Monday, 15 July 2019

यूं ही नहीं करते हम तुमसे वफ़ा, ओवैसी.

अड्डे के तक़सीमी एक हिस्से लोकसभा में बरोज़ पीर को क़ौमी तहक़ीक़ाति एजेंसी (NIA) को मज़ीद क़ुव्वत फ़राहम करने वाला तरमीम बिल पेश हुआ और इस पर मोबाहेसा हुआ.  बहस के दौरान जब हुकूमत की जानिब से भारतीय जनता पार्टी का कानून साज़ सत्यपाल सिंह बोल रहा था, तभी बवाल हो गया. उसकी तक़रीर के दौरान AIMIM के सरबराह जनाब असदुद्दीन ओवैसी बीच में खड़े हुए और एहतेजाज किया लेकिन इस बीच वज़ीरे दाखला अमित शाह खड़ा हुआ. शाह ओवैसी से बोला कि आपको सुनना ही पड़ेगा.
  
दरअसल, NIA तरमीम बिल पर जब बरोज़ पीर अड्डे के एक हिस्से लोकसभा में बेहेस हुई तो दौराने बेहेस बीजेपी का तशद्दुत पसंद कानून साज़ और बम्बई का साबिक़ खाकी आतंकी ज़ेहनियत कमिश्नर सत्यपाल सिंह आतंकवाद को वो एक ख़ास मज़हब से जोड़ रहा था और उसके लिए उसने सियासी हिकमत को ज़िम्मेद्दार ठहराया उसने आगे कहा आतंकवाद इसलिए फल-फूल रहा है क्योंकि हम उसे सियासी चश्मे से देखते हैं जबकि हमें उससे मिलकर लड़ना चाहिए.

उसने अपनी मुत्तसिब और आलूद भरी तक़रीर में बंबई और हैदराबाद का ज़िक्र किया और कहा इन शहरों ने आतंकवाद को खूब झेला है क्योंकि वहां भी इसे सियासी आईने में देखा गया.  हिन्दू तशद्दुत पसंद बीजेपी का कानून साज़ इस मौके पे फिरकावाराना तशद्दुत इस्तेमाल करना नहीं भूला.  उसने कहा जब पुलिस ने हैदराबाद में कुछ अक़लियति तपके से आने वाले मशकूकों को पकड़ा तो सीधे वज़ीरे आला ने कमिश्नर से कहा कि ऐसा मत कीजिए वरना आपकी मुलाज़मत चली जाएगी.

भगवा ज़हरीले कानून साज़ की गलत बयानी, फरेब और झूट पर हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने सख्त एहतेजाज दर्ज करवाया. अभी ओवैसी ने बोलना शुरू ही किया था कि वज़ीरे दाखला उस दहशतगर्द ज़ेहनियत सत्यपाल के हिमायत में खड़ा हो गया .  उसने कहा कि ओवैसी साहब सुनने की भी ताकत रखिए, आपको सुन्ना ही पड़ेगा.   भगवाधारी दहशतगर्दों का हिमायती वज़ीरे दाखला ओवेसी को डरा धमका के चुप करना चाहता था.  लेकिन वो चुप नहीं हुए और मुतवातिर बोलते रहे, और अपनी बात पूरी कही.

हलाते हाजरा पे सहाफी जुबेर की नुक़्ता ए नज़र.  

आज इन भगवाधारिओं, तशद्दुत ज़ेहनियत, हिन्दू वायरस को तीखा लग रहा है क्योंकि अकेला शेर संसद (अड्डे) में घुस के अपने तल्ख़ लहजे और चुभते हुए सवालों और गोलिओं से दहशतगर्दों को एक एक कर के मौत के घाट उतार रहा है.  सन १९४७ से सिर्फ हम सुनते ही तो आ रहे हैं.  सुनते आ रहें हैं और सहते आ रहे हैं, कभी वतन की वफ़ा के नाम पे, कभी भाई चारे के नाम पे, कभी गंगा जमुनी तहज़ीब के नाम पे, कभी अनेकता में एकता के नाम पे.  और जब तक सुनते थे तो कांग्रेस और छद्दम सेक्युलर पार्टियाँ खूब मौज करते थे और जब कोई बोलने वाला आ गया ज़ुबानी गोलिओं से दिल छलनी करने वाला आ गया दहशतगर्दों को मौत के घाट उतारने वाला आ गया तो तीखा लग रहा है.  ये ही बात अमित तुझ जैसे गुंडे और सत्यपाल जैसे साबिक़ खाकी आतंकी के ऊपर भी लागू होती है.

सुनने की तमाम ज़िम्मेदारी क्या सिर्फ मुसलमान की है कोई भी सड़क चलता मुजरिमाना, मुत्तास्सिब, मवादी, ज़हरीली सोच रखने वाला मुँह से गंदगी निकालेगा तो क्या ये फ़र्ज़ नहीं है मुस्लिम नुमाइंदों का के उसको वही पे ज़ुबानी गोलियों और तीरों से क़त्ल कर दिया जाए या हलाक कर दिया जाए.  क्या  लीच होने के तमाम ज़िम्मेदारी सिर्फ मुसलमान की है.  क्या ज़ुल्म, जब्र और तशद्दुत करते हुए आतंकी और दहशतगर्दों से मुस्लिम नुमाइंदो और दानिशमंदों को सवाल पूछने का हक़ नहीं है या जो दहशतगर्द ज़ेहनियत अड्डे पे आतंकी वारदात और खून रेज़ी करने की मंसूबा बंदी करतें हैं उनको अड्डे पे घुस के हलाक़ करने की ज़िम्मेदारी मुस्लिम नुमाइंदों की नहीं है. 

अगर हुकूमत ने अपना फ़र्ज़ बा खूबी अंजाम दिया होता तो आज सत्यपाल जैसे दहशतगर्दों को ज़ुबानी गोलियों और तीरों से क़त्ल करने की नौबत अड्डे पे नहीं होती बल्कि खुद हुकूमत ही उसको उनके अंजाम तक पंहुचा देती.

जुबेर एहमद खान
सहाफी

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