बरोज़ मंगल तारीख २२ अगस्त २०१७ उच्चतम न्यायलय
का निर्णय ट्रिपल के ऊपर आया और उस निर्णय की कॉपी मेरे को कुछ शाम ४ बजे के करीब वसूल
हुई. अभी तो आधा भी जजमेंट नहीं पढ़ा है लेकिन
इसके बाद इस बात को में पूरी विश्वसनीयता के साथ कह सकता हूँ के सरकार को ट्रिपल तलाक
के ऊपर ज़बरदस्त झटका लगा है और सरकार की ट्रिपल तलाक के ऊपर किरकिरी और फजीती हुई है. दूसरी बात जो संघी संघटन और बीजेपी ट्रिपल तलाक
के ऊपर टी.वि रिपोर्टर्स के सामने अपनी सरकार की उपलब्धि बता रहे थे वो सभी अब खामोश
हो गए. यहाँ तक के टी.वि. चैनल तथा उनकी रिपोर्ट्स
अब सभी खामोश है. और अब ट्रिपल तलाक के ऊपर
कोई न्यूज़ कवरेज किसी भी चैनल पे दिखाई नहीं दे रहा है. बल्कि तमिलनाडु की खबरे चलाई
जा रही है. जो बिकाऊ ज़मीर फरोश रिपोर्टर्स टी.वि. पे ट्रिपल तलाक़ के ऊपर कसीदे करती
दिखाई दे रही थी अब वो सब खामोश दिखाई दे रही हे जैसे किसी गुनाह को करने के बाद कोई
लड़की कैसे अपने माता पिता के सामने गुनहगार के हैसियत से खड़ी हो.
जजमेंट पड के ऐसा लगता हे की न्यायमूर्तिओ
ने सरकार की मंशा को भांप लिया हो और सरकार की मंशा पूरी नहीं होने दी ये सबसे बड़ी
हार और झटका है सरकार के लिए. क्योकि सरकार की तरफ से मुक़र्रर अटॉर्नी जनरल ने पुर
ज़ोर अपील की थी के इस्लाम से तलाक़ नाम का फलसफा ही गायब कर दिया जाय हर तरह की तलाक
को खत्म कर दिया जाय और ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ ख़त्म कर के मुसलमानो के लिए भी एक कॉमन
लॉ नफीस कर दिया जाय और फिर एक हिन्दू की तरह मुसलमान जोड़ा भी अगर एक दुसरे से नहीं
निभा पा रहा हे तो ऐसी सूरत में भी उसको निभाना ही पड़ेगा फिर उसके भयावह परिणाम जैसा
की हिन्दू समाज में होते हे पत्नी की खुदकशी या पति का पत्नी को जान से मार डालना वैसे
ही मुस्लिम समाज में भी देखने को मिले या ये बाते मुस्लिम समाज में भी आम हो जाए. उससे
सरकार की मंशा साफ़ दिख रही थी के वो ट्रिपल तलाक के खात्मे के लिए काम नहीं कर रही
है बल्कि मुस्लिम शरीयत को तबाह करने के लिए और ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ के खात्मे लिए काम कर रही है.
जिसके ऊपर न्यायपालिका ने पूर्णविराम लगा दिया.
फिर सरकार को ट्रिपल तलाक के ऊपर भी ज़बरदस्त झटका इस बात को लेकर लगा हे के न्यायतंत्र में भी ट्रिपल तलाक़ समाप्त करने को ले कर एक मत या एक राय नहीं हे. २ नयमूर्ति ये मानते हे की ये एक पेचीदा मसला हे और सालो से प्रथा में चला आ रहा हे तो ये असवैधानिक प्रक्रिया नहीं हो सकता और इसको खत्म नहीं किया जा सकता. तथा तीन न्यायमूर्तिओ का ये मानना हे के ये प्रक्रिया असवैधानिक है. तो अब इस ३-२ के इस फैसले के बाद ये डिमांड उठना लाज़मी है के सरकार को अगली या हायर बेंच में सुनवाई के लिए केस को रेफेर करना चाहिए. ये जो फैसला है ५ जजेस की बेंच का था जिसके ऊपर भी एक राय नहीं थी तो अब क्या सरकार एक राय कायम करने के लिए ७ बेंच की पीठ को केस रेफेर करेगी. अगर सरकार ऐसा नहीं करती है तो उसकी मंशा साफ़ ज़ाहिर होती हे के वो न्यायपालिका या सांविधानिक प्रक्रिया पे ज़्यादा यकीन नहीं रखती बल्कि बलि पालिका या बलि तंत्र पे ज़्यादा यकीन रखती है. सरकार का मकसद न्याय स्थापित करना नहीं बल्कि शरीयत को ख़त्म करना था.
न्यायपालिका के इस फैसले को कुछ अनपढ़ बीजेपी के स्पोक पर्सन और कुछ रिपोर्टर्स आधा पड के सरकार की जीत बता रहे थे. कुछ संघी मानसिकता वाले आतंकवादीओ ने बयान दे डाला के ये कट्टरपंथियों की हार है. गलत हे ये सरकार की हार है. क्योकि समूची सरकारी यंत्रणा होने के बावजूद सरकार अपनी मन मानी नहीं कर पाई. मोदी सरकार का मकसद ट्रिपल तलाक़ को ख़त्म करना नहीं था ब्लकि तलाक़ नाम और ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ को ही ख़त्म करना था और वो मकसद में सरकार न काम हुई जो उसकी हार है न के जीत.
कुछ बीजेपी के कारकून और संघी पत्रकार कहते हुए दिखाई दे रहे थे के अगली राह कॉमन सिविल कोड की जानिब होगी. तो ये सब इतना आसान नहीं होगा. जब ट्रिपल तलाक़ पे सरकार न्यायपालिका की एक जैसी राय क़ायम नहीं कर पाई तो कॉमन सिविल कोड पे सौ करोड़ तीस लाख जनता की राय को कैसे सरकार एक कर पाएगी. में मोदी को चेतावनी देता हूँ ज़रा कॉमन सिविल कोड का मसौदा तैयार कर के जनता के सामने रखो फिर देखो भील, मिज़ो, नागा, दलित और दीगर समाज कैसे तुम्हारी धज्जिया उडाता है. सिर्फ ज़ुबानी जमा खर्च में कुछ थोड़ी खर्च करना पड़ता है फिर ट्रिपल
तलाक़, कॉमन सिविल कोड, ३७०, गौ हत्या, बाबरी मस्जिद डिस्प्यूट, स्लोगन वन्दे....... या भारत.......
जैसे पेचीदा मामलो का नाम ले के वोट भी तो मिलता है. तो मोदी सरकार सिर्फ कॉमन सिविल कोड के हरे बाग़ संघी और कट्टरपंथी हिन्दुओ को दिखाएगी जिसकी राह बोहोत कठिन होगी इतनी आसान नहीं.
इन मुख्य पेचीदा मामलो में बीजेपी को न्यायलय से हार और शर्मिन्दिगी
का सामना करना पड़ा है जिनको बीजेपी चुनावी मुद्दा बनाती थी
1. वन्दे……. और भारत….. जैसे स्लोगन की वैधता को ही उच्चतम न्यायलय ने नकार दिया और कहा के ऐसे स्लोगन की कोई सवेधानिक वैधता नहीं हे और कही भी सविधान में भारतीय होने के लिए ऐसे स्लोगन का ज़िक्र है.
2. दूसरी शाकिस्त गौ हत्या पे हुई जिसमे उच्चतम न्यायलय ने सरकार की मंशा पे सवालिया निशान लगाते हुए सरकार से सवाल किया के क्या आप गाय की बलि धार्मिक कामो के लिए नहीं देते, क्या आप गोश्त खाने वालो को रोक सकते है, क्या गाय की बलि पूरी तरह से बेन हो गई है और गाय का गोश्त एक्सपोर्ट और दुसरे कामो के लिए बेचा या खरीदा नहीं जा रहा हे. तो आप किस आधार पे गौमांस पे पाबन्दी की सिफारिश करते हे.
3.
फिर बीजेपी को तीन तलाक़ पे हुई शिकस्त जिसको मिडिया बड़ा चढ़ा के दिखा रहा हे वो वैसा नहीं जैसा की प्रोजेक्ट किया जा रहा हे.
मिडिया
सिर्फ ट्रिपल तलाक़ पे इतना उत्तेजित हो कर क्यों समाचारो का संचालन कर रहा हे जबकि ऊपर लिखे हुए सभी मामलो पे बीजेपी को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हार
का सामना करना पड़ा हे. क्योकि ट्रिपल तलाक़ मुस्लिम सेंटीमेंट्स और धर्म से जुड़ा है और दुसरे मसले हिन्दू धार्मिक आस्था और हिन्दू धर्म से जुड़े हे. तो इससे ये भी साबित होता हे की मीडिया का एक धड़ा हिन्दू धर्म का प्रचार करता हे जबकि मुस्लिम धर्म का कुप्रचार.
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