Saturday, 16 September 2023

वली की शहादत हाकिम की बर्बादी।

अज़ीज़ नाज़रीन, 

जब भी कोई हाकिम किसी दरवेश को शहीद करता है तो उसका ज़वाल उस हाकिम और मुल्क के मुस्तक़बिल पर ज़बरदस्त पढ़ता है।  औरंगज़ेब आलमगीर एक ऐसे वाहिद मुग़ल बादशाह थे जिनके दौर ए हुकूमत में हिंदुस्तान की सरहदे फ़ारस से ले कर बर्मा और कश्मीर से कन्यकुमारी तक फ़ैली थी।  मुग़लिया हुकूमत और जाने कितनी चलती अगर आलमगीर के हुकुम पर सरमद नामक वली की गर्दन क़लम ना की होती। 

सरमद काशानी एक सूफ़ी मजज़ूब थे जो याद ए इलाही में इतने गुम हो गए थे की उनको दुनियावी हर चीज़ एक बोझ लगती थी।  यहाँ तक की उनको अपने बदन पर कपड़े भी भारी लगते थे सो आप रब की जुस्तजू या तलाश में बरहना घूमते थे।  आप आधा कलमा पढ़ते थे।  ला इलाहा मतलब नहीं है कोई माबूत।जब औरगज़ेब के दरबार में सरमद के क़िस्से बयान होना शुरू हुए और मुफ़्तियों के फतवे आये की इनको क़तल कर दिया जाए।   हुकूमत से ग़द्दारी, खुदा और उसके क़ानून की खिलाफ वर्ज़ी और बोहोत से इलज़ाम लगा कर हुकूमत ए मुग़लियाँ के हाकिम औरग़ज़ेब ने उनका सर तन से जुदा करने का हुकुम नाफ़िज़ कर दिया की इसको क़तल कर दिया जाए। 

जब सरमद को जल्लाद ने क़तल किया तो उन्होंने अपने तन से जुदा सर को ज़मीन पर नहीं गिरने दिया और हाथों में ले लिया और जमा मस्जिद दिल्ली की सीढ़ियां चढ़ने लगे।  १, २, ३ अल गर्ज़ ७ सीढ़ियां चढ़े तो, उनके पीर ने आवाज़ दी।  सरमद कहाँ जा रहे हो उन्होंने कहा जा रहा हूँ अपना सर ले कर हुज़ूर की बारगाहे रिसालत में और मुग़लिया सल्तनत को बद्दुआ दी।  उनके पीर ने बोला रूक जाओ आप वहीँ पर गिर पड़े। 

जब सरमद की शहादत की दास्तान अवाम ने देखी वोह बात जंगल की आग की तरह पूरे दिल्ली में फ़ैल कर हिंदुस्तान में फ़ैल गई।  बात बादशाह के हरम में भी पहुंची।  यह बात सून कर बादशाह के होश फ़ाख़्ता हो गए, और उनको लगा की उनसे ग़फ़लत में कुछ तो ग़लती हो गई।  लेकिन अब जो होना था हो चूका था अब तो बर्बादी की बारी थी।   और हुआ वही औरग़ज़ेब के बाद महज़ एक मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर ही हाकिम रहे और वोह भी निहायत ही कमज़ोर।   

कांग्रेस के दौर ए हुकूमत में शहीद अफ़ज़ल गुरू को फांसी दे दी गई।   सिर्फ़ अक्सरियत अवाम की तस्कीन के लिए और एक मुनाफ़िक़ फ़रेबी देढ़ आँख वाले ज़ाफ़रानी साधू के दबाव में आ कर एक बेगुनाह को फ़ाँसी के तख़्ते पर चढ़ा दिया गया था।  वोह भी बेगुनाह थे उनकी शहादत का ज़र्रा भर कफ़्फ़ारा कांग्रेस और हिंदुस्तान की अवाम भोग चुकी है। बड़ा होना बाक़ी है।  शहीद अफ़ज़ल की फ़ाँसी के बाद जो कांग्रेस उसका सियासी नफ़ा लेना चाहा रही थी वोह महज़ ४५ पर सिमट गई और उत्तराखंड में आया ज़बरदस्त तूफ़ान जिसमे कमो बेश  एक लाख के क़रीब लोग मारे गए और मज़ीद १० से १२ लाख बेघर हो गए।  

तारीख़ से किसी भी सियासी जमात ने सीख नहीं ली जो ग़लती कांग्रेस ने की वही ज़ाफ़रानी महाज़ ने की और शहीद याक़ूब मेमन को फांसी दे दी।  जबकी बाबरी मस्जिद को शहीद करने वाले तमाम हिंदुस्तान में मुसलमानों का क़त्ले आम करने वाले दंगा फ़साद करने वाले खुली हवा में घूम रहें हैं। 

नाज़रीन इस बात को कई दफ़ा दोहरा चूका हूँ और हदीस क़ुदसी बयान कर चूका हूँ अल्लाह के वलिओं से जिस बन्दे ने बग़ावत की उनको दुःख पहुंचाया तो उससे अल्लाह का खुला एलान ए जंग है।  अब है कोई इतना बड़ा सूरमा और हाकिम जो अल्लाह से जंग की ललकार को क़ुबूल करे और अल्लाह से जंग जीत जाए।   

जिस तरह सरमद की शहादत के बाद मुग़लिया सल्तनत तबाह हो गई उसी तरह शहीद अफ़ज़ल और याक़ूब की शहादत के बाद हिंदुस्तान का मुस्तक़बिल भी अल्लाह वैसा ही लिखेगा जैसा ज़ुल्म और ज़्याती इन दोनों तंज़ीमों ने अल्लाह के वलिओं के ख़िलाफ़ की थी। 

अल्लाह का बदला बोहोत सख़्त है।  कोई नहीं बचेगा जिस जिस ने कुफ़्र और वतन की झूठी मोहब्बत में आ कर अल्लाह वालों का दिल दुखाया  सब तबाह हो जायेगें, मारे जायेगें, नेस्त नाबूत हो जायेगें।  वतन से मोहब्बत का कोई फ़लसफ़ा कोई हदीस इस सहाफ़ी के नज़रों से नहीं गुज़री।  दारुल हर्ब है तो कहीं से कहीं तक वतन से मोहब्बत की कोई भी गुंजाइश नहीं है।  हाँ अलबत्ता दारुल अमन के लिए कोई राह निकल सकती है।     


सहाफ़ी ज़ुबेर

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