर रहें हैं तो उसका कोई फायदा नहीं दिखेगा. जो नुकसान होना है वो तो हो कर रहेगा

नाज़रीन सहाफी जब से ख़िताबत की दुनियां में आया है तब से तमाम उन पेचीदा मुद्दों पर हुकूमत से सख़्त तरीन अज़फ़ाज़ में सवाल जवाब करने की कूव्वत और हिम्मत रखता है, जिनकी हुकमत नज़र अनदेखी करती है. २०१४ से लेकर २०१७ तक सहाफी ने कश्मीर को ला इलाज़ नासूर तस्सव्वुर किया था२०१७ के बाद मज़ीद दो नासूरों का ज़िक्र  किया था एक कच्चा है और एक पक रहा है२०१९ आते आते बाबरी मस्जिद तनाज़ा नासूरों की फेहरिस्त में जा पहुंचीहाल ही में जो तक़सीम की सियासत संघ, बीजेपी और शिद्दत पसंद हिन्दू अवाम ने शुरू की है वो अब तीसरे नासूर की पेशबंदी कर रही है.

जिस तरीक़ेकार हिकमते अमली के साथ हूकूमते हिन्द और दीगर ज़ाफ़रानी हुकूमतों ने तक़सीम की सियासत कर के मुस्लिम अवाम पर जो शिद्दत मचाई है और जिस तरह इस सहाफी ने तहक़ीक़ात की है उसको ऐसी कोई सूरत नज़र नहीं रही है की ये जिन्गारी जो शिद्दत पसंदों ने भड़का दी है वो क़ब्ल अज़ वक़्त ख़त्म होगी.    

एहतेजाज करते हुए अवाम पर निशाना लगा का गोलियों से हलाक़ करना फिर पुलिस का उनकी गिरती हुई लाशों मर मज़ाक़ करना. मस्तूरातों पर जब्र करना शिद्दत मचानायहाँ तक की हाल ही में १० फरवरी को जामियां की तुलबा और दीगर मस्तूरातों के ज़ाती आज़ा पर पुलिस की लातें मारना और उसके आज़ा पर चुमटी काटना ये ऐसे मामले हैं जो किसी भी बा विक़ार और इज़्ज़तदार शहरी को झिंझोड़ सकतें हैंइतना ही नहीं जब ख़बरनामे में ये बात मंज़ारे आम पर आई तब हिन्दू अवाम की जानिब से ये कहना की पुलिस ने गलती की उनकी शर्मगाहों में डांडा डाल देना थाकुछ का तस्सव्वुर था रोड पर लिटा कर ज़िना बिल जब्र कर देना था.  ये उस ज़हर का असर है जो हिन्दू अवाम के दिलों दिमाग में मुस्लिम-क्रिस्टी-दलितों के ख़िलाफ़ मुतवातिर पेवस्त किया जा रहा था.  तभी इन हिन्दू अवाम की सोच दरिंदा सिफ़त हो गई.  इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ बीजेपी के शिद्दत पसंद सियासतदानों की ज़ुबानों से निकले गलीज़ और गंदे आलूद की वजह से है

नाज़रीन जो ज़हर और आलूद बीजेपी और संघ ने अपने मासूमों के ज़ेहनों में २०१२ से हिन्दुस्तानी सतह पर भरने का काम शुरू किया था अब उसके नतीजे दिखने को मिल रहे हैंहालांकि संघ ने तो शुरूआत १९४७ से ही कर दी थीलेकिन महात्मा की हलाकत के बाद कई सालों तक गुमनामी और बंदिश के अंधेरों में ग़र्क़ाब रहने के बाद २००२ में पहली बार संघ ने बड़े दहशतगर्द हमले को अंजाम दिया था और वो महज़ एक तजुर्बा था उसकी असली नुमाइश तो क़ौमी सतह पर करनी थीफिर २००२ में हुकूमत की जानिब से रियासत की ज़ेरे सरपरस्त दहशतगर्दी  के फलसफे को भी फ़रोग़ मिलीजिसमे हुकूमत के नुमाइंदे पुलिस, इंतेज़ामिया, तबीब (डॉक्टर्स), दानिशमंद, ताज़िर और सभी हिन्दू अक्सरियत अवाम दहशतगर्दी में शामिल थे.

बीजेपी शदीद ग़फ़लत की नींद में सो रही थी और उसको हमसे कही तो गलती हो रही है ये फैसला लेने में इतना वक़्त लग गयाअसल में इसमें भी बीजेपी की गलती नहीं है उसके आला ओहदेदारों की अक़ल पर परदे डाल दिए गए थे और सोचने समझने की ताक़त और क़ुव्वत छीन ली गई थीजैसा की अपने गुजिश्ता तमाम मज़मूनों में ये सहाफी चीख़ चीख़ कर शिद्दत पसंद हिन्दू, बीजेपी और संघ से कह रहा था की जब तुम्हारे बुरे दिन शुरू होंगे तुम्हारी अक़्लों पर परदे डाल दिए जायेगे और सोचने समझने की ताक़त छीन ली जायेगी.   तुम्हारी ज़हानत को जहालत में तब्दील कर दिया जाएगा, और तुम हर काम उल्टा करोगे.   

दूसरी बात जो पीछे तक़रीबन ज़्यादातर मज़मूनों में लिखी है की तुम कुछ अच्छा करने के बारे में सोचते ही रह जाओगे और वक़्त निकला जाएगा और जब कुछ भी अच्छा करोगे बोहोत देर हो चुकी होगी. वही सब कुछ लफ्ज़ बा लफ्ज़ हर्फ़ बा हर्फ़ बीजेपी के साथ हो रहा हैजिन्गारी जब सुलगी थी तभी उसके ऊपर ठंडा पानी डाल उसको खामोश कर दिया जाता तो वो आज की तारिख में शोला नहीं बनती.  

बीजेपी ने जिन हिन्दू शिद्दत पसंदों और उनकी दहशत की जिन्गारी को मज़ीद हवा दी और उसको वक़्त रहते बुझाने के कोई भी दुरुस्त इक़दाम नहीं किये आज वही जिन्गारी शोला बन कर तमाम हिन्द को आतिशे नार कर रही हैअब जो ये आग लग चुकी है वो क़ब्ल अज़ वक़्त बूझने की कोई सूरत इस सहाफी को नहीं दिखती हैबरक्स मज़ीद पेचीदा होगी

बरहाल भारत एक और तक़सीम के रास्ते पर चूका है अब बीजेपी को बजाये आग बुझाने के और अपनी गलती तस्लीम करने के तक़सीम के बारे में संजीदगी से सोचना ही पड़ेगाजब हालात पेचीदा हो रहे थे तब दानिशमंदों की हिदायत और तजवीज़ों पर तो अमल किया नहीं अब पचता रहे होएक और बात कहता हूँ अगर हुकूमत ने कुछ संजीदा फैसले नहीं लिए तो मुस्तक़बिल में हालात भयनक डरावने होने वाले हैंसंजीदा फेलसे लेना ही पड़ेगे.     

इस तरह के हालात और मज़ीद पेचीदा होने से पेश्तर हुकूमत के फौरी फैसले लेने होंगेदहशतगर्दों ने अवाम के दिलों दिमाग में जो ज़हर पेवस्त किया था वो अब तमाम भारत में फ़ैल चूका हैइस सहाफी को ऐसे हालात में सिर्फ और सिर्फ - तज़वीज़ समझ में आती हैं

१.     हुकूमत तीन क़ौमी नज़रिये पर अमल करेजिसमे भारत का मज़ीद एक और बटवारा करना पड़ेगाएक बनेगा हिन्दू राष्ट्र और दूसरा सेक्युलर भारत.

२.   संघ के दो क़ौमी नज़रिये को आगे बढ़ाया जाएतमाम मुसलमानों को पाकिस्तान बांग्लादेश जिलातून किया जाएलेकिन इस तज़वीज़ में पाकिस्तान बंगलादेश की हुदूत और सरहद बढ़ाना पड़ेगी और तरमीम करना होगीक्योंकि अगर आज २०२० में तमाम मुस्लिम अवाम को पाक या बंगलादेश भेजा जाता है तो १९४७ के क़रार पर फैसला नहीं होगाआज की तारीख़ में मौजूदा हालात को मद्दे नज़र रखते हुए सरहद को फिर से तरमीम करना पड़ेगा.

३.     हुकूमत की नुमाइंदगी मुसलमानों के हाथों सोपी जाएक्योंकि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने हुकूमत मुगलों से ली थी फिर कंपनी बहादुर ने हिन्दू अवाम को कैसे दे दीवापिस बादशाहत आना चाहिए और हुकुमरानी मुसलमानों के हाथ में.

जिस तरह के हालात भारत के बन गए हैं और आग इस क़दर केहर बरपा रही है की हर दुसरे रोज़ कोई ना कोई बखेड़ा होता रहेगाहूकूमते हिन्द को अगर मज़ीद बर्बादी नहीं देखनी है तो फ़ौरी कोई ना कोई सख़्त क़दम उठाने ही होंगेनहीं तो मुक़द्दर  में बर्बादी तो कोई भी इंसान अपने हाथों से नहीं लिखता है बरक्स उसके बदआमाल और बदकारिया उसको पस्ती, अँधेरे की जानिब और नेक अमाल खुशहाली, उजाले के जानिब ले कर जातें हैं

फैसला है आपका आख़िर वतन तो है आपकाआपको अँधेरे से रौशनी की जानिब जाना है या मज़ीद अंधेरों में ग़र्क़ाब होना है. 

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