अज़ीज़ नाज़रीन,
ज़मीनी जंग इजराइल के ज़ालिम दरिंदे शैतान दहशतगर्द सनकी तानाशाह के लिए लोहे के चने साबित हो रही है। हमास के पाकीज़ा फौजी गोरिल्ला जंग के माहिर हैं और यही हिकमत तालिबान ने अमेरिका की यहूद और भारत की ज़ाफ़रानी दहशत को उखाड़ फेकने के लिए अपनाई थी।
जब तक अमेरिका फ़िज़ाई हमले कर रहा था लंगूरों की जमात खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। उस वक़्त तालिबान के लिए यही अलफ़ाज़ थे जो आज हमास के लिए इस्तेमाल किये जा रहें हैं। इन लंगूरों की जमात ने झूठी ख़बरों पर तालिबान की भी किरदार कूशी की थी। तालिबान के आतंकी गधों के साथ ज़िना करते हुए अमेरिका के फ़िज़ाई तय्यारे में क़ैद हुए। अमेरिका के एक ही मिसाइल हमले में चीथड़े उड़ गए। आज यही लंगूर और इनकी हुकूमत तालिबान के सामने हाथ बांध के खड़े हैं। इतना ही नहीं अब आप जनाब से मुख़ातिब करतें हैं। रूको ज़रा अक़वामे मुताहिदा में तालिबान को अपनी नुमाइंदगी दर्ज करने दो फिर देखो कैसे यही लंगूरों की जमात तालिबान की दुम छल्ला बन जाएगी।
ज़मीनी
जंग इजराइल के लिए उतनी आसान हरगिज़ नहीं होगी जितनी की उसको तवक़्क़ो थी। जो हालात तालिबान के साथ अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका
ने देखे वही हालात हमास और हिज़्बुल्लाह के मुजाहिदों के साथ इजराइल को देखना पड़ेगें। इस पसमंज़र में भारत को बोहोत ही परेशानकुन हालात
में देख रहा हूँ। उसकी वजह सिर्फ़ और सिर्फ़
लंगूर लँगूरनियों की झूठी ख़बरे और ज़हरीली ज़ुबान की वजह से भारत हुकूमत को सख़्त नुकसान
का सामना करना पडेगा। जैसा तालिबान को आतंकी
बोलते थे अब उससे किसी क़िस्म की कोई तिजारत का बहाना नहीं बना सकते और तमाम शिद्दत
पसंद संघ के कारकून जो इन २० सालों में अफ़ग़ानिस्तान पर क़ाबिज़ हो गए थे उन सभी को तालिबान
ने या तो मौत के घाट उतार दिया या क़ैद कर लिया।
बाक़ी बचे हुए अपनी जान बचा कर भारत आ गए।
अगर फ़लस्तीन का फौजी अमला हमास इजराइल से जंग जीत गया तो होगी भारत की सख़्त तिजारती फ़ज़ीहत। कियोंके यूरोप, अमेरिका और ख़लीज मुमालिकों को अपना माल खपाने के लिए भारत के लिए सबसे नज़दीक रास्ता फलस्तीन की स्वेज़ केनाल से होते हुए मेडिटेरियन से तमाम योरोप और अमेरिका में माल भेजा जा सकता है।
फिर
जो संघी और शिद्दत पसंद भारत से इजराइल जा बसे थे इस उम्मीद पर की हम फ़लस्तीन के अवाम
के साथ वैसा ही करेगें जैसा भारत में करतें हैं उनको वापिस लौटना पडेगा या होगी मौत।
जिस
तरह की ख़बरे यह लंगूर और लँगूरनियाँ चला रहें हैं ज़हर अंगेशी कर रहें हैं हमास को आतंकी
बोल रहें हैं फिर उनके लिए आगे के तमाम रस्ते बंद हो जातें हैं। कियोंके अगर हमास के जंग जीतने के बाद भारत हुकूमत
हमास से हाथ मिलाती है तो जूते पड़ेगें नहीं तो अपना सामान ज़्यादा रूपये वक़्त ख़र्च कर
के पूरे अफ्रीका के नीचे से हो कर अमेरिका और योरप भेजना पडेगा।
क़ुदरत
क्या चाहती है वोह तो ज़ाहिर हो रहा है। आज
३० दिन बाद भी जंग चालू है और हमास का पड़ला भारी है।
मासूम
अवाम का २ साल से ले कर १० साल तक के बच्चों का क़त्ल ए आम कर के एक सामाज की नस्ल कूशी
कर के जंग नहीं जीती जाती वोह तो जंगी जराइम होता है। मोदी की दोस्त सूई की जैसा हाल नितिन याहू का होगा। जिसने अक़्वाम ए मुताहिदा की पनाह गाह पर, शिफ़ा ख़ानों,
स्कूल, एम्बुलेंस, रहाहिशी इमारतों हमला किया और तक़रीबन ९००० मासूम अवाम बच्चों और
ख़ातूनों को हलाक किया।
नितिन याहू सख़्त जंगी जराइम और फ़लस्तीनी नस्ल कूशी का मुजरिम है।
सहाफ़ी
ज़ुबेर
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