लेचिस्तान के आदमखोर इंसानों के ज़हर का वो आलम हो गया है की अब ये लोग मुस्लिम दलित समाज के लोगों का खून पीने और हुजूम के साथ हलाक करने के बजाये जानवरों को अपनी नपुंसकता और कमज़ोरी का शिकार बना रहे हैं.
इंसानों के बाद नंबर अब जानवरों का है. गुजिस्ता
साल महाराष्ट्र मे वाशिंद के अम्बरनाथ गाँव में एक लंगूर को हिन्दू जनता ने पीट पीट के मार डाला था ओर उसकी लाश को पेड़ से लटका दिया था. आज ही उत्तर प्रदेश के पीलीभीत मे तारीख़ २६.०७.२०१९ तक़रीबन एक साल बाद जानवर पे दूसरा हूजूमी तशद्दुत सामने आया है. लेकिन अब लंगूर नहीं था यहाँ
अब एक शेर को पीट पीट के अवाम ने हलाक कर दिया.
जिस बेदर्दी से लंगूर को मारा गया था उसी बेदर्दी से शेर को मारा गया. लंगूर को मारते हुए वीडियो इस सहाफी ने अपने मज़मून
और खबरनामे में शाया किया था. उतनी ही बेरहमी से शेर को मारा गया है. हालांकि वो वीडियो
ये सहाफी शाया नहीं कर रहा है. शेर कभी टांग
ऊपर उठता है कभी सर ज़मीन पे पटकता है. फिर डंडों और लाठियों की ज़र्ब बर्दाश नहीं कर
सका और ज़मीन पे बे बस मजबूर हो कर लाठी डंडे खाता रहा. तब तक अवाम उसपे लाठी डंडे बरसाते रहे जब तक की
उसने हिलना नहीं छोड़ दिया. हिन्दू अवाम में
से एक चिल्लाता है मार डालो साले को यही ख़तम कर दो. ये तो अच्छा हुआ की मारते हुए दहशतगर्दों ने शेर से अपना पसंदीदा नारा नहीं लगवाया. नहीं तो उससे भी कहते लगा नारा जय जय श्री.... और आतंकी के लंगूर के नाम पे नारा लगवाते लगा नारा जय जय वीर......
जैसे आहिस्ता आहिस्ता इन आदमखोर इंसानों की हिम्मत और हौसला बढ़ता गया था क्योंकि उनके एक मुस्लिम को मारने पे उनके खिलाफ कुछ रद्दो अमल नहीं होता था तो उनकी हिम्मत में इज़ाफ़ा होता रहा. फिर एक के बाद दो और कभी कभी ३-३ और ४-४ को एक साथ हुजूम ने हलाक कर दिया. वैसे ही अब इनका अगर जानवरों पे हूजूमी तशद्दुत से मारने पे कोई अमल नहीं हुआ तो इनका मज़ीद हौसला बढ़ेगा, और हर दुसरे रोज़ कोई ना कोई जानवर को हुजूम के हाथों अपनी जान गवाना पड़ेगी. मालूम रहे की २९ जुलाई को आलमी टाइगर डे है. इसमें शेर को बचाने उसको मेहफ़ूज़ करने का अज़्म किया जाता है.
इतना ही नहीं इनके हौसले में इज़ाफ़ा करने वाले सिर्फ और सिर्फ हिन्दू दहशतगर्दों के पालनहार और अड्डे पे बैठे दहशतगर्दाना ज़ेहनियत हैं. जो ऐसे लोगों की जेल
से रिहाई पे मिठाइयां तक़सीम करतें हैं और उन लोगों की गुल पोशी करतें हैं. गुलपोशी और हार फूल किस इंसान के किये जाते हैं जिसने कोई बोहोत अज़ीम काम को अंजाम दिया हो या जो कोई बोहोत ही बा इज़्ज़त मोज़्ज़िज़ इंसान हो उसका किया जाता है. फिर जिन्होंने क़तल को अंजाम दिया और उनकी गुलपोशी की गई तो वो दहशतगर्द समझ गए की हमारे काम को सराहा गया है और अगला निशाना हमको फिर से एक मुस्लिम को ही बनाना है.
उस हिसाब से जब हूजूमी तशद्दुत पे कोई क़ानून नहीं बना और इन लोगों पे किसी किस्म की बंदिश नहीं आईद की गई और मज़ीद इनके दिलों दिमाग में ज़हर भरा जाता रहा की एक ख़ास तपका तुम्हारा दुश्मन है या इन लोगों को अपने तरबियती इदारों और केम्पों में ये ही तालीम दी जाती रही के जो कोई भी तुमको ख़ौफ़ज़दा करे उसको हलाक़ कर दो. ऐसी सूरत में उसके असरात अवाम पे इतने नुमाया हो गए की अब इनको जो कोई भी दिख रहा है जिससे ये लोग ख़ाइफ़ हो रहे हैं वो उसको हलाक़ कर रहे हैं.
कुछ तालीमी आफ़ता दानिशमंदों ने वज़ीरे अज़ाम को खत लिखा और उसमे बढ़ते हुए आलूद की अक्सरियत की वजह से हूजूमी तशद्दुत से हलाक़त के इज़ाफ़े में सख्त तशवीश ज़ाहिर की थी और इन हलाक़तों पे वज़ीरे आज़म से अमल करने की गुज़ारिश की थी. जिसका जवाब कुछ ग़ैर ज़रूरी अनासिरों मुजरिमाना सोच, दहशतगर्दाना ज़ेहनियत और तशद्दुत पसंदों ने तनक़ीदी अंदाज़ में दिया. बॉलीवुड की बरहना और ना ज़ेबा अदाकारा तवायफ फितरत और उसके हमसाये पंडित जैसे लोगों ने कहा था की भारत को बदनाम किया जा रहा है. कुछ एक दो वाक़ेयात को बढ़ा चढ़ा के पेश करने की कुछ लोगों की आदत हो गई है.
हम तो हर बात पे इज़हारे शुक्र करेंगे जो हमारे साथ हो रहा है अगर उसको सराहोगे तो कल तुम्हारे अपनों के साथ होगा. आज तवायफ और दलाल पंडित लीचिंग पे लिखे दानिशमंदों के खत पे तनक़ीद कर रहे थे क्योंकि लीचिंग सिर्फ मुस्लिम और दलित अवाम की होती है अब तो लंगूर के बाद शेर की लीचिंग हो गई. फिर अगर इसको नहीं रोका गया तो कल हिन्दू पंडितों की लीचिंग होगी. जब नशे के आदि इंसान को नशा नहीं मिलता तो वो सब कुछ करने के तैयार रहता है जिससे उसको नशा मिल सके. और लीचिंग एक नशा है कुछ लोग इसको मज़ाक की हैसियत से ले रहे हैं लेकिन जब इनके अपने उसका शिकार होंगे तब ये लोग गफलत की नींद से जागेंगे और फिर जो आज तनक़ीद कर रहे हैं, ऐसे ही लोग खुद कहेगें की गलत हो रहा है.
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The Venom of Mob
Lynching at last reached to the Animals.
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