अज़ीज़ नाज़रीन
इंडिया
में भिकारी, मुफ़लिसी एक आम सक़ाफ़त है और ख़ास मियाँ घुमक्कड़ के उस जुमले के बाद "अरे हम तो फ़क़ीर हैं, झोला उठा कर चल पड़ेगें जी" फ़क़ीरों की जैसे एक आंधी आ
गई है।
बॉम्बे
लोकल में रेलवे प्लेटफार्म पर टिकट विंडो पर हर जगह भीकारिओं की जमात देखने को मिल
जाती है। मज़े की बात यह भिकारी जगह का
इन्तेख़ाब भी खूब चालाकी से करतें हैं।
मेहराब के नीचे बैठेगें जहाँ से अवाम का आना जाना होता है या आम रस्ते पर
जहाँ से हर ख़ास और आम का आना जाना होता है।
हर मज़हब की इबादत गाह के पास मिल जायेगें।
इन भीकारिओं में से ९५ फीसद में पेशावर होते हैं जिनका भीक माँगना रोज़गार ही होता है। अगर ऐसों को पकड़ कर जेल में ठूसा जाएँ तो १५ लाख के सूट इनके अंदर से गिर पड़ेगें। इनके घर आलिशान होतें हैं और मौर को यह फ़क़ीर दाना डालता है। लेकिन पेशे से फ़क़ीर कहलाता है। जो हक़ीक़त में गरीब और मुफ़लिस होतें हैं वोह कभी भी अपनी इज़्ज़त ए नफ़्स की वजह से ऐसा काम नहीं करेगें भूके मर जायेगें लेकिन भीक नहीं मांगेगें और दुनियां को यह ज़ाहिर नहीं होने देंगें की वोह गरीब है। जो ख़ुद हो कर बोल रहा है में फ़क़ीर हूँ भीक मांग कर ज़ाहिर कर रहा है की वोह ग़रीब है मतलब सब से बड़ा झूठा और ग़द्दार है। वक़्त का सबसे बड़ा अमीर वही है।
नाज़रीन सूबे दरमियान (मध्य प्रदेश) के इंदौर में इंदिरा गाँधी के क़त्ल से क़ब्ल फ़क़ीरों के ऊपर सहाफ़ियों ने एक मोहीम चालू की थी। उस दौर के ख़बरनामे नई दुनियां हिंदी, दैनिक भास्कर और उस दौर के जो भी ख़बरनामे थे उनके सहाफ़ियों ने भिकारिओं के ख़िलाफ़ मोहीम का आग़ाज़ किया।
दरअसल घंटा घर ओवर ब्रिज के ऊपर भिखारियों का एक हुजूम जमना शुरू हो गया था, जो रीगल चौराहे तक रहता था। हुआ यह था ब्रिज के नीचे एक बड़ा सा मंदिर हुआ करता था। उसमे ज़ायरीन आते थे उनके चप्पल, पर्स और आशियात की चोरी की वारदातें बढ़ने लगी थी।
होता क्या था इंदौर के अतराफ़ खंडवा, महू, उज्जैन, रतलाम से ग़रीब अवाम आता और ओवर ब्रिज पर पनाह गुज़ीन हो जाता था। जिसकी वजह से शहर की ख़ूबसूरती को भी सख़्त बट्टा लगता था और चोरी चखारी की वारदात भी खूब बढ़ गई थी।
जब सहाफ़ियों के मज़मून लोकल ख़बरनामों में शाया हुए तो हुकूमत भी होशियार हो गई। अब भोपाल में वज़ीरे आला के दफ़्तर में काना फूसी का आग़ाज़ हुआ। जब सहाफ़त फ़क़ीर पर तनक़ीद कर रहा था तभी इंदिरा गांधी का क़तल हो गया। इंदौर कई महीनों के लिए कर्फ्यू की नज़र हो गया और पुलिस ने ओवर ब्रिज से तमाम फ़क़ीरों को उठा कर या तो जेल में ठूस दिया या उनके घर भेज दिया। इसी दौरान किसी सहाफ़ी ने इलज़ाम लगा दिया इन भगवा धारी फ़क़ीरों ने सिखों के क़त्ले आम और महारानी रोड, मेजेस्टिक नगर में उनके रोज़गार की जानकारी दंगाइयों की फ़राहम की है।
फिर क्या था जैसे ही कर्फ्यू खुला और रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी पटरी पर आई की हुकूमत ने एक ज़ुबानी तीर छोड़ दिया जो कोई भी ओवर ब्रिज पर रात सोते हुए दिखे उसको गिफ्तार किया जाए। फिर भिकारी सक़ाफ़त को एक जुर्म क़रार दे दिया। अब सहाफ़ियों और ज़ुबान बाज़ लोगों को मसाला मिल गया। कुछ फ़क़ीर गिरफ्तार भी किये गए अब अवाम में ऐसी बातें होने लगी की इनको ले जा कर गोली मार दी जाती है या इनके गुर्दे दिल आँखे निकाल कर इसका बिज़नेस हो रहा है वग़ैरा। ख़ैर वोह सब अच्छा ही हुआ था, अब भीक मांगने में लोग डरने लगे थे। जूना रिसाला जहाँ सुबह सादिक़ से फ़क़ीरों की आवाज़ें बुलंद होती थी तो मगरिब तब आते रहते थे सब बंद हो गए।
फ़क़ीरों की भी ३ तरह की जमात होती है एक करोड़ पती जो १५ लाख का सूट पहनते हैं और मशरूम खाते हैं दूसरा वोह जो मुफ़लिसी और कसमपुरसी में जी रहें हैं लेकिन इज़्ज़त ए नफ़्स की वजह से सब कुछ बर्दाश्त कर रहें हैं तीसरा वोह जो हक़ीक़ी फ़क़ीर है। मतलब राहे हक़ में फ़क़ीर हो गया है, ऐसे फ़क़ीरों को माल ओ दौलत दुनियां की हिर्स नहीं होती तमाम आलम की जायदाद तो ऐसे फ़क़ीरों के ज़ेरे क़दम होती है और ऐसे फ़क़ीर अपने घोड़ों के पैर सोने की ज़ंजीरों से बांधते हैं। #मेहबूब-ए-इलाही #निजामुद्दीनओलिया
बस
अब हुकूमत को चाहिए की ऐसी बात भर कर दे की जो कोई भी अवामी हलके में भीक मांगते
हुए देखा गया उसको पुलिस पकड़ लेगी और भिकारी प्रथा के ऊपर हुकूमत क़ानून
बनाएगी। फिर देखो सब ऐसे ग़ायब जो जायेगें
जैसे लाहौल पढ़ने पर शैतान के सर से सींग गायब होतें हैं।
बॉम्बे
में छोटे छोटे मासूम बच्चों से भीक मंगवाई जाती है छोटे बच्चों के साथ गाना गाते हुए
भिकारी लोकल, बस स्टैंड, अवामी आमदो रफ़्त गलीज़ कपड़ों के साथ ऐसे भिकारी देखे जा सकतें
हैं। ऐसी मासूम ज़िन्दगी को भीक मंगाने वाले
माँ बाप पर हुकूमत को हिकमत करना चाहिए। फ़िर
बेरुन मुल्क एक आम सक़ाफ़त इंडिया की निस्बत से जो मशहूर है भिकारी देश उसको ख़तम करना
सरकारों का काम है।
हुकूमत हिन्द ऊल जलूल क़ानून बनाती है सिर्फ अपनी सियासत को चमकाने के लिए हिजाब बेन, नमाज़ बेन, अज़ान बेन इन मुद्दों से इंडिया की साख बेरुन मुल्क बेहद ख़राब हुई है जबकि क़ानून ऐसा बनाना चाहिए जो इंसानियत और यतीम गुरबा की फ़ायदे का हो। ८० से ९० फीसद भिकारी भीक मांगने को एक रोज़गार के जैसे करतें हैं। सुबह नहा धो कर मस्त ऑफिस बेग कंधे पर टांग कर निकल जातें हैं दिन भर में अगर भीक मांग कर १००० रूपये भी जमा हुए तो एक महीने का ३०,००० कमा लेते हैं। एवरेज निकाला जाए तो १५ से २० हज़ार कहीं नहीं गए और ना कोई इनकम टेक्स ना कोई अवामी आमद रफ़्त पर टिकट। फ्री फुग्गे की कमाई। हक़ीक़त में ग़रीब सिर्फ ५ से १० फीसद होतें हैं जो इज़्ज़ते नफ़स की वजह से भीक भी नहीं मांग सकते। तो ऐसे प्रोफेशनल भीकारिओं पर हुकूमत को शिकंजा कसना चाहिए।
मियाँ घुमक्कड़ को अपने १५ लाख के सूट और बेरुन मुल्क वज़ीरों के साथ झूले पर झूलते हुए चाये पर चुस्की लेते हुए मौज करते हुए लंगूरों ने ख़ूब दिखाया अब ज़रा हक़ीक़ी फ़क़ीरों को भी दिखा दो जिनकी वजह से इंडिया का तसव्वुर ख़राब हो रहा है।
सहाफ़ी ज़ुबेर की पेशकश
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