अज़ीज़ नाज़रीन,
आज का मौज़ूं हालाते हाजरा और उन तमाम हूकूमती ग़ुलामों
ख़्वाहा वोह ज़ाफ़रानी लंगूर-लँगूरनियाँ हों, फौज, अदलिया या इन्तेज़ामियाँ पर सहाफ़ी का
ज़ोरदार तमाचा है। नाज़रीन जहाँ हिन्द में कुछ
भी ग़लत होता है उसका ठीकरा संघ, बीजेपी, शिद्दत पसंद हिन्दू अब्दुल के फ़रज़न्द के ऊपर फोड़ना
शुरू कर देतें हैं। इसमें ज़ाफ़रानी लंगूर सरे
फेहरिस्त होतें हैं जो मसले को अपने ऊल जलूल फ़लसफ़े और हुकूमत की तरफ़दारी करने वाले मुबाहिसे से मज़ीद पेचीदा कर देतें हैं। लेकिन
जब मसला संघी दहशत, बीजेपी हुकूमत की ग़फ़लत और फौज के क़तल का मुल्ज़िम कोई संघी, बीजेपी
वाला या शिद्दत पसंद हिन्दू होता है तो इन बावले लंगूरों पर पूरी तरह ख़ामोशी छा जाती
है। और मौत की ख़ामोशी का मातम किसी मुख़्तलिफ़
मुद्दे पर करतें हैं जिसका कोई वजूद और बुनयाद ही नहीं होता है।
बरोज़ २६ दिसम्बर हिन्दू दहशत की पनहा गहा गुजरात के नाडियाद
में भारत के सरहदी दिफ़ा अमला (BSF) के एक फौजी मेलजी भाई वाघेला को शैलेश उर्फ़ सुनील
जादव ने डंडे से पीट पीट कर त्रिशूल से घोंप कर तलवार से काट कर भल्लम-भाला घुसा कर
हलाक कर दिया। जिसके सबब मौक़ा ऐ वारदात पर
ही वोह जवान हलाक हो गया।
आमुक क़ातिल सुनील जादव फौजी की दुख्तर के ऊपर ग़लीज़ निगाहें
रखता था और उसने फौजी की बेटी के नाज़ेबा वीडियो बना कर उनको सोशल मीडिया पर वाइरल कर
दिए थे। इस बात से ख़फ़ा फौजी के एहले ख़ाना और
उनका फ़रज़न्द नवदीप क़ातिल जादव को समझाने की नियत से उसके घर पहुंचे थे। मुबाहिसा बहस में तब्दील हो गया और इस दौरान क़ातिल
शैलेश उर्फ सुनील और उसके वालिद दिनेशभाई छाबाभाई जादव, चाचा अरविंदभाई छाबाभाई जादव,
दादा छाबाभाई चतुरभाई जादव, सचिन अरविंदभाई जादव, भावेश चिमनभाई जादव, कैलाशबेन अरविंदभाई
जादव और शांताबेन चिमनभाई जादव ने लाठी, तलवार, त्रिशूल, भाला, बल्लम, आरी और फावड़े
से जवान पर एक साथ हमला बोल दिया। जिसमे जवान मौक़ा ऐ वारदात पर ही हलाक हो गया और उनका
फ़रज़न्द शदीद ज़ख़्मी हो गया। जिनको अहमदाबाद
रिफर किया गया है। तमाम क़ातिल क़त्ल करने के
बात फ़रार हो गए।
नाज़रीन ऐसे हस्सास क़तल और मसलों पर ज़ाफ़रानी लंगूर-लँगूरनियाँ और तमाम हिन्दू मज़हब के पेशवा जिनके जज़बात ज़ाफ़रानी अगोछे से टूट जातें हैं तमाम मीडिया और मातम गेंग सब खामोश हैं। वहीँ अगर चीन के हमले पर असदुद्दीन हक़ बोलतें हैं की हमारे जवानों के ऊपर हमला हुआ तो यही हिन्दू रक्षक दल और मीडिया के नुमाइंदे बवाल मचा देतें हैं। हुकूमत से सवाल पर ग़द्दारी का तमग़ा असदुद्दीन और उनकी तंज़ीम के गले में टांग दिया जाता है।
कांग्रेस के सरबराह राहुल गांधी ने गलती से पूछ लिया की
चीन का हमारे सरहदों पर क़ब्ज़ा हो गया है और मोदी इन्तेज़ामियाँ की नाकामी ज़ाहिर हो रही
है तो उनको ग़द्दार बोला जाता है नाज़ेबा कलेमात से उनको उनकी वालेदा को नवाज़ा जाता है। इटली की बार डांसर जैसे ख़िताब दिए जातें हैं। नाना-नानी के घर से यही तालीम मिली है ऐसे अलफ़ाज़
राहुल गांधी को सुनाने पड़ते हैं। फिर ऐसे मसलों
पर जब बीजेपी के नुमाइंदे, शिद्दत पसंद हिन्दू अपने मुँह की गंदगी ख़ारिज करतें हैं
तो मीडिया पूरी तरह ख़ामोश रहती है और ऐसे नाज़ेबा कलेमात इलज़ाम लगाने के लिए बीजीपी के नुमाइंदों को खुला मैदान दिया जाता है। वहीँ कोई भी मुख़ालिफ़ मजलिस, कांग्रेस, सपा, बसपा,
त्रिमूल, कम्युनिस्ट अगर अपनी हक़ बात कहतें जो हुकूमत के ख़िलाफ़ जाती है तो मीडिया की
जानिब से फ़ौरन टोका टोकी शुरू हो जाती है।
तमाम मुख़ालिफ़ अगरचे वोह हक़ीक़ी भारत का वफादार है और उसके
अंदर जज़्बा है अपने वतन के लिए कुछ करने का लेकिन हुकूमत से जाइज़ सवाल भी कर लिया तो
वोह पाकिस्तानी, इटली के वफादार, ग़द्दार, दहशतगर्द, चीन के हमदर्द, नक्सल वादी हो जातें
हैं। फिर जिस हिन्दू ने एक फौजी को हलाक किया
वोह क्या हुआ।
राहुल गांधी ने हक़ीक़त बोला सुबह से शाम तक जो लोग हिन्दू
मुस्लिम हिन्दू मुस्लिम हिन्दू मुस्लिम करतें हैं अगर ज़र्रा भर देश के हक़ीक़ी मसलों
पर तवज्जो देतें तो आज भारत की ऐसी हालात नहीं होती।
नाज़रीन इन दोग़लों का किरदार देखिये कल देर शाम मक़तूल और क़ातिलों के नामों के साथ यह ख़बर मेरे पास पहुंच गई थी। लेकिन खबरनामे में मक़तूल का नाम तो छापा था लेकिन क़ातिल दहशतगर्द का नहीं, तो कुछ संघी; मुस्लिम अवाम के ऊपर इलज़ाम लगा रहे थे की मारने वाला विशेष समुदाय से होगा Religion of Peace से होगा। मेने कुछ जवाब नहीं दिया सोचा इनकी ही लाठी से पीटने दो। फिर आज जब नाम ज़ाहिर हुए और सब कुछ शफ़्फ़ाफ़ हो गया, की क़ातिल दहशगतगर्द हिन्दू हैं और मक़तूल सरहद पर दुश्मन से लड़ने वाला फौजी तो दहशतगर्दों ने अपनी बरदारी के इंसान को बचाने के लिए मक़तूल की बेटी के किरदार का क़त्ल करना शुरू कर दिया। उसको आवारा, बदचलन, बरहना थी जो पराये मर्द के साथ जा कर ज़िना किया ऐसे तास्सुरात आने लगे। अब किस को बचाने की कोशिश कर रहें हैं। यह संघी तो कौरवों से भी ज़्यादा बड़ा चीर हरड़ कर रहें हैं। वहीँ दूसरी जानिब श्रद्धा-आफ़ताब, ज़ीशान-तूनिशा शर्मा की मोहब्बत को ग़लत रंग दे कर अब्दुल को बदनाम किया जा रहा है। वही फ़लसफ़ा इस The Butcher of Gujrat के ऊपर काहे को नहीं लागू होता। जिसने फौज के जवान को हलाक कर दिया।
अब बताओ कौन है दहशतगर्द। जिस आर्मी के लिए लंगूर-लँगूरनियाँ संघी, बीजेपी वाले और शिद्दतपसन्द हिन्दू पापले पीटते हैं उसी फौज के जवान को कहीं और नहीं बल्कि हिन्दू आतंक के गड में क़तल कर दिया। बताओ जिस फौजी को सरहद की हिफाज़त करने की ज़िम्मेदारी होती है उसी फौजी को आतंकिओं ने अपने गड भगदादी की पनाह गाहा रक़्क़ा (गुजरात) में मौत के घाट उतार दिया।
नाज़रीन ज़रा तसुव्वर कीजिये अगर किसी अब्दुल के फ़रज़न्द ने फौजी को हलाक किया होता वोह भी ऐसी सूरते हाल में की उसकी बेटी के वीडियो उसने वायरल किये होते थे तो क्या हाल होता अभी तक उसका लंगूर-लँगूरनियाँ, ज़ाफ़रानी महाज़ इज्तेमाई क़तल कर चूका होता। अभी तक तो ना सिर्फ अब्दुल उसका एहले ख़ाना बल्कि पूरी मुस्लिम माशरत तबाह हो जाती। फिर तमाम हमदर्दी उस मक़तूल फौजी के एहले ख़ाना और उसकी जानिब मुतवज्जो हो जाती। अब्दुल के फ़रज़न्द का घर अब तक मिस्मार कर दिया जाता और उसको पुलिस शदीद अज़ीयत देती हुई पाई जाती। फौज के अराकीन, कर्नल, मेजर मीडिया के रू बरू बैठ कर सिर्फ अब्दुल के फ़रज़न्द के नहीं बल्कि पूरी मुस्लिम बरादरी के मुक़ाबिल आ जाते। लेकिन अब चारों जानिब ख़ामोशी है। ऐसा कियों??
आफ़ताब-श्रद्धा और अभी ज़ीशान-तनीषा शर्मा की मोहब्बत के बारे में टीम ऑटोनोमस जौर्नालिस्ट की पूरी तहक़ीक़ात रिपोर्ट आ गई है। मसला ऐसा नहीं है जैसा मीडिया पेश कर रहा है। ज़ीशान के बारे में जो कुछ भी तनीषा की वालेदा ने कहा लिखा वोह सब दबाव में बोला गया है। लेकिन सही वक़्त पर उसको शाया करूँगा।
Zuber
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