Sunday, 12 December 2021

"ग़द्दार" मायने मुख़्तलिफ़, तुम्हारा ग़द्दार हमारी मोहब्बात।


अज़ीज़ नाज़रीन, मज़मून का पूरा मुताला करें तब बात समझ आएगी। 

आज का मज़मून अलग ही कैफियत में शाया कर रहा हूँ।   नाज़रीन आज आप तमाम हज़रात को ग़द्दार की सिफ़त और मायने बयान करूंगा।  आज के दौरे हाजरा में हर मुसलमान या उस शख़्स को जो हक़ गोई की बात करे अवाम के अंदर बग़ैर किसी मज़हबी तास्सुब के इन्साफ करे जो ज़ाफ़रानी मुतस्सिब हुकुम की ख़िलाफ़वर्ज़ी करे और इन्साफ के परचम के नीचे खड़ा रहे उसको हिन्दुस्तान में ग़द्दार तसव्वुर किया जाता है।  ग़द्दार की भी दो सिफ़त होतीं हैं।  एक वोह जिसको की हाकिम ग़द्दार समझे और दूसरा वोह जिसको हाकिमों का हाकिम यानी बारी इलाहा ग़द्दार समझे।   

चलिए अब मज़मून के हिज्जे करते हैं जराहत या ऑपरेशन।  हाकिम का ग़द्दार तस्सव्वुर करने का एक सीधा सा पैमाना है, हिंदुस्तान में जिसने वक़्त के फ़िरोन या हिटलर के हुकुम की ख़िलाफ़वर्ज़ी की और हक़ की बात कही वही ग़द्दार तस्सव्वुर कर लिया जाता है।  अब उसको किम जोग की हुकूमत हरासा करना शुरू करती है।   जेल में डालने से ले कर बोगस और झूठे इलज़ाम लगना, उसकी इज़्ज़त को पामाल करना यहाँ तक की उसको ना वाक़िफ़ हाथों से क़त्ल करवाने की हिकमत की जाती है।   ज़ाफ़रानी ट्रोल उसके पीछे लग जातें हैं।  

नाज़रीन अमूमन भारत में एक आम तस्सव्वुर ग़द्दार का जो है वोह ग़लत है।  भारत में मोदी हुकूमत के ख़िलाफ़ किसी ने हक़ गोई की बात कर दी, हुकूमत को उसकी ग़लती का एहसास करवा दिया भारतीय फौज की दहशत, बंदूक, मिसाइल, बोम, तलवार से ख़ास मज़हब के बेगुनाह अवाम को ख़ास सूबे में क़त्ले आम के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाला ग़द्दार तस्सव्वुर किया जाता है।  जबकी ऐसा नहीं है।  वोह शख्स ग़द्दार कब होता है जब वोह अपनी शिनाख़्त पोशीदा कर के यह तमाम काम करता है।  या सब कुछ जानते हुए हुकूमत की चाटुकारिता चापलूसी करता है और वतन की आज़ादी को फरामोश कर के २०१४ बोल रहा है तो वोह असली ग़द्दार है. एक हिन्दू अपनी शिनाख़्स्त पोशीदा कर के मुस्लिम नाम से कश्मीर और हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ कुछ बोल रहा है तो वोह असल ग़द्दार है।  जबकी अगर उन तमाम ज्यात्तियो के ख़िलाफ़ कोई मुसलमान या हिन्दू अपनी शिनाख़्त ज़ाहिर कर असल नाम से बोलता है तो वोह ग़द्दार नहीं बल्कि अपने हक़ के लिए लड़ रहा है।   

अब चलिए मज़हबी ग़द्दार के बारे में जान लेते हैं।   मज़हबी ग़द्दार का तस्सव्वुर भी कमो बेश वतन के ग़द्दार जैसा ही है।  अगर कोई भी मज़हब का मानने वाला अपने ही मज़हब को झूठा और फरेबी नाम रख कर कोसता है तो वोह मज़हबी ग़द्दार है।   जैसे तारिक़ फ़तेह, वसीम रिज़वी, अली अकबर जैसे वोह ग़द्दार है जो दरअसल हैं तो काफिर लेकिन इन लोगों ने अपने नाम मुसलमानों जैसे रख रखें हैं।   ताके जब वोह मज़हबे इस्लाम के ऊपर नुक़्ता चीनी करें तो आम इंसान के ऊपर उस मज़हब का तस्सव्वुर और अक्स ग़लत जाएगा।   

दरअसल यह तमाम ज़ाफ़रानी शिद्दत पसंद, संघ और उसकी सियासी रहनुमा बीजेपी से मुनसलिक लोग होतें हैं।  इन जैसे काफिरों और मुनाफ़िक़ों के बारे में ही अल्लामा इक़बाल ने शेर कहा है


"अगर बूत हैं जमात की आस्तीनों में मुझे है हुक्मे अज़ाँ ला इलाहा इलल्लाह।“


क्योंकी १४०० साल पहले काफिर मुस्लिम लिबास पहन कर इस्लामिक नाम रख कर मस्जिद में नमाज़ की जामात में घूस जाते थे और सजदे में जाते ही आस्तीनों से बूत निकाल कर हरामकारी करते थे।   यह देखो भगवान प्रकट हुए वग़ैरा।  लेकिन जब अज़ाँ दी जाती तो तमाम बूत गिर जाते थे।  तो यह आज के दौर से नहीं है सदिओं से चला आ रहा है।   तमाम ऐसे काफिर जो मुस्लिम नाम रख कर इस्लाम को बदनाम करते थे और मुसलमानों को गुमराह करते थे वोह सब एक के बाद एक बेनाकाब हो रहें हैं की दरसअल यह बन्दा काफिर था और इस्लाम का मुनाफ़िक़।

इससे पेश्तर २०१८ में दो तीन मज़मून सय्यद नाम की हुरमत और इज़्ज़त पामाल करने वालों के लिए लिखे हैं।  यह तमाम संघी फितरत और शिद्दत पसंद काफिर हर उस मुसलमान के नाम के आगे सय्यद लगा देते थे जो की ज़िनाकारी, चोरी, फरेब, झूट और तमाम दंड फंद में मुलव्विस रहता है।   फिर उसके गुनाहों की फेहरिस्त मीडिया के लंगूर आम कर के सय्यद ज़ादों या जादिओं के नाम पर शक और शुकूक के बीज गहरे करते हैं।  जिससे एक आम मुसलमान का तस्सवुर सय्यद के लिए ख़राब होता है। 

ऐसे ही १९९२-९३ तक शराबख़ाने में ओमूमन ज़्यादातर शराबी टोपी और दाढ़ी में देखे जाते थे।जब उनका हसब और नसब निकाला जाता तो उनमे से सो फीसद तो हिन्दू ही निकलते थे इल्ला माशाल्लाह अगर कोई मुस्लिम मिल गया तो बात अलहदा है।  फिर उन हिन्दुओं में से ८० फीसद संघी और बीजेपी के कारकून होते थे।  उनका पर्स, बेग या दीगर तहक़ीक़ात में उनके पास से बीजेपी या संघ से जुड़े होने के आशियात मिलते थे। 


नाज़रीन १९९३ के बाद जितने भी मुस्लिम बेगुनाह गिरफ्तार किये पुलिस बड़े बड़े अलफ़ाज़ में मीडिया में बयान देती थी की गिरफ्तार किये गए आतंकी के पास से जिहाद, पाकिस्तान से जुडी हुई सामग्री और उर्दू की किताबें मिली हैं।   जिसको मीडिया के लंगूर और लँगूरनियाँ बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ बना कर चलते थे और एक मज़हब ख़ास की मोब लीचिंग करते थे। अब में मिडिया के लंगूरों और पुलिस से पूछता हूँ क्या पाकिस्तान से जुडी हुई जानकारी रखना या उर्दू फलसफे, मिंतक़, हुज्जत की किताबें रखना या जिहाद के ऊपर मज़ीद इल्म लेना और असली जिहाद किया है उसकी जानकारी के लिए किताब का मुताला करना कहाँ से कहाँ तक जुर्म हैं और क़ानून की किस किताब किस दफा में इल्म लेने को जुर्म क़रार दिया है।


फिर वही फलसफा इन वतन और मज़हब के ग़द्दारों के ख़िलाफ़ क्यों इस्तेमाल नहीं होता है।  जो होतें हिन्दू हैं और मुस्लिम नाम से भारत को कोसते हैं और नबी, इस्लाम, किताब पर तनक़ीद करतें हैं।  अगर इनको गिरफ्तार किया जाता है और इनके पास से बीजेपी, संघ या किसी और हिन्दू शिद्दत पसंद तंज़ीम से मुनसलिक होने के दस्तावेज़ मिलते हैं तो पुलिस काहे को मीडिया के रू बरू इस बात को नहीं रखती के फलां बिन फलां मुस्लिम नाम से बदगुमानी फैला रहा था दरअसल वोह हिन्दू शिद्दत पसंद था और उसके पास से संघ, बीजेपी, वीएचपी, बजरंगदल से जुड़े होने के और बोहोत से मशकूक दस्तावेज़ मिले हैं।  


भारतीय लंगूर-लँगूरनियों इन्तेज़ामियाँ (कमिशनर, कलेक्टर, पुलिस) असली ग़द्दारों को पहचानों यह तुम्हारे ही अंदर मिलेगें, हम ग़द्दार नहीं हैं हम हमारे हक़ की लड़ाई लड़ रहें हैं।  फिर अगर कोई हमारे नबी, क़ुरान की शान में बदकलामी करेगा इस्लाम के ख़िलाफ़ बदगुमानी झूट फरेब फैलाएगा तो हम हमारे असली नाम से तुम्हारे देश, फौज, हुकूमत को कोसेंगे।  

Zuber   

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