मराठी अस्मिता को ठेस ना पहुंचाई जाए. किसी भी आंदोलन के हिंसात्मक रूख की ये पत्रकार
पूरी तरह से मज़मत और निषेद करता है. इस पत्रकार
का मानना है की अपनी बात को रखने और कहने के दो तरीके होते है एक अहिंसात्मक और दूसरा
हिंसात्मक. जब बात अहिंसा से हल हो जाय तो हिंसा करने, आगजनी, लूट मार, हत्या जैसे
जुर्म करने की कोई ज़रुरत ही नहीं है. मराठा
आंदोलन की आग और आगे बड़े और महाराष्ट्र की अस्मिता को ठेस लगे उससे पहले ये पत्रकार
राजनैतिक दलों ख़ास कर के सत्ता धरी शिव सेना के सरबराह उद्धव ठाकरे जी से निवेदन करेगा
की आंदोलन शांति पूर्वक करने की अपील करें.
इस आंदोलन में अभी तक कुछ ४ प्रदर्शन
कर रहे लोगो की मौत हो चुकी है और एक पुलिस कॉन्स्टेबल जो लोगो के आक्रोश का सामना
कर रहा था और उसने अपने प्राणो की आहूति दी.
ये बोहोत ही दुखद है जब एक पुलिस वाला अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए वीर
गति को प्राप्त होता है.
अपने हक़ के लिए लड़ना उसके लिए जद्दो
जेहद करना बोहोत अच्छी बात है और मराठी अस्मिता, मराठा समुदाय के लिए आरक्षण के लिए
लड़ाई लड़ना बोहोत ज़रूरी है लेकिन उसके लिए हिंसा का मार्ग अपनाना गलत बात है. अहिंसात्मक तरीके से अपनी बात को रखा जा सकता है
सरकार की नीतिओं को ना माना जाए असहयोग आंदोलन
किया जाए जब तक तुम्हारी बात को ना माना जाता.
लेखक तो कश्मीर
जैसे विवादित मसले पे भी बात चीत के रस्ते को ही एहमियत देता है लेकिन भारत सरकार कश्मीर
मसले के ज़ुबानी सवाल पे गोली से जवाब देती है इसलिए वहां की जनता का अपने हक़ के लिए,
क्रूरता, प्रताड़ना के खिलाफ बन्दूक उठाना एक मजबूरी है और उस मजबूरी में लेखक की रज़ामंदी
है. लेकिन अभी महाराष्ट्र में कश्मीर जैसे जिहादी या गुजरात जैसे आतंकवादी हालात नहीं
आये है.
ये पत्रकार शिव सेना के उद्धव ठाकरे
की नीति और नियत पे कभी भी संशय नहीं कर सकता.
कभी शिव सेना भी बीजेपी के रस्ते पे चल के देश में आतंक और अराजकता का माहौल
पैदा करना चाहती थी. ९० के दशक से ले कर कुछ २०१२ तक शिव सेना एक आतंक फैलाने वाली
पार्टिओं में गिनी जाती थी. शिव सेना का नाम आते ही जनता के मन में एक सवाल कौंध जाता
था की आतंक, लूट मार काट करने वाली पार्टी. जिसके नज़दीक लोकतांत्रिक मूल्यों को कोई
भी एहमियत नहीं है.
लेकिन बालासाहब के निधन के बाद जब
से पार्टी की ज़िम्मेदारी उद्धव ठाकरे के हाथों में आयी है उन्होंने शिव सेना को एक
नई दिशा दी है और अब शिव सेना के प्रति लोगो का नजरिया भी तब्दील हो रहा है जो झूट
और पाखंड पे यकीन करने के बजाय जनता के लोकतांत्रिक मूल्यों को ज़्यादा महत्त्व देती
है. जो किसी हिटलर मानसिकता को जवाब देहि के
बजाय जनता के प्रति जवाब देहि को ज़्यादा तवज्जो देती है.
किसी भी राजनैतिक
पार्टी के लिए ये बोहोत महत्वपूर्ण है की जनता उसके साथ जुड़े; ना के उससे दूर भागे.
इस जुड़ने के भी दो रास्ते है एक पाखंड, झूट और फरेब फैला के और दूसरा जनता का दिल जीत
के उसके मूल्यों पे खरे उतर के. अब जो पार्टी
झूट, फरेब, पाखंड की राजनीति करती है उनका ५६ इंच गुब्बारा जनता के सामने ही फट जाता
है और अंदर का मवाद, ज़हर, आक्रोश, नफरत, साम्प्रदाइकता सब जनता के सामने आ जाता है
लेकिन जो जनता के लिए काम करते है वो सदा ही हरे भरे रहते है और जनता के दिलों पे राज
करते है. और जो जनता के दिलों पे राज करेगा
वही देश की सत्ता पे राज करेगा. घोटाले, घपले, ईवीएम से चुनाव तो जीता जा सकता है परन्तु
जनता का विशवास नहीं.
तो ये पत्रकार अपील करता है के महाराष्ट्र को दूसरा गुजरात, राजिस्थान, हरयाणा, झारखंड ना बनने दिया जाए, और सरकार से अपनी बात मनवाने के लिए शांति प्रिय तरीके से आंदोलन किया जाए और हिंसात्मक आंदोलन को पीछे ले लिया जाए. जिससे महाराष्ट्र और मराठी अस्मिता दोनों बचे रहेंगे.
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