Monday, 13 December 2021

तुमने ज़ाफ़रानी क्या पहना की ख़तरे में हिन्दू मज़हब आ गया।

अज़ीज़ नाज़रीन,

फलां बिन फलां बड़ा चौधरी बना फिरता था और उसने ज़ाफ़रानी इख़्तेयार किया था इस ग़फलत में की उसके पीछे मुसलमानों की फौज की फौज हिन्दू मज़हब इख़्तेयार कर लेगी, जैसा की ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ की करामात देख कर कमो बैश २ लाख हिन्दू बा एक वक़्त इस्लाम में दाखिल हो गए थे। और उसके बाद भी होते ही चले गए रुके नहीं और यह तारीख़ है इसको कोई झुटला नहीं सकता। जब ख़्वाजा साहब हिन्द में तशरीफ़ लाये तब उन्होंने सबसे ज़्यादा मुत्तसिब और फ़िर्क़ा वाराना हिन्दू शिद्दत पसंद जगह राजिस्थान के अजमेर का इंतेखाब किया।  फलां बिन फलां हिन्दू बना उसके पीछे एक भी नहीं गया और ख़्वाजा साहब के पीछे तमाम पृथ्वीराज चौहान की रियाया इस्लाम में दाखिल हो गयी थी।  क्योंकि फलां बिन फलां के पास अल्लाह की ताक़त नहीं थी और ख़्वाजा साहब को अल्लाह ने क़ुव्वत और ताक़त बख़्शी थी उनको इसी काम के लिए मुतय्यन किया था की तुम हिन्द में जा कर इस्लाम का परचम लेहराओ। 


नाज़रीन एक बात समझने से यह सहाफी क़ासिर है की एक फलां बिन फलां के इस्लाम से जाने पर छी न्यूज़ ने धमाल मचा कर रख दिया था, महसूस ऐसा होता था जैसे की पूरा भारत मुसलमानों से फ्री हो कर ज़ाफ़रानी रंग का हो गया हो।   फिर अगर तमाम मुसलमान मर्द और ख़ातून इस्लाम से आजिज़ आ चुके हैं बक़ौल छी न्यूज़ के तो ११ दिसम्बर २०२१ बरोज़ हफ्ता (सनीचर) एक सहाफी इजलास में तोगड़िया काहे को मरकज़ की हुकूमत से गुज़ारिश करता है की आबादी इख़्तेयार बिल एवान में लाया जाए।  मज़ीद वोह बोलता है की हिन्दुस्तान में ८४ फीसद हिन्दू थे जो घट कर ७० और फिर ५५ फीसद रह गए अगले २० सालों में हिन्दू ३० फीसद और मुस्लिम ५५ फीसद हो जायेगें।


छी न्यूज़ जैसे ज़ाफ़रानी ग़द्दार इस्लाम और मुसलमानों के दुश्मन एक आधा इस्लाम दुशमन मुनाफ़िक़ को अपने स्टुडिओं में बिठा कर मुबाइसा करते हैं और समझतें हैं की तमाम मर्द और दुख्तराने मिल्लत इस्लाम की तालीम से घुटन महसूस करतें हैं।  ख़ातून बुर्का पहनने में शर्म महसूस करती हैं और उनको जबरन पहनाया जाता है।  जबकि ऐसा नहीं है।  इस सहाफी ने तक़रीबन जितनी भी बुर्का पोश ख़ातून थी उनसे अपनी पहचान पोशीदा रखते हुए एक मुबाहिसा किया की आप बुर्का अपनी मर्ज़ी से पहनती हो या आपको आपके शोहर, ससुराल या वाल्देन के दबाओ में पहनना पड़ता है।  तक़रीन ९८ फीसद बच्चिओं और मस्तूरातों का जवाब था हम अपनी मर्ज़ी से पहनते हैं और हम इस लिबास में  अपने आपको ज़्यादा मेहफ़ूज़ महसूस करतें हैं। हमारे इस लिबास की वजह से ग़ैर मेहरम, स्कूल कॉलेज में ख़ास मज़हब के शोहदों गुंडों और मवालिओं की गन्दी नज़रों से हम मेहफ़ूज़ रहतें हैं।  जो सिर्फ मुस्लिम बच्चिओं के पीछे ही रहतें हैं. यहाँ तक की कई शादी शुदा खातूनों ने कहा की हमने बुर्का शादी की ११-१२ साल बाद इख़्तेयार किया है पहले पहले हम पूरी तरह मग़रिबी तहज़ीब का हिस्सा थी या बुर्का कभी नहीं पहना था।  लेकिन यकायक दिल में एक कैफियत हुई आखों से अश्क जारी हुए और बुर्का पहन कर पूरी तरह से इस्लाम में दाखिल हो गए। और वही हाल मर्दों का हुआ जिन्होंने दाढ़ी रख ली और इस्लामिक हिसाब से ज़िन्दगी बसर करना शुरू की उनकी भी वही कैफियत थी जो मुस्लिम ख़ातूनों ने बयान की।  बॉलिवुड में कई अदाकाराओं ने अल्लाह की रज़ा के लिए अपनी मर्ज़ी से सब कुछ छोड़ दिया।  जिस के ऊपर संघी और शिद्दतपसंदों को बोहोत अंगार लगी. ज़ायरा वसीम, सना खान.


फिर अगर मुसलमान इस्लाम से बर्गश्ता हो कर हिन्दू मज़हब में जा रहें हैं तो कल बरोज़ इतवार तारीख़ १२ दिसम्बर २०२१ काहे को एक सहाफी इजलास में कर्णाटक का वज़ीरे आला तब्दीली मज़हब के खिलाफ क़ानून बनाने की बात करता है।  उसका भी यही कहना था कर्नाटक में हिन्दू तेज़ी से घट रहें हैं और इस्लाम, क्रिस्टी मज़हब के अवाम बढ़ते जा रहें हैं।  

तुम्हारी नामर्दानगी पर हसी आती है। सिर्फ एक मुनाफ़िक़ के इस्लाम से हिन्दू मज़हब में जाने पर आसमान तक कूद रहे थे।  और कुछ  ज़मीर फ़रोश लोगों को स्टुडिओं में बिठा कर मुबाहिसा कर रहे थे जिनका किरदार ही मशकूक है।  जो ना तो अपने वतन पाकिस्तान के वफादार हो सके और ना ही इस्लाम के और ना ही हिन्दुइज़्म के वफादार साबित होंगे।  ऐसे ही गद्दारों के लिए कहा गया है "धोबी का गधा ना घर का और ना घाट का।"  जिनके साथ छी न्यूज़ ने मुबाहिसा किया और उस मुनाफ़िक़ के हिसाब से उसको इस्लाम में घुटन महसूस होती है, अब जो पहले ही हिन्दू था या थे सिर्फ नाम मुसलमान रख रखा था तो उनको घुटन ही मह्सूस होगी।  क्योंकि अल्लाह ने उनको ना तो ऐसी बसारत दी है की आगे की चीज़ें देख सके और ना ही ऐसी सलाहियत की उनको रूहानी अलफ़ाज़ से सुकून मिल सके।  यह सब शैतान हैं और शैतान को अल्लाह के ज़िक्र से घुटन महसूस होती है जहाँ अल्लाह का ज़िक्र होता है उसको कोफ़्त होती है।फिर अगर ऐसे दोग़ले, मुनाफ़िक़ वापिस से हिन्दू मज़हब में चले भी जातें हैं तो कोई ग़म नहीं।


एक बात ते है कितना ही छी न्यूज़ जैसे ग़द्दार और संघ जैसी तंज़ीमें आसमान तक उछल जाएँ या हिन्दुओं को अपने मज़हब में रखने के लिए कुछ भी क़ानून बना लें, जो हिन्दू इस्लाम में आने वाले हैं वोह तो आ कर रहेगें। और यही इन्साफ का तक़ाज़ा है। तुम्हारी नाइंसाफी का जवाब। इस्लाम एक इंक़लाब है। जो लोग इस्लाम के ख़िलाफ़ ग़लतफहमी फैलाते हैं ऊल जलूल बकतें हैं, हम तो कभी ऐसे क़ानून की पैरवी नहीं करते, की इस्लाम से जाने वालों पर पाबन्दी लगाई जाए।  तुम लोगों ने लव जिहाद के ऊपर क़ानून बनाया।  अपने मज़हबी इजलास (धर्म संसद) में क़ानून बनाया की मुस्लिम बच्चिओं से शादी करो और शादी का सबूत दिखाओ ३ साल का राशन रहना और रुपए ५००० महाना पाओ, हमने तो ऐसे तुम्हारी सभाओ के क़रारदार पर भी कुछ एतेराज़ नहीं उठाया। क्योंकि हमें हमारे रब पर पूरा भरोसा है और हम यह भी जानतें है जिसको अल्लाह हिदायत देगा उसको दुनियां की कोई ताक़त गुमराह नहीं कर सकती और जिसको नहीं मिलेगी हिदायत वही गुमराह होगा। हमारा यक़ीन इतना पुख्ता है। अरे तुम क्या इस्लाम को इज़ा पहुँचाओगे। खुद घबरा रहे हो। यह घबराहट नहीं तो और क्या है, की कभी इधर की कभी उधर की बातों को ले कर क़ानून बनवा रहे हो।  मुस्लिम मौलानाओं को झूठे और फरेबी इलज़ाम लगा कर गिरफ्तार कर रहे हो। 

छी मीडिया तो महज़ एक मुस्लिम का इस्लामिक चौला उतार फेकने पर बोहोत खुशी से झूम रहा था, जो की दरअसल हिन्दू ही था।  जिसकी असलियत खुल कर अवाम के रू बरू आ गई।  फिर अगर मुस्लिम अवाम सैलाब के जैसे हिन्दू मज़हब की जानिब जा रहें हैं जैसा की तोगड़िया, नरसिंहानंद, चक्रपाणि बोल रहा है की मुस्लिम इस्लाम छोड़ कर हिन्दू मज़हब में आ रहें हैं तो फिर यह घबराहट क्यों।  ख़ौफ़ और घबराहट इतनी की हुकूमत के नुमाइंदे परेशान हैं और क़ानून बनाने की बातें करने लगे।  हम मुसलमान तो एक दम बिंदास हैं, बेख़ौफ़ हैं और मुत्मइन हैं। क्योंकि हमको हमारे रब पर और इस्लाम की तालीम पर पूरा यक़ीन हैं जो होना है हो कर रहेगा।

Zuber

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