अज़ीज़ नाज़रीन,
एक
कहावत है जो दूसरों के लिए खड्डा खोदता है पहले वोह ख़ुद ही उसमे गिरता है। यहाँ दो बात आप हज़रात के ज़हेनशीन करना चाहूंगा। एक होता है ग़फ़लत में किया गया काम और दूसरा होता
है साजिश, ज़हन की गंदगी, ज़हर की मिक़्दार भरे आलूद की वजह से किया गया काम। पहले वाले में इंसान नादानी में कोई काम कर जाता
है मक़सद उसमे किसी भी साजिश या ज़हन की गंदगी आलूद नहीं होता है। लेकिन दुसरे वाले में मुजरिम साजिश करता है जुर्म
करने की हिकमते अमली इख़्तेयार करता है फिर जुर्म कर डालता है।
वही आज ज़ाफ़रानी कीड़ों के साथ हो रहा है। जो ज़रा सी बात पर कुलबुलाने लगतें हैं और अपने ज़हन की गंदगी ख़ारिज करतें हैं, लेकिन वोह ख़ुद नहीं देखते की ख़ुद कितने बड़े कमज़र्फ, बरहना अपने छाती की नुमाइश करने वाले तवाइफ़ों से बदत्तर किरदार के हामी हैं। अब इन्ही मोहतरमा को देख लीजिये। एक हैं अमरावती की मेंबर पार्लियमान नवनीत राणा और दूसरी ज़ाफ़रानी वज़ीर स्मृति ईरानी। लेकिन इन दोनों की बरहना कारगरदेगी देखिये। नवनीत को देखिये कैसा अपनी छाती और जिस्म का मुज़ाहेरा फिल्म में कर रही है। यह बोहोत भगवा का सम्मान कर रही है। दूसरी जानिब साधू है जिसको उचक उचक कर नवनीत राणा मुत्मइन करने के इशारे कर रही है।
यह नवनीत राणा वही है जो लंगूर चालीसा पर बोहोत फुदकी थी फिर जेल में क़ैदियों ने इसको हर रोज़ रात को उचकाया था। बाद में सहाफ़ी इजलास में सहाफियों ने इससे लंगूर चालीसा पड़ने को बोला तो बगलें झाँकने लगी। लंगूर नाम कैसे पड़ा वही पता नहीं था। मतलब जबरन की सियसत कर रही थी मोहतरमा लेकिन क़ैदियों के साथ एक हफ्ते रहने के बाद टांगों में तकलीफ इतनी बढ़ गई की चलने फिरने में दर्द होता था। बावली
नाज़रीन सिनिमा थिएटर से सहाफ़ी का कोई सरोकार नहीं है और ना ही फ़िल्में देखता हूँ लेकिन मालूमात पूरी रहती है। और जहाँ तक इस सहाफ़ी की पसंदीदा अदाकाराओं का सवाल है उसमे शामिल हैं। करीना भाभी, दीपिका पादकोण और स्वरा भास्कार।
नाज़रीन इससे क़ब्ल भी कई दफ़ा इस बात को अपने मज़मूनों और ख़बरनामों के तब्सिरों में बता चूका हूँ।इन भगवा धारियों की बातों का असर अवाम पर कियों नहीं होता है कियोंके यह लोग खुद उस अमल को करने में शामिल रहतें हैं तभी अवाम पर इनकी बातों का असर नहीं होता है। अपनी बात को एक सबक़ आमोज़ कहानी के साथ ख़तम करूंगा।
किसी गाँव के लोग बोहोत ही ओबाश क़िस्म के थे फाहशी के हर गुनाह में मुलव्विस थे। हुकूमत परेशान हो गई की कैसे इन गुनाह के सौदागरों को राहे रास पर लाया जाए। किसी पंडित भगवा धारी को यह बात पता चली। उसने फ़ौरन मंसूबा बनाया की उस गाँव में पहुंचना चाहिए। अब पंडित जी मंदिर खोल कर बैठ गए। टीका शीका लगा कर और भक्तों को दर्स देने लगे। धीरे धीरे भक्तों का तांता लग गया और भीड़ बढ़ते बढ़ते १०० से हज़ार फिर लाखों में पहुंच गई। लेकिन जुर्म वहीँ के वहीँ कम होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बल्कि पंडित जी के आने के बाद तो अब भगवा धारी खुले आम बरहना रक़्स करने लगी। ज़िना कारी, शराबख़ोरी, जूआ तमाम काले कारनामे बढ़ते चले गए।
यह
माजरा देख कर कुछ सर फ़िरे सहाफियों, सामाज सुधारक दानिशमंदों और तहक़ीक़ात करने वाले
तालिबे इल्मों को बड़ा अचरच हुआ। महाराज के
मठ में हज़ारों लाखों की तादात में ज़ायरीन आ रहें हैं अवाम उनकी बातों से मुत्तासिर
भी बोहोत हो रहा है फिर क्या वजह है की जुर्म कम नहीं हो रहें।
इसके लिए सभी बाशाऊर अवाम ने ते किया की साधू की तहक़ीक़ात करना होंगी किया वजह है की अवाम इसकी बात का एहतेराम कियों नहीं कर रहे। एक सहाफ़ी, एक दानिशमन और एक तहक़ीक़ात करने वाला तालिब इल्म रात की तारीकी में मंदिर के तहख़ाने के अंदर दाख़िल हुए, और देखा की साधू महाराज तो करोड़ों अरबों की मादक आशियात के ताजिर हैं। और वोह तिजारत करने की गरज़ से गांव में आये थे।
वोह
पंडित जी के आस पास ख़ूबसूरत भगवाधारी नवनीत राणा जैसी एक नहीं १०-१२ सफ़ेद मुर्गियों
की फौज थी जो उनका दिल बेहला रही थी।
शराब ख़ोरी, हराम की दौलत का ज़ख़ीरा पड़ा था। दरअसल पंडित जी उस गाँव में आये ही इसलिए थे कियोंके
उनके पीछे पुलिस पड़ी थी और उनको पोशीदा होने के साथ साथ अपनी नाजाइज़ तिजारत को फैलाने
के लिए एक आसरा चाहिए था।
तो
बात समझ में आ गई की खुद पंडित जी रातों की तारीकी में हरामकारी में मुलव्विस थे और
सुबह के उजाले में मंदिर में दरस देते थे।
तो उनकी बातों से मालिके कायनात ने रेहमत छीन ली थी जो शहद सी मिठास थी वोह
ख़तम कर दी थी और अवाम पर उनकी बातों का असर नहीं हो रहा था।
सच्चा साधू और वली वही जिसकी बातों का असर सुनने वाले पर इस क़दर हो की आँखों से पशेमानी के आंसू रवां हो जाएँ और वोह अहद करे की अब तो इस गुनाह को हरगिज़ नहीं करूँगा। नाज़रीन किसी भी इंसान को दरस देने से पहले इंसान को यह देखना चाहिए क्या वोह आदत उसमे तो नहीं है। अगर है तो पहले खुद अपने आप को दुरस्त करे फिर दूसरों को बोले। तभी उसकी कही बात का अवाम पर असर होगा।
।। एक था आसाराम, एक है झांसाराम ।।
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