Thursday, 18 July 2019

मातम पे इज़हारे ख़ुशी

भारतीय अवाम, मोदी और संघी दहशतगर्द, बीजेपी वाले भारतीय दहशतगर्द कुलभूषण जादव के मताम और हालिया आलमी अदलिया के फैसले के ऊपर भी खुशियां मना रहे हैं.  जबकि तमाम फैसले का कोई भी तलिफ़ी हिस्सा हिन्दू दहशतगर्द के भारतीय अहम इल्तेजा को ख़ारिज करता है. 

मुझे लगता है फैसला इंग्लिश में बयान किया गया था, तो ये मोदी इंतेज़ामियाँ और उसके जाहिल, बेवकूफ और गवार अकीदतमंदों के लिए उसको समझना और जानना दुशवार कुन साबित हुआ होगा.   इन लोगों ने इतनी उछल कूद करने के बाद भी क्या पाया, फिर फैसले पे किस बात की ये लोग खुशी बना रहे हैं.

भारत की ख़ास और अहम इल्तजाओं को आलमी अदलिया ने खारिज कर दिया और कुछ ग़ैर ज़रूरी और मामूली इल्तजाओं को मंज़ूर कर लिया.  जबकि भारत की दलील और इल्तेजा थी की वो एक ताजिर है और ईरान में फारस की खाड़ी से ले कर बलूचिस्तान तक उसकी तिजारत फैली हुई है.

१.     अदलिया ने माना की जादव एक जासूस है और वो दहशतगर्दी में मुलव्विस है,  और वो एक खुदमुख्तार मुल्क की सालमियत को तबाह करने के अपने मिशन पे था.
२.     भारत उसकी वतन वापसी चाहता था लेकिन आलमी अदालत ने उसको खारिज कर के कहा वो पाकिस्तान की जेल में ही रहेगा.
३.     भारत ने पाकिस्तानी इस्लामिक जमुहरियत के फौजी निज़ाम के अदलिया के दायरे को चैलेंज किया था और दलील दी थी की ये केस फौजी अदालत के दायरे में नहीं आता है, उस अदालत के पास उतनी उसत, कूव्वत और ताक़त नहीं है की ऐसे केस की समात कर सके, ट्रायल कर सके और फैसला सूना सकें.   भारत चाहता था की ये केस फौजी अदालत के बजाये अवामी अदालत में जाना चाहिए.  जबकि अलामी अदालत ने भारत की दलील और इल्तेजा को ख़ारिज कर दिया और कहा फौजी अदालत को पूरा इख्तियार, उसत और कुव्वत है की वो एक जासूस, दहशतगर्द जो की मुल्क की सालमियत को इज़ा पहुंचाने आया है उसके केस को सुने, चलाये और उसपे फैसला दें.
४.     फ़ासी की सजा पे भी पाकिस्तानी इस्लामिक जमुहरियत को गुज़ारिश की गई है की वो फिर से सोचें. 
५.     अदालत ने दहशतगर्द जादव को कौंसलर अस्सेस फ़राहम किया है.

आज संघियों, मोदी जाहिल भक्तों और बीजेपी वालों की हालत वैसी है जैसी की ३ साल पहले भारतीय सुप्रीम कोर्ट का ट्रिपल तलाक़ पे फैसला आया था.  संघी अपनी खुशी को पूरी तरह से ज़ाहिर भी नहीं कर पा रहे थे. क्योंकि उनको मालूम हो गया था की वो हार चुके हैं और उनका ज़ाफ़रानी मक़सद को मुस्सल्लद करने का हरबा कामयाब नहीं हो पाया.  तो फिर वो मीडिया के सामने ग़ैर ज़रूरी हसी और खुशी का इज़हार कर के सबको दिखाना चाहते थे की हम जीतें हैं.  लेकिन चेहरा पढ़ने वाला तो उनकी हसी के पीछे छुपे हुए दर्द, और तकलीफ को साफ़ पढ़ सकता था.  ट्रिपल तलाक़ पे भी काफिरों का मक़सद हल ना हो सका, काफिर इस्लाम के तलाक़ के फलसफे को ही ख़त्म कर देना चाहते थे. और मुसलमानों पे हिन्दू अवाम का जन्म जन्मांतर का कानून नाफ़िज़ करना चाहते थे, जिसको अदालत ने खारिज कर दिया.  ट्रिपल तलाक़ पे शादी ख़त्म करने के ऊपर कला कोट वाला ज़ाफ़रानी ज़हर सज़ा की हिमायत कर रहा था. उसको भी अदलिया ने ख़ारिज कर दिया और कहा ट्रिपल तलाक़ से शादी ख़त्म ही नहीं होती और जब शादी खत्म ही नहीं होती तो सज़ा किस बात की.  उसके ऊपर भी ज़ाफ़रानी ज़हर, ज़ाफ़रानी वायरस, ज़ाफ़रानी दहशतगर्द संबित पात्रा जैसे लोग फैसले पे इज़हारे शुक्र ज़ाहिर कर रहे थे और हस्ता हुआ चेहरा दिखा रहे थे.

आलमी अदलिया के फैसले के बाद भी भारत की कुछ ऐसी ही हालत है.  फैसले के किस हिस्से पे ये ज़ाफ़रानी ज़हर ख़ुशी मना रहे हैं.  जैसा की भारतीय कह रहे है ये बड़ी जीत है, जी हाँ ये बड़ी जीत है लेकिन भारत के लिए नहीं बल्कि पाकिस्तान के लिए.   में भारतीयों से इतना ही कहना चाहूंगा की अपने आपको हसी मज़ाक और जोक्स का एक हिस्सा मत बनाइये.  आपकी तमाम एहम और ख़ास इल्तजाओं को ख़ारिज कर दिया गया फिर भी आप खुशी मना रहे हो. 

अदलिया के बाद अब बारी थी भारतीय मीडिया के लंगूर और लँगूरनियों की जिनको ज़बरदस्त झटके दिए गए और उन झटकों से लँगूरनिओं को काफी इज़ा पहुंची और दर्द हुआ साथ साथ उनको और लंगूरों को नदामत, ज़लालत का सामना करना पढ़ा.   भारतीय मीडिया ने अपने खुद के कौंसिल की बेइज़्ज़ती कर डाली जब उसकी ओकात महज़ एक रूपये की कर उसको नाम दिया एक रूपये वाला वकील.   है है है.  लंगूरों को भी शाकिस्त होना लाज़मी थी, जो जोश में हैडिंग दे रहे हैं १ रूपये वाला वकील जीता. अब इस हैडिंग से चंद बातें साबित होती हैं.

१.     या तो उस वकील के पास केसेस ही नहीं होंगे तभी उसने महज़ १ रूपये में आलमी अदालत जैसे इदारे का केस करना मंज़ूर किया.

२.     या तो वो कोई बोहोत नामी गिरामी कौंसिल नहीं होगा, छोटा मोटा वकील होगा. या फिर उसमें पेशवराना ज़िम्मेदारी की सलाहियत नहीं होगी और उसकी कमी होगी.  नामचीन कौंसिल अपनी मीटिंग तक की फीस चार्ज करते हैं.  वो लोग एक पेशेवरों की हैसियत से काम करतें हैं. अगर भारत के वकील ने महज़ १ रूपये में काम किया है तो उसने अपने साथिओं और बड़े कौंसिल्स के पेशे के साथ गलती की है.

३.     वो एक सड़कछाप वकील हो सकता है, अमूमन जैसे की मजिस्ट्रेट कोर्ट के बहार सडकों पे खड़े रहते हैं,  और अपने मुवक्किलों  को एक बाज़ारू औरत के जैसे बुलाते रहते हैं.  ऐ इधर आ, क्या काम है, कुछ एफिडेविट, हाँ साब नोटरी. 

फिर भी अगर भारतीयों को हार का जश्न मनाना है तो मनाये मर्ज़ी है उनकी.  ये लोग तो मय्यतों पे भी जश्न मानते हैं. चाहे वो फ़ौजिओं की हो या इंसानों की.

See in English 

Rejoice on the Weeds.



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