Sunday, 21 July 2019

सादगी फ़क़ीरों वाली किरदार बादशाहों का.


पाकिस्तान के वज़ीरे अज़ाम इमरान के अमेरिका दौरे पे काफिर और लंगूर मज़ाक बना रहे हैं, और ट्वीटर पे काफिर, तशद्दुतपसंद, संघी दहशतगर्द मज़ाक बना रहे हैं, अमेरिका में इमरान को ज़लालत झेलनी पड़ी कोई ताम झाम नहीं कोई लाव लश्कर नहीं वगैरा वग़ैरा.   अब इस सहाफी को इमरान से ज़्यादा इन काफिरों और संघियों पे हसी आ रही है, क्योंकि अगर इमरान की नियत इस्लाम की रूह को देखते हुए सादगी इख्तियार करने की है तो वो ग़ालिब होंगे, कामयाब हैं और हर हाल में इज़्ज़त पाएंगे.   सच्चे फ़क़ीरों की ये ही केफ़ियत सादगी में ही उनकी रूहानी पोशीदा होती है.  ये सिर्फ हिंदुस्तान की तारीख़ नहीं है बल्कि इस्लामिक तारिख है.  जितने भी खलीफा, बादशाह हुए वो रातों को पोशीदा इबादत में मशगूल रहते थे और दिन में हुकूमत के फ़राइज़ इंजाम देते थे.  वैसे भी इस्लाम में फ़िज़ूल खर्ची के ऊपर लानत भेजी गई है, बोहोत ज़्यादा किसी भी चीज़ का दिखावा करना अपने ओहदे, अपने मर्तबे से किसी को मुत्तासिर करना इस्लाम की निस्बत से गलत है.  अगर वो दर्जा आपके पास है और आपने दिखावा किया तो गलत है और अगर नहीं है और आपने फरेबी, झूटी बातों पे सिर्फ दिखावा किया अपने आपको क़वी, और ताक़तवर दिखाने की कोशिश की तो वो गुनाह है. 

अब लगता है पाकिस्तान की तक़दीर बदलेगी.  जो संघी और लंगूर मज़ाक़ बना रहे हैं वो इस्लामिक तारीख़ पढ के देखें.  ख़लीफा उमर का सिर्फ किरदार ओर सादगी कपड़ों पे पेवंद लगे ग़ुलाम घोड़े पे बैठा है ओर हाकिम ग़ुलाम के जेसे घोड़े की नकेल पकड़ के चल रहा है. ये माजरा देख कर जेरूसलम फतह हूआ था. ना कोई जंग हूई ओर ना ही खून बहा. क्योंकि यहूदियों की कीताबों मे पेशनगोई थी, अगर ऐसा हाकिम आये जिसके कपड़ों मे पेवंद लगे हों ओर ग़ुलाम सवारी करता हो ओर हाकिम नकेल पकड़ के चले तो उससे जंग हर्गिज़ मत करना तुम नही जीत पाओगे. वर्ना कुछ मुल्क़ के हिटलरों को तो इतना ग़ुरूर और घमंड है की १० करोड़ का सूट सिर्फ अमेरिका को लूभाने के लिये पेहनते हैं. ओर 1 रुपये मुल्क़ के नाम पे वकील को देते हैं. अपने लिये १० करोड़ ओर मुल्क़ के लिये 1 रुपये. सादगी मे ही मुसलमान की जीत है ओर इस्लाम का पैगाम.  जो लोग आज इमरान का मज़ाक बना रहे हैं ऐसी ही कैफियत ख़लीफा ओमर और उनके गुलाम की थी.  जब जेरुशलम नज़दीक आया तो गुलाम ने कहा हज़रत आप सवारी पे बैठ जाएँ, अब मंज़िल नज़दीक आ गई है यहूदी देखेंगे तो मज़ाक बनायेगे की ऐसा बादशाह आया जो गुलामों की खिदमत में लगा है.  लेकिन जो जानकार थे उन्होंने अपनी चर्च से दूरबीन से देखा और जेरुशलम की चाबी दे दी और कहा हम आपसे जंग नहीं लड़ सकते हमको हमारी किताबों में ये ही कहा गया है.    

आज अपने आपको दुनिया का सबसे ताक़तवर मुल्क़ कहने वाले लोग जो इमरान का मज़ाक बना रहे है अपने आपको सबसे ज़्यादा पैसे वाला और माशी हालात में पाकिस्तान से ज़्यादा कूव्वत और उसत रखने वाला तस्सव्वुर करतें हैं, लेकिन मुल्क़ की खिदमात को अंजाम देने के लिए अपने वकील की फीस देने को पैसा नही था तो 1 रूपये मे काम करवा लिया.  अब जिसके पास पैसा ही नही होगा तो फीस कहाँ से देगा. वहीँ दूसरी तरफ गरीब तस्सव्वुर किये जाने वाले मुल्क में इतनी अमीरी है की उसने अपने सिर्फ काउन्सिल की फीस २० करोड़ दी, भले ही तुम अपने आपको अमीर तस्सव्वुर करते रहो और पड़े लिखे जाहिलों की तरह पाकिस्तान को गरीब   लेकिन तुम्हारे बर्ताव से तुम लोग  गरीब और ज़ेहनियत से दिमागी मरीज़ लगते हो.

सादगी का हर वक़्त इस्लाम का पैगाम रहा है वक़्त के हाकिम को भी अपने ओहदे और उसत का ग़ैर ज़रूरी मुज़ाहेरा नहीं करने का हुकुम है.  उस दौर के इस्लामिक हुकूमत के खलीफ़ा उमर ओर कोई छोटी मौटी रियासत नही २५०० करोड़ किलोमीटर की इस्लामिक रियासत के बादशाह ओर उसके खलीफ़ा और सादगी का वो आलम एक आम शहरी उनको नही पेहचान पाता. जब उससे पूछा जाता की क्या हाजात है क्या काम है ओर उसको पता पड़ता के वो खुद खलीफ़ा के सामने खड़ा है तब उसकी सारी हेकड़ी निकल जाती थी.  इस्लामिक नियम तो वही हैं आज भी, वो नियम तो नही बदले अलबत्ता मुस्लिम बदल गये तभी रूसवा हो रहे हैं.  लेकिन इमरान की सादगी देख कर अब लगता है फिर से मुसलमान ग़ालिब होंगे.  क्यों के उपर वाले के नियम नही बदले वो आज भी १००० करोड़ किलोमीटर की मुस्लिम रियासत के हाकिम के लिए भी वही हैं जो २५०० करोड़ किलोमीटर इस्लामिक रियासत के हाकिम के लिए थे.  लेकिन अगर बदल गई है तो आज के मुसलमान की पोशीदा इबादत और अपने रब के सामने सरेंडर होने की अदा.   दूसरी बात इंसान की पेहचान उसके कपडो से नही अपने आला किरदार ओर बादशाही इंदाज़ से होती है.  एक गधे जाहिल मजमूई क़ातिल का १० करोड़ का सूट उसकी दहशतगर्द ज़ेहेनियत नही बदल सकता.  अगर इंसान का लिबास ही उसकी पेहचान है तो जाहिल, बेवकूफ भारतीयों मे तो एक से एक अच्छे कपड़े पेहनने वाले पड़े है फिर भी उन मे ग़ुलामी वाले अंदाज़ क्यो नुमाया हैं और  ज़ेहनियत दहशतगर्दों, आदमखोरों वाली काहे को नहीं बदल रही है.

बादशाह औरंगज़ेब जिनका नाम आते ही काफिरों के दिलो पे सांप लौटने लगते हैं, और झूटी सच्ची मन घडन्त बातें बनाने लगते हैं जिसका ज़िक्र अंग्रेज़ों की लिखी हुई तवारीख़ में कही नहीं मिलता हाँ संघी तवारीख़ और ज़हरीले प्रोफेसर्स की लिखी हुई किताबों में मिल सकता है.  लेकिन औरंगज़ेब एक वाहिद ऐसे बादशाह थे जिन्होंने ईरान बॉर्डर से ले कर बर्मा बॉर्डर तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत पर हुकूमत की थी.  ये बात तो संघी भी मानते हैं.  लेकिन उनकी भी एक आदत थी हुकूमत के माल से कुछ भी उज्र नहीं लेते थे और क़ुरान लिख कर टोपी बून कर अपने ज़ाती इख़राजात पूरे करते थे. 

दूसरी तरफ नए भारत में नए फ़क़ीर जो करोड़ों का सूट पेहेनते हैं, उनके सूट का कपडा फ्रांस और इंग्लैंड के यार्न से बनता है और सिलाई पैरिस के आला दर्ज़ी से होती है.  लाखों रूपये की चाय झूले पे बैठ के पीते हैं.  उनका खाना वतन के किसानों की पैदा कर्दा मशरूम नहीं बल्कि करोड़ों रूपये में जापान और दीगर बेरून मुल्क से मगाया गया मशरूम है.  गरीब किसान का पैदाकर्दा मशरूम खाने से इस फ़क़ीर को जुलाब हो जातें हैं.  इतना अमीर और पैसे वाला मुल्क़ जिसके फ़क़ीर का ये आलम है की एक दिन का खर्चा करोड़ों और अरबों में है उस मुल्क़ के पास अपने वकील की फीस देने के लिए पैसे नहीं है. १ रुपए फीस फिक्स होती है.   

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