अज़ीज़
नाज़रीन
उमूमन
इस सहाफी की ऑटोनोमस जर्नलिस्ट की टीम किसी भी मुद्दे पर बेहद सही और दुरुस्त रिपोर्ट
इंतेज़ामिया को या तो कोई भी हादसा दंगा या दहशतगर्द हमला होने से पहले ही दे देती है
या फिर हादसा होने के बाद जिस तरह से ज़ाफ़रानी मीडिया के लंगूर और लँगूरनिया हिन्दू
मुस्लिम कर के मसले को गफलत का कफ़न पहना कर इंतेज़ामिया ख़ास मोदी और बीजेपी को बचाने
का काम करतें हैं उसमे फैसला कुन रिपोर्टिंग करती है और इस सहाफी की रिपोर्ट्स अभी
तक तो कमो बेश हर मसले पर ९९% सही और दुरुस्त पाई गई है.
चाहे
वोह मुसलमानों की तालीम पर ज़ाफ़रानी हुकूमत का डाका हो या मुस्लिम तालिबे इल्मो को इल्म
की रौशनी से दूर रखने का मामला हो या हूकूमते हिन्द के ज़ेरे सरपरस्ती मुस्लिम नस्ल
कुशी करने का मामला हो हर रिपोर्ट तक़रीबन सही और दुरुस्त साबित हो रही है. और जिस हिसाब से दिल्ली पुलिस ने जामिया और उत्तर
प्रदेश पुलिस ने अलीगार्ड मुस्लिम यूनिवर्सिटीज को निशाना बना कर वहां पर तालीम ले
रहे मुस्लिम तुलबाओं के मुस्तक़बिल से खिलवाड़ किया है, जिसका ज़िक्र जुलाई २०१९, अगस्त
२०१९ में दो तीन मज़मून मुस्लिम अवाम की तालीम से ताल्लुक़ शाया किये हैं. और दिसम्बर २०१९ में जामिलया मिलिया इस्लामिया और
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटीज के नाम के साथ दर्ज किये हैं.
मुस्लिम
अवाम पर दिल्ली हिन्दू दहशतग़र्द हमला भी पूरी तरह साजिशन करवाया गया था. और उसमे संघ के हिन्दू दहशतग़र्द और बड़ी तादात में
हिन्दू साधू संत और साध्वियां शामिल थी. यह
रिपोर्टिंग इस सहाफी ने अपने एक ख़बर नामे हिन्दू तांत्रिक काला जादूगर आशु महाराज से आसिफ खान तक की कहानी। में
१६ सितम्बर २०१८ को ही दिल्ली में दंगा कर
के तबाह करने की संघी साजिश ज़ाहिर की थी. यह रिपोर्टिंग तब की है जब हिन्दू साधू संत और साध्वियां
खूब अय्याशी और जिस्म फरोशी के दल दल में पकडे जा रहे थे. और एक के बाद एक साधू ना बालिग़ बच्चिओं के साथ ज़िना
बिल जब्र और गैर ज़रूरी, ग़ैर क़ानूनी ज़ाराये से जायदात हासिल करने के जुर्म में पकडे
जा रहे थे. इन साध्वियों को भोली भाली गरीब
घरों या दलित बच्चिओं को बहका बेहला फुसला कर अपने जाल में फ़साने के काम में लाया जाता
है.
दिल्ली
में सितम्बर २०१८ से लेकर उनको कोई वजह नहीं मिल रही थी जिसके ऊपर ज़िम्मेदारी लाद कर
यह लोग दंगा करें. उस वक़्त सरे दस्त दंगा नहीं
हुआ क्योंकि इस रिपोर्ट में संघ दंगे करवा सकता है यह बात ज़ाहिर हो चुकी थी. लेकिन दहशतग़र्द सही ताक और मौक़े की तलाश में थे
जो उनको नहीं मिल सका. बिल आखिर उनको दंगा
करवाना था सो उन्होंने बगैर किसी वजह के कोई भी बहाना बना कर २३ फरवरी २०२० को किया.
हाल
ही में हुए दिल्ली दंगे में एक हिन्दू जिस्म फरोश साध्वी वैशियया का नाम
सामने आया है. इस हर्राफ़ हिन्दू साध्वी का
एक विडिओ भी सोशल मीडिया पर खूब वाइरल हो चूका है. जिसमे वोह हर्राफ़ अपने जिस्म की दर्जे हरारत को
मज़ीद गर्मजोश करने के लिए अपने जाती आज़ा को कपडे उठा कर खूब मसलवा रही है.
नाज़रीन
ये तमाम मज़मून महज़ एक इत्तिफ़ाक़ और ज़ुबानी जमा खर्च नहीं होते हैं और ना ही इसको अवाम
के नज़र करने की हिकमत नाम शोरत और इज़्ज़त पैसा कामना होता है. बल्कि चीज़े सही और दुरुस्त रास्ते पर आ जाए और जो
पोशीदा तबाही आने वाली है वोह ना आये. यही
वजह है की हर मज़मून को लिखने के बाद उसको कमिशर पुलिस नई बंबई, महाराष्ट्र ऐ.टी.अस.
के आला ओहदेदार इस सहाफी के एरिया के पुलिस अफसर और नई बंबई पुलिस कण्ट्रोल रूम को
भी भेज देता था. उसके बाद पुलिस की मीडिया
टीम और दीगर सहाफियों को भी भेज दिया जाता था.
उसके पीछे की हिकमत यह ही होती थी की पुलिस अपने काम में मज़ीद ज़िम्मेदारी का
रव्वैया इख्तियार करे और हादसात ना होने पाए.
लेकिन
दिल्ली दंगो के बाद इस सहाफी की रिपोर्टिंग में जब यह बात मालूम पड़ी की असल मुजरिम तो
इस बार भी गुजरात की वोह ज़ाफ़रानी दहशत ही है जो २००२ में ट्रैन में आतिश बाज़ी करने
के बाद हिन्दू दहशतग़र्द हमलो में मुलव्विस थे. जिसको उसने अपने मज़मून फसाद का एहम गुनहगार इस बार भी गुजरात ही रहा. में बताया और हस्बे मामूल तमाम आला ओहदेदारों को भेजा. लेकिन फ़ौरन नई बम्बई कण्ट्रोल रूम से फोन आया उस वक़्त शाम के ६.३० बजे थे और अफसर ने नियायत
ही बदतमीज़ी से बात की और बोले की आप कौन हैं और काहे को हमें ये सब भेजते रहते हैं. आपका क्या मक़सद है आप किस तंज़ीम से ताल्लुक़ रखते
हो वगेरा वगेरा. क्या आप जानते हो आप भी परेशानी
में आ जाओगे, हमारी नज़र आप पर भी है. इतना
सुनना था की यह सहाफी कहाँ किसी की रखता है हिसाब फ़ौरन बराबर कर देता है. मेने कहा
हाँ क्या करोगे आप गिरफ्तार करोगे, करो गिरफ्तार, चलो, में तैयार हूँ. में एक जौर्नालिस्ट हूँ और जहाँ तक मेरे मज़मून भेजने
का सवाल है तो में आपको आगाह करता हूँ और इनफार्मेशन देता हूँ. उसमे वोह अफसर एहमकों और जाहिलों जैसा जवाब देता
है, हमारे पास तमाम इनफार्मेशन होती है हमें सब पता हैं कहाँ क्या होने वाला हैं. उसके ऊपर मज़ीद मेने कहा अगर आपके पास मुक्कम्मल
इनफार्मेशन थी फिर भी आपने एक्शन काहे को नहीं लिया. क्या फायदा ऐसी इनफार्मेशन का जो आपने अपने पास
ही रखी और उसके ऊपर आने वाली तबाही से अवाम को नहीं बचाया. मतलब ये साबित होता है की आप की भी मिली भगत है,
पुलिस की भी इन तमाम हमलो में मिली भगत है.
उसपे उस अफसर ने कहा आज से आप हमें इनफार्मेशन ना दिया करो.
नाज़रीन
कहने का मक़सद यही है जब खुराक खुद बा खुद ज़ालिम के पंजे तक पहुंच जाए या जब पुलिस और
आला ओहदेदारों को दंगे, क़तल, दहशतग़र्द हमले, जंग जैसी जानकारी और मालूमात है फिर भी
वोह उस को रोकने के कोई इक़दाम ना करें तो उसको इंतेज़ामिया की शदीद गफलत कहा जाएगा या इंतेज़ामिया की मिली भगत.
नाज़रीन
फिर इस सहाफी ने भी अज़्म किया अब कोई भी तहक़ीक़ात और जानकारी इंतेज़ामिया को फ़राहम नहीं
की जायेगी. जब मरने का इतना ही शौक़ है तो मरो
हमें क्या करना है.
दिल्ली हिन्दू दहशतग़र्द
हमलो में गुजरात, मारवाड़ी, बनिया और दीगर ताजिरों ने बड़ी तादात में हिन्दू दहशत के
लिए साज सामन मोहाय किया था.
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