Monday, 16 October 2017

ख़त्म हो रहा तिलिस्म



मोदी, बेजीपी और आतंकवादीओ को उनका अहंकार ले डूबेगा.  जिस तरह से ये आतंकी अहंकारी भाषा बोलते है और उसके ऊपर अमल भी करते है चाहे वो योगी हो साक्षी हो प्राची हो गिरिराज हो या खूखार आतंकी संघटन बीजेपी का कोई भी थोपा हुआ आतंकवादी हो और ऐसे आतंकिओ पे कोई कारवाही नज़र नहीं आती तो उससे अहंकारिओ की हौसला अफ़ज़ाई होती है.

मोदी सरकार की सबसे बड़ी कमज़ोरी यही है के उसने पत्रकारों को हलके में लिया चाहे वो आज़ाद पत्रकार हो या किसी चैनल से जुड़े हुए. इस पत्रकार ने २०१४ के पहले बोहोत से लेख खूखार आतंकी संघटन बीजेपी और उसकी कार्य शैली के ऊपर लिखे है.  जिसमे उसने शब्दावली इस्तेमाल की "पोलिटिकल पंडित" और उनका विश्लेषण ये कहता है की बीजेपी सत्ता से बोहोत दूर रहेगी.  फिर २०१४ के बाद जब मोदी सरकार भारत की संसद पे प्रजातंत्र की हत्या कर के ई.वि.एम्. में घपले बाज़ी कर के देश की संसद पे काबिज़ हुई उसके बाद मोदी ने वाराणसी सभा में "पोलिटिकल पंडित" इस शब्दावली का मखौल उड़ाया उसका कहना था अब कहा है पत्रकार के पोलिटिकल पंडित और उसका विश्लेषण.  फिर उसने अपनी कार्यशैली से समूची भारत ही नहीं विदेशी पत्रकारों को भी ये बतला दिया के वो एक हिटलर मानसिकता वाला क्रूर व्यक्तित्व का बंदा है जो किसी भी समाज, जनता देश या पत्रकार मण्डली की नहीं सुनता बल्कि वो पत्रकारों, मीडिया हाउस को खरीद के उसके मन की बात जनता तक पहुंचता है और झूट पे आधारित विकास के नारे को बुलंद करता है. लेकिन झूट और जादू कितने दिनों तक कायम रहेगा जब जनता के ऊपर से फरेब का चश्मा उतरेगा तभी तुमको तुम्हारी असली जगह दिखा दी जायगी.


मोदी सरकार ने नये नये नियम बनाना शुरू कर दिए और मोदी सरकार ने पहले वाली सरकार के ऊपर कटाक्ष करते हुए पत्रकारों के लेख को हलके में ले कर काम करना शुरू कर दिया. मोदी सरकार का पक्ष था के हर पत्रकार के लेख के ऊपर कोई प्रतिक्रिया देने के ज़रुरत नहीं या पत्रकारों के लेख के ऊपर काम करने की ज़रुरत नहीं बल्कि हमारी सरकार के हिसाब से पत्रकार काम करेंगे. मोदी सरकार को अहंकार था के उनके पास बहुमत के अकड़े से भी बोहोत ज़्यादा मेजोरिटी है फिर मोदी सरकार ने मिडिया के एक धड़े आजतक, ज़ी न्यूज़, इण्डिया न्यूज़ और उनके कुछ ज़मीर फरोश पत्रकारों को खरीद लिया था. अगर मोदी जी देश में प्रदूषण भी फैलते तो वो पत्रकार मण्डली और मिडिया हाउस कहते फिरते वाह क्या खुसबू है.  
 
में कांग्रेस का स्पोक पर्सन नहीं हूँ और ना ही कांग्रेस का समर्थक हूँ अगर कांग्रेस सरकार में कुछ भी गलती होती थी तो ये पत्रकार उस सरकार को भी हाशिये पे लेता था. लेकिन मनमोहन जी की सरकार की एक बात थी वो प्रजातंत्र और ख़ास कर के प्रेस की आज़ादी पे यकीन रख के काम करती थी और इस पत्रकार के लेख के बाद या तब के प्रधान मंत्री को पत्र लिखने के बाद चीज़े सुचारू हो जाती थी और अगर सही में गलती हुई हे तो उसकी माफ़ी मांग के उसको सुधारने की कोशिश की जाती थी या सुधार लिया जाता था.  लेकिन हिटलर मानसिकता और अहंकारी मोदी जी की सरकार ने तो पत्रकारों के ऊपर ही कटाक्ष करना शुरू कर दिया तो चीज़े सुधारना तो बोहोत दूर की बात हुई.


तो यहाँ से शुरू होती है खूखार आतंकी संघटन और अहंकारी के पतन की दास्तान.  मोदी सरकार को अपना अहंकार और किसी भी पत्रकार को मामूली बन्दर समझ के हलके में लेना समूचे भारत को जलाने के लिए तैयार है. किसी बलवान, ब्राह्मण, पंडित ने भी एक अदना से वानर को हलके में लिया था लेकिन उस वानर ने उछल उछल के उस पंडित के समूचे गड को आग के हवाले कर दिया था. तो अहंकारी को उसका अहंकार ही ले डूबता है.

मालेगाव, भिवंडी, नांदेड़ सभी महानगर पालिकाओं में बीजेपी को मुश्किल से एक या दो सीट मिल पाई है.  फिर छात्र संघ का चुनाव हुआ और जो विद्यापीठ में आतंकी आतंक मचाने ज़्यादा और पढ़ाई करने कम आते थे उनकी ज़बरदस्त हार हुई.  चाहे वो समूची दिल्ली प्रदेश के छात्र संघ का चुनाव हो या फिर अभी अलाहाबाद छात्र संघ के चुनाव, हर फ्रंट पे विद्यार्थीओ के आतंकी संघटन ऐ.बी.वि.पि. को करारी हार का सामना करना पड़ा है. अपनी हार की ज़लालत को छुपाने के लिए और केंद्रीय नेतृत्व पे इसकी कोई तपिश ना आये तो दिल्ली प्रदेश के सभी छात्र संघ में अपनी हार का ठीकरा ऐ.बी.वि.पि. के आतंकिओ ने साम्यवादी विचारधारा के ऊपर थोप दिया.  लेकिन अल्लाहाबाद छात्रसंघ की हार को कैसे स्पष्ट करेंगे क्योकि पिछली बार आतंकी संघटन ऐ.बी.वि.पि. का छात्रसंघ था इस हिसाब से बीजीपी समर्थित छात्रसंघ से वो जगह छीनी गई है.  दूसरी महत्वपूर्ण सीट गुरदासपुर की जहा पिछले १५ सालो से बीजीपी का कब्ज़ा था वो सीट भी उसके हाथ से निकल गई. 

सही देखा जाए तो बीजेपी की गलत नीति और ऊट पटांग निर्णय की वजह से हर जगह उसको हार का मुख देखना पड़ रहा है. उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा कानून व्यवस्था की समस्या है जहा खून, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, डाकाज़नी, मामूली बात है और उस सूबे के मुख्य मंत्री को ज्ञान देने के लिए केरला बुलाया जाता है और ख़ास कर के जो एक आतंकी प्रवर्ति रखता हो और उसके ऊपर तजिराते हिन्द की अपराधी धाराओं में मामले दर्ज हो तो ऐसा आतंकवादी प्रवर्ति वाला इंसान अगर ज्ञान देगा तो क्या उस ज्ञान का असर चुनाव में बीजेपी के पक्ष में दिखेगा या विपक्ष में और वही हो रहा है. मोदी जी ने इस पत्रकार के विश्लेषण का मखौल उड़ाया था वही कांग्रेस के प्रत्याशिओं ने गंभीरता से लिया और नतीजा हाज़िर है
 
दूसरी बात देश की कम से कम ७०% जनता को हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई इस भावना से कुछ लेना देना नहीं है उनको तो ये देखना है के उनकी गाडी में १००० रूपये का पेट्रोल कितने दिन चलता है और गृहणियों के ये देखना रहता है के उनका घर का बजट कही गड़बड़ तो नहीं हो रहा है. मोदी सरकार के ऊट पटांग निर्णयों की वजह से देश की जनता पे न वाजिब बोझ पड़ा है. फिर अगर बीजेपी का एक जनता का प्रतिनिधि आतंकवादीओ की ज़ुबान बोलता है तो उसका असर आने वाले चुनाव में देखने को तो मिलेगा. अगर आप अपनी सरकार की उपलब्धि सिर्फ खून खारबे से ही आंकना चाहते है के कश्मीर में हमारी सरकार बनने के बाद इतने आतंकिओ को मौत के घाट उतार दिया हमने पाक के उतने हज़ार सेनिको को मौत के घाट उतार दिया हमने भारत में इतने गौ तस्करो और गौ मॉस खाने वालो को मौत के घाट उतार दिया तो ये उपलब्धि सिर्फ उसी जनता को खुशी देगी जो खून खराबा अपना धर्म समझते है और उसको धर्म युद्ध का नाम दे कर कहते है के हिन्दू खतरे में है अगर लव जिहाद बंद नहीं किया तो हिन्दू भारत में अल्पसंख्यक हो जाएगा.  अरे जब मुग़ल शासक थे तब हिन्दू अल्पसंख्यक नहीं हुआ तो अब क्या होगा. और अगर विधि का विधान ही यही है तो उसको तुम हरगिज़ टाल नहीं सकते. जब प्राकर्तिक आपदा होती है तब भी तो एक नपुंसक की तरह हर आपदा का दर्द सहना पड़ता है. अगर ऐसा होता तो उत्तराखंड की आपदा टाल देते जहा १ लाख से ऊपर हिन्दू मारे गए फिर किल्लारी की आपदा टाल देते, फिर गुजरात २६ जनवरी का भूकंप टाल देते, इन दोनों हादसों में कम से कम १ लाख लोगो के मारे गए. फिर उड़ीसा, तमिलनाडु में सूनामी टाल देते. तो अगर ऊपर वाले ने लिख दिया है की भारत में हिन्दू अल्पसंख्यक हो जाएगा तो उसको तुम कैसे टाल सकते हो. और अगर नहीं लिखा गया है तो उस बात की फ़िक्र क्यों करते हो जो होने ही नहीं वाली है.



देश की अधिकांश जनता को शांति चाहिए रोज़गार चाहिए न की अशांति. चाहे बॉर्डर पे फौजी मरे या दुश्मन आपके आने के बाद फैली तो अशांति ही है.  कश्मीर में आम नागरिक मरे या आतंकवादी आपके आने के बाद फैली तो अशांति ही है. नार्थ ईस्ट में सरकार के खिलाफ बागी सुर पनपे या फेवर में फैली तो अशांति ही है.  देश की जनता को इस बात से कुछ सरोकार नहीं है के ताज महल गद्दारी का प्रतीक है या वफादारी का उसको तो इस बात से सरोकार है के ताज एक भारत की धरोहर है और विश्वप्रसिद्ध इमारत और भारत की सभी इमारतों का ७०% विदेशी मुद्रा और सबसे ज़्यादा देशी मुद्रा अर्जित करने वाली ईमारत है. जिसको विश्व का मॉर्डन अजूबो में सातवा स्थान हासिल है. अब जिसको ये गद्दारी का प्रतीक लगता है तो उन लोगो से ही निवेदन है के उस इमारत को तोड़ डाले और ख़त्म कर दे गद्दारी का प्रतीक और जो बात उनको हमेशा इस बात का एहसास दिलाती है के उनके पूर्वज मुस्लिम राजाओ के गुलाम थे तो तोड़ दे इस गुलामी की ज़ंजीर को किस ने रोका है हम सब मिलके इस काम में उनकी मदद करेंगे. अच्छा होगा इससे इनकी गुलामो वाली सोच तो टूट जायेगी लेकिन ये अपनी ही विषप्रसिद्ध धरोहर को भी तोड़ देगी और उससे टूटेगा भारत का ७०% विदेशी मुद्रा का भण्डार.  तो ठीक है आप राष्ट्रवादी है अपने ही देश की विदेशी मुद्रा के ऊपर तीर चलाइये.  फिर ताज महल ही क्यों भारत की समूची नुक्लियर मिसाइल भी नष्ट कर देना चाइये क्योकि वो भी एक गद्दार ने ईजाद की थी. फिर रफ़ी साहब के नग्मों को भी नष्ट कर देना चाइये क्योकि वो भी तो गद्दार समाज से ही आते है. और रेहमान के नग्मे भी बेन कर देना चाहिए और उनका ऑस्कर भी विश्व को लोटा देना चाहिए. फिर हॉकी का वर्ल्ड कप भी भारत को नहीं रखना चाहिए क्यकि वो भी एक गद्दार शकील एहमद की क़यादत में भारत जीता था. सही देखा जाए तो अभी तक इन आतंकवादीओ ने भारत को आगे ले जाने का एक भी काम नहीं किया इतिहास गवाह है जो भी भारत को उरूज दिलाने के काम किये वो अभी तक सिर्फ और सिर्फ मुसलमानो ने ही किये है. भारत की सबसे ज़्यादा विदेशी मुद्रा कमाने वाली फिल्म दंगल आमिर की देन है और भारत के फिल्म इतिहास में सबसे ज़्यादा राजस्व अर्जित करने वाली पहली फिल्म बनी.  मदर इंडिया भारत की उस ज़माने की सबसे ज़्यादा राजस्व कमा कर देने वाली फिल्म है और आज़ाद भारत की पहली फिल्म जो ऑस्कर के लिए नॉमिनेट हुई और सिर्फ एक वोट से हार गई उसके डायरेक्टर और हीरोइन भी तो एक गद्दार ही थे. 
 

फिर अज़ीम प्रेमजी जो भारत के पांचवे सबसे अमीर इंसान है उनको अपना समूचा बिज़नेस पैकअप कर देना चाहिए और उन तमाम स्टाफ को निकाल देना चाहिए जो उनकी कम्पनीज में मुलाज़िम है और उनको अपना बिज़नेस पाक, बंगलदेश या फिर किसी और मुस्लिम देशो में स्थापित करना चाहिए क्योकि वो भी तो गद्दार कौम से ही आते है.  सानिया मिर्ज़ा टेनिस प्लयेर विश्व सर्वोच्च वरीयता प्राप्त पहली भारतीय है जो के वीमेन डबल में आई अभी तक किसी भी भारतीय महिला को ये सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ. अब अगर कोई दूसरी महिला आती भी है तो पहली महिला तो एक गद्दार ही रहेगी तो उनके दोवारा जीती हुई समूची ट्रॉफी भारतीय खेल संघ वापिस करे क्योकि उनके अंदर से भी गद्दारी की बदबू आती है. हिमालय, हमदर्द, सिप्ला, विप्रो, वोकार्ड इन सभी कम्पनीज के प्रोडक्ट से भी गद्दारी की बदबू आती है और इनको भी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. फिर ऐ.ऍम. अहमदी, मिर्ज़ा हमीदुल्लाह  बेग  और अल्तमश कबीर ने जो भी फैसले उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायधीश की हैसियत से दिए है उनको रद्द करना चाहिए क्योकि उनके फेसलो से गुलामी की बदबू आती है और इनके फैसले गद्दारी भरे है तो हर वो काम जो भारत में पहले किसी ने नहीं किया वो एक मुसलमान ने किया है तो गद्दारी का तमगा तो इन जैसे आतंकवादीओ को पहनना चाहिए जो देश की इमारतों को भी अब मज़हब की दीवारों में कैद कर रहे है.


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