Saturday, 20 July 2019

झूट बोले कव्वा काटे, सच्ची बोले खाकी काटे.

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज की बेहेस दो बड़ी ही अज़ीम हस्तियों की गुफ्तुगू पे मुश्तमिल है.  एक मुस्लिम कानून साज़, मुसलमानों मज़लूमों, बेआवाज़ों की आवाज़ और दूसरा ज़ाफ़रानी ज़हर, ज़ाफ़रानी वायरस और हिन्दू शिद्दतपंसद ज़ेहनियत और हिन्दू दहशतगर्दों की आवाज़.

एक तरफ समाजवादी पार्टी के कानून साज़ आजम खान ने हूजूमी तशद्दुत की सख़्त अलफ़ाज़ में मज़म्मत करते हुए इसे वतन की तक़सीम के वक्त मुसलमानों के पाकिस्तान न जाने से जोड़ा है. आजम खान ने कहा है कि मुसलमान १९४७ के बाद भी सजा काट रहे हैं. अगर मुसलमान पाकिस्तान चले जाते तो उन्हें यह सजा नहीं मिलती. मुसलमान यहां हैं तो सजा भुगतेंगे. उन्होंने कहा कि हमारे आबा ओ अजदाद क्यों नहीं गए पाकिस्तान? उन्होंने इसे अपना वतन माना. अब उन्हें इसकी सजा तो मिलेगी और वो सहेंगे.

वहीँ दूसरी जानिब हिन्दू ज़ाफ़रानी पार्टी (बीजेपी) के क़ानून साज़ और दहशत गर्दों का मुहाफ़िज़, ज़ाफ़रानी ज़हर, शिद्दत पसंद क़ानून साज़ सत्यपाल सिंह ने बरोज़ जुमे को इंसानी हुक़ूक़ के तहाफ्फुज़ (तरमीम) बिल २०१९ की खिलाफत करने को लेकर मुख़ालेफ़ीन की मज़म्मत की। उन्होंने लोकसभा में बिल पर बहस में हिस्सा लेते हुए एकबार फिर चार्ल्स डार्विन के उसूलों को कठघरे में खड़ा कर दिया।  उन्होंने एक बार फिर दोहराया की हम लंगूरों की ओलाद नहीं हैं बल्कि हम संतों की औलादें हैं.   

सहाफी जुबेर का दोनों ही बुलंद किरदार बा विक़ार मोहज़्ज़िब हस्तिओं को जवाब. 

अज़ाम साहब कब तक ४७ के लिए छाती पीटते रहोगे, भूल जाओ ४७ को और जो गलती ४७ में हुई थी पकिस्तान नहीं जाने की उसका कफ़्फ़ारा अभी भी अदा कर सकते हो, बना दो एक और पाकिस्तान तोड़ दो भारत को. नए भारत में जब सभी चीज़े नई हो रही हैं तो क्यों ना नई तक़सीम  भी हो जाए. अगर नहीं कर सकते तो चुप रहना सीखो क्योंकि तुमको ज़ाफ़रानी एवान से ज़ाफ़रानी अदलिया से ज़ाफ़रानी पुलिस से और मोदी फ़ौजिओं से ज़र्रा बराबर कुछ नहीं मिलेगा हाँ अगर कुछ मुस्लिम अवाम के लिए करना चाहते हो तो संजीदगी से तक़सीम की जानिब सोचो. नहीं तो ये चीज़े ऐसे नहीं रूकने वाली बल्कि बढ़ती जायेगी. ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों को लग रहा होगा की ये लोग डर के पाकिस्तान चले जायेंगें लेकिन जो आग ये लोग लगा रहे हैं उसमे इनके अपने ही जलेंगे.

आज़म साहब आप जैसे सियासतदां है जो मुस्लिम अवाम से झूटी मोहब्बत दिखाते हैं और उनके मसाइल हल करने से क़ासिर रहतें हैं. अगर हुकूमत आपकी बात संसद में नहीं सून रही है तो उसको आलमी संसद में ले कर जाओ.  आलमी चबूतरे पे अपने तमाम मसाइल बांटों और उनको वही से हल करने का जज़्बा रखो. लाशों पे कब तक सियासत करते रहोगे, भूल जाओ ४७ को नए भारत में नाई तारीख़ लिखो तोड़ दो भारत को कर दो इसके टुकड़े. बना दो एक और पाकिस्तान 'नखलिस्तान' के रूप में.  आज तुम लोग १८% के क़रीब हो और सिर्फ ज़ुबानी जमा खर्च करते रहते हो और सिख समाज महज़ ५% है और २०२० में खालिस्तान के रेफरेंडम के लिए जा रहा है.

सत्यपाल जी आप जैसे लोग और आपकी जैसी सोच रखने वाले लोग ना तो संतों के वारिस हो और ना ही लंगूरों के बल्कि आप जैसे दहशतगर्द ज़ेहनियत, शिद्दत पसंद लोग तो शैतान रावण के वारिस हो.  आप तो बम्बई जैसे बड़े और अज़ीम शहर के पुलिस कमिश्नर रहे हो, मतलब पुलिस के सबसे आला दर्जे के ओहदे आदिल अफसर फिर भी आपकी ज़ुबान, सोच और रव्वैया एक मुजरिमान थी और है.  आप जब बम्बई के पुलिस कमिश्नर थे तो एक ख़ास मज़ाहिब के बेगुनाह अवाम का भी एनकाउंटर जाइज़ ठहराते थे. और वर्दी में एक मीडिया इजलास में सहाफिओं के रू बा रू मस्तुरातों को खिताब कर बोला था की अपने पास चाकू रखो और जो भी तुमको छेड़े उसके पेट में घोप दो हलाक होने पे भी पुलिस तुम्हारे ऊपर कोई कारवाही नहीं करेगी.   अब एक न्यायिक अधिकारी पुलिस की सबसे आला और ऊंची पोस्ट वाला बंदा जुर्म करने की तालीम दे रहा है जुर्म को फ़रोग़ दे रहा है तो जुर्म कैसे ख़त्म होगा.  फिर अगर सभी ऐसे ही चाकू छूरी, तलवार अपनी हिफाज़त के लिए रखने लगेंगे तो पुलिस की क्या ज़रुरत है आप जैसे अदलिया के ओहदे पे फ़ाइज़ ऑफिसर्स की क्या ज़रुरत है उनको तो अपने घरों में क़ैद हो जाना चाहिए.  आपकी बातों से साबित होता है ना सिर्फ आप बल्कि आपकी जैसी सोच वाले सभी लोग शैतान की औलादों में से हैं.

आज के हालाते हज़रा में हिंदुस्तान में अगर मुसलमानों को ज़िंदा रहना है तो अपने हर हक़ के लिए जंग करना होगी, जंग ज़ाफ़रानी हुकुमरानों की दहशत से, ज़ाफ़रानी अदलिया की दहशत से, खाकी दहशत से चाहे वो जंग क़लम की हो, कानूनी दायरे में हो, ज़ुबानी हो,  हो या बिल आखिर ज़ाफ़रानी हिन्दू दहशतगर्दों के साथ जंग अस्लेह से हो.  मुस्लिम अवाम के हर उस इंसान की आवाज़ को आज फ़ासी लगा दी जाती है जो हक़ और इन्साफ करने की बात करता है और हिन्दू दहशतगर्दों को खुली छूट है चाहे वो किसी भी बे गुनाह मुस्लिम को हुजूमी तशद्दुत के साथ क़त्ल करें, एक अकेले निहत्ते को १०-१२ डंडों, लातो, घूसों से मारे पीटें.

हालिया दिन में एजाज़ खान को बम्बई पुलिस ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है.  ये मुद्दा अब आलमी मुद्दा बनाना चाहिए की किस तरह खाकी की दहशत दिखा के उन मुस्लिम आवाज़ों को पस्त और कमज़ोर किया जा रहा है जो मुसलमानों को हक़ और इन्साफ दिलाने की बात करतें हैं.  एजाज़ खान ने क्या गलतबयानी की थी, जो उनके साथ ऐसा सलूक किया जा रहा है.  क्या वो दहशतगर्द हैं, डाकू हैं, आसाराम, रामपाल, और राम की तरह ज़ानी हैं जो उनको क़ैद कर रखा है.  उन्होंने वही कहा जो सही है और हक़ है.  साथ में उन्होंने तो भारत की आन बान शान बने रहने के लिए मोदी इंतेज़ामिया से गुज़ारिश भी की थी के जल्द अज़ जल्द तबरेज़ के क़ातिलों को गिरफ्तार कर के उनके अंजाम तक पहुंचाया जाए.   

एजाज़ खान ने कुछ भी ग़लतफेहमी या दो मज़हबों के बीच खलीज को नहीं बढ़ाया और ना ही आलूद की अक्सरियत बढ़ाई है.  उन्होंने तो सिर्फ उन ५ नौजवान की हिमायत की है और मोदी इंतेज़ामिया से क़ातिलों को सजा देने की गुज़ारिश, जो बिलकुल सही और दुरुस्त है. इस सहाफी का भी ये ही मानना है जो तमाम दानिशमंदों, होशमन्दों और ज़िंदा अवाम का होना चाहिए.  इस सहाफी ने ९ जुलाई को इस मुद्दे पे एक ट्वीट किया है.


क्या गलत कहा बिलकुल सही कहा काफिर सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में बदले की बात सोच के सिहर उठते हैं उनको इस बात का ख्याल होना चाहिए जिस तरह से एक काफिर हिन्दू कैबिनेट आतंकी ने भगवा आतंकिओं की गुल पोशी की थी मिठायाँ तक़सीम की थी उससे उस मृतक अलीमुद्दीन के परिवार वालों की और उस समाज के लोगों की कितनी दिल आज़ारी हुई होगी. बिलकुल सही है अगर मुस्लिम समाज ने बदला लेने की ठान ली तो लौटा ले कर हरिद्वार जाना पड़ेगा. और हाँ कोई भक्त मोदी का हव्वा मत दिखाना, अगर कोई सर फिरा सर पे क़फ़न बाँधने वाला मिल गया तो ना आव देखेगा और ना ताव. मोदी के होते हुए अक्षरधाम को फोड़ डाला था उसके बाद गुजरात में ५ जगह खुद मोदी के चुनावी छेत्र मणि नगर को फोड़ डाला था. जिन लोगों ने इन मासूमों के खिलाफ शिकायत की है और कानूनी सजा चाहते हैं तो पहले वो अपने आक़ा जिसने गोल पोशी की उसके खिलाफ कानूनी सजा की बात करें. क्योंकि ना वो गुलपोशी करता ना मिठाई तक़सीम करता और ना ही आतंकवादिओं का हौसला बुलंद होता और महज़ १ साल के अंदर दूसरा क़त्ल झारखंड में होता. बिलकुल सही बात है ये आग जो लगाईं है भगवा आतंकिओं ने उसमे प्रशासन और हुकूमत फील वक़्त अपनी जीत देख रहा है लेकिन उसके दूरगामी परिणाम भयावह होंगे. जिन लोगों को शहीद किया और उनके परिवार को इन्साफ ना मिला उनके बच्चे बदले की आग में जलते रहेंगे. ये तो मनोविज्ञान है उसमे इतना बावेला मचाने की कोई ज़रुरत ही नहीं है. इन अनपढ़ भक्तो को अपने प्रशिक्षण केंद्रों में मनोविज्ञान का ज्ञान लेना चाहिए और पुलिस भी एक्शन ले रही है उसको तो इंसान की मानसिक परिस्तिथि का अच्छे से ज्ञान होना चाहिए.

ये तो इंसानी फितरत है जब उसके साथ ना इंसाफ़ी होती है और अदलिया से हुकूमत से इंतेज़ामिया से उसको इन्साफ नहीं मिलता तो आलूद उसके जिस्म में जमा होता रहता है या तो वो उस चीज़ को ही ख़त्म कर देता है जिससे उसको तकलीफ हुई है या फिर वो पागल हो जाता है.  ये तो साइकोलोजी की फिलॉसफी है.  फिर सत्यपाल जी जैसा की मस्तूरातों अपनी हिफाज़त के लिए चाकू रखने की बात बोलतें है तो क्या वो मुस्लिम अवाम को भी चाकू तलवार, बंदूक रखने की हिमायत करेंगे.  फिर अगर ऐसे ही सब अपनी अपनी हिफाज़त के लिए कुछ ना कुछ असलाह साथ ले कर चलना शुरू कर देंगे तो मुल्क में सख़्त तरीन इन्तेशार पैदा होगा.  हुकूमते हिन्द से गुज़ारिश है इन फ़िरक़ापरस्त ताक़तों को इख़्तियार कीजिये.

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