गुजरात दंगो
की आग जो गोधरा साबरमती एक्सप्रेस के जलने के बाद शुरू हुई थी अब समूचे भारत को अपनी
आगोश में ले चुकी है. असल में देखा जाए तो साबरमती एक्सप्रेस में जो कुछ भी हुआ उसके
लिए हिन्दू आतंकवादी ही ज़िम्मेदार है और आग के हवाले से रिपोर्ट भी उस समय की रेलवे
मिनिस्ट्री ने दी थी के आग बहार से नहीं लगाई गई और इसमें मुस्लिम समाज की किसी भी
साजिश को इंकार किया था. लेकिन तब की मोदी सरकार जो अपने हिटलर मानसिकता के लिए मशहूर
है उसने रिपोर्ट को ना तो गुजरात असेंबली में और ना ही पार्लियामेंट में बेहेस के लिए
आने दिया. इतना ही नहीं गोधरा भी किया आतंकवादिओं
ने अपने आका मोदी के इशारों पे और आग की तपिश भी सही बे गुनाह मुसलमानों ने. उस आग में कुछ ३००० मुसलमानो को अपने प्राणों की
आहूति देनी पड़ी थी. और करोड़ों की मुस्लिम सपत्ति
या तो आतिशे नार कर दी गई या लूट ली गई थी.
विडम्बना देखिये आग लगाईं किसने और क़त्ले आम हुआ किसका फिर गिरफ्तारी भी तो
मुस्लिम समाज के लोगो की ही हुई जिसमे शामिल थे बड़े बड़े उलमा मस्जिद के इमाम. गोधरा केस में जिन बेगुनाहों को गिरफ्तार किया गया
था वो २०-२५ साल बाद जेल से बेगुनाह रिहा हो गए.
किसी मौलाना ने जेल में क़ुरआन को पूरा हिफ़्ज़ कर लिया किसी ने उसकी ट्रांसलेशन
कर डाली ऐसे बोहोत से केसेस इस पत्रकार के ध्यान में लाये गए.
फिर जो मंत्री मोदी के हिटलर रुपी मानसिकता और इस
हत्याकांड की निंदा कर रहे थे उनको भी मौत के घाट उतार दिया गया. जिसमे शामिल है मंत्री हरिन पंडिया की हत्या. उसमे भी मुस्लिम समाज के लोगों को पकड़ा गया उस हत्याकांड
में मोदी के शामिल होने की बात भी श्री पंडिया की पत्नी ने की थी और मुस्लिम समाज को
गलत गिरफ्तार किया है, फिर उस साजिश में भी कुछ १२ मुसलमान बरी हुए जिनको उच्च न्यायलय
ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था.
१९९३ के बाद
से जितने भी बम ब्लास्ट हुए तकरीबन उन सभी में हिन्दू आतंकवाद ज़िम्मेदार था लेकिन गिरफ्तारी
मुसलमानो की हुई. इतना ही नहीं जिन मुस्लिम हलकों में समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद,
मालेगाव, अजमेर शरीफ इन ब्लास्ट्स में भी मुस्लिम समाज की बड़े पैमाने पे गिरफ्तारी
हुई. यहाँ तक के पड़े लिखे डॉक्टर्स, इंजीयर्स,
अकाउंटेंट्स ऐसे मुस्लिम नौजवानो तक को गिरफ्तार किया गया. प्रोफेशनल कोर्सेस करने
वाले मेडिकल, इंजिनीअरिंग, बिज़नेस मैनेजमेंट के विद्यार्थिओं को तक गिरफ्तार किया गया,
इन सब के पीछे छुपा था संघी नकाब जिसको कांग्रेस सरकार और उसके नुमाइंदे सपोर्ट कर
रहे थे. और उस संघी दिमाग की मिलीभगत के चलते
कांग्रेस बेगुनाह मुस्लिम समाज पे ज़ुल्म कर रही थी. चाहे वो सिमी के कारकून बोल के
गिरफ्तारी की जाए या आतंकवादी बोल के सब बेगुनाह थे और उन मुसलमानो की ज़िन्दगी बर्बाद
करने में कांग्रेस सरे फेहरिस्त रही.
देखने वाली
बात ये हे की २०१४ के बाद से समूचे बम ब्लास्ट रूक गए आखिर क्यों? क्योंकि अब खुद संघी और आतंकवादी सत्ता में है अगर
फिर भी बम ब्लास्ट होते है तो उनकी सरकार की फजीती होगी. लेकिन अब बम ब्लास्टों की जगह ले ली है मोब लांचिंग
और अज्ञात हमलावरों ने जो आतंकी हमला कर के हर दुसरे रोज़ एक दो एक दो बेगुनाह मुसलमानो
को शहीद कर रहे है.
इस तरह के
आतंकी हमलो से पडोसी देश कश्मीर भी अछूता नहीं रह सका. २०१४ के बाद से जब चाहा आतंकिओं
ने किसी भी मुस्लिम सेना के अधिकारी, सेना के जवान या कश्मीर पुलिस के जवानो को अगवाह
किया और हलाक कर दिया. फिर सरकार ने बजाये जांच पड़ताल करने के ज़िम्मेदारी डाल दी
हिज़्बुल मुजाहिदीन, लश्करे तोयाबा या कोई और पाकिस्तान आधारित तंज़ीम पे. हालाँकि कश्मीर में २०१४ के बाद कम से कम १५० से
ज़्यादा मुस्लिम सेना या कश्मीर पुलिस के जवानों की हत्यायें हो चुकी होंगी. पिछले १०
दिनों के अंदर कश्मीर में दो पुलिस वालों की हत्यायें हो जाती है और सभी हत्यांओँ में
कार्य-प्रणाली तकरीबन एक सामान होती है सेना या पुलिस के जवान छुट्टी पे होते है या
कही जा रहे होते है और तीन बन्दूक धारी उनका अपहरण कर लेते है बाद में हत्या.
आम तोर पे
इस तरह की हत्याओं को हिज्बुल, हाफिज या पाकिस्तान
के ऊपर ज़िम्मेदारी डाल के आतंकी हमला नाम दे कर कोई भी कारवाही नहीं होती और ना ही
कोई जांच वगेरा होती है. अब सवाल ये उठता है
हर मुस्लिम पुलिस वाला या सेना के जवान को कैसे कोई अज्ञात हमलावर अगवाह कर लेते है.
कौन है ये अज्ञात हमलावार कहाँ से आते है और आतंकी वरदार को अंजाम दे कर कहाँ गायब
हो जाते है. इन आतंकिओं को किस सरकार का संरक्षण हासिल है.
कश्मीर में
हत्याओं की ज़िम्मेदारी भारत सरकार हिज्बुल, लश्कर, हाफिज या पाकिस्तान के ऊपर डाल के
अपनी ज़िम्मेदारी से भाग सकती है लेकिन भारत के दुसरे हिस्सों में कौन मार रहा है. मोब
लांचिंग एक आम बात हो गई है और इसमें सभी मरने वाले बेगुनाह मुस्लिम है. जो लोग खून
खराबे की भाषा को ही अमन की भाषा बोलते है ये उन्ही लोगो का काम है जो गुजरात २००२
के दंगो से शुरू हुआ था अब समूचा देश इसकी गिरफ्त में है. दूसरी बात सिर्फ मुस्लिम
अधिकारी ही काहे को अगवाह किये जाते है क्या हिज़्बुल की दुश्मनी सिर्फ मुस्लिम अधिकारिओं
से है. क्या भारतीय आतंकी फ़ोर्स (सेना) के हिन्दू जवान या अधिकार छुट्टी पे नहीं जाते
होंगे. क्या भारतीय फौज में सिर्फ मुस्लिम ही तैनात है तो काहे को किसी हिन्दू सेना
के अधिकारी को अगवाह नहीं किया जाता. दो बाते एक दम साफ़ है भारतीय सेना मुस्लिम जवानो
को सुरक्षा प्रदान करने में लापरवाही बरत रही है दूसरी ये काम हिन्दू आतंकवादिओं का
है.
इन सभी हत्याओं
को देखते हुए यहाँ पे दो बातें निकल के सामने आती है एक २०१४ के बाद से इस तरह से अगवाह
कर के हत्याओं का सिलसिला बढ़ता जा रहा है लेकिन ना तो साकार ने और ना ही सेना ने कोई
भी ज़रूरी कदम उठाये तो इससे साफ़ ज़ाहिर हो रहा है ये हत्याएं सोची समझी साजिश के तहत
की जा रही है. दूसरी सरकार जान बूझ कर अनजान बन रही है और अपने खुद के सैनिकों को ज़ात
धर्म के आधार पे मरवा रही है, क्योंकि जिस सेना के ऊपर भारत की जनता अभिमान कर सकती
है अगर वो सेना के जवान खुद ही सुरक्षित नहीं है तो वो देश की सुरक्षा क्या ख़ाक करेंगे.
यहाँ ये पत्रकार ये बात साफ़ करता चले की जंग में मरना अलग बात और अगवाह कर के हत्या करना अलग
बात है.
ये पत्रकार
पूरी ज़िम्मेदारी और प्राप्त जानकारी की अनुसार पूरी ज़िम्मेदारी से लिख रहा है कुछ नहीं
ये सब हत्याएं हिन्दू आतंकवादिओं का काम है और भारत देश की सरकार के संरक्षण में ये
आतंकी पडोसी देश कश्मीर पे हमला कर के वापिस भारत में भाग जाते है. जिस तरह से इस पत्रकार ने लिखा था के गोधरा काण्ड उस समय की सरकार की देन थी लेकिन संघ और बीजेपी की हिकमत अमली के चलते ना सिर्फ गोधरा काण्ड दब गया बल्कि दंगो का दाग भी उसके ऊपर से धुल गया. उसी तरह से कश्मीर में मुस्लिमों की हत्याओं का राज़ भी पाकिस्तान, लश्कर, हिज्बुल के नाम के पीछे दबा दिया जायगा और एक राज़ बना रहेगा.
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