Monday, 4 May 2020

इमदाद कहाँ गई मोदी जी, गरीब तो अभी भी पैदल है.


अज़ीज़ नाज़रीन
मुझे एक बात समझ में नहीं रही है वज़ीरे आज़म रक़म बराये इमदाद में मोदी केयर में और हूकूमते हिन्द के दीगर खातों में करोड़ों अरबों रुपए इस कुदरती वबा के के नाम पर जमा हुए.  वोह पैसा कहाँ गया.  अगर अभी तक वोह करोड़ों अरबों की अज़ीम इमदादी रक़म वज़ीरे आज़म के खाते की ज़ीनत ही बनी हुई है, फिर क्या वजह है की वोह पैसा मज़दूरों, गरीबों और अपने घरों से दूर फसे हुए अवाम के काम नहीं रहा हैइस वबा से निबटने के लिए हर अवाम ने हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई खुल के ताऊन कियाफिर वोह पैसा किधर गयाहोना तो ये चाहिए था की खुद मोदी को आगे कर इन सभी गरीबों, मज़दूरों की एक फेहरिस्त तैयार कर के इनके लिए फर्स्ट क्लास .सीबस या ट्रैन का बंदोबस्त करना थाक्योंकि लोक डाऊन का हूकूम मरकज़ का था तो तमाम मज़दूरों की फेहरिस्त तैयार करने का काम भी किसी मरकज़ी नुमाईंदे का होना चाहिए. और हो यह रहा है की मज़दूरों से ट्रैन में जाने का पैसा वसूला जा रहा हैरही सही कसर मरकज़ स्टेट्स पर बोझ डालने की बात करता हैअगर सभी काम स्टेट्स और अवाम ही कर लेगा तो आप क्या करोगे.  क्या रात बजे वाले बुलेटिन में कर सिर्फ लॉक डाऊन का एलान करोगे या उसको जब मज़ीद बढ़ाना हो तो कर अपना चेहरा दिखा दोगेबाक़ी काम सिर्फ स्टेट्स और अवाम अपने आप कर लेंगेआप सिर्फ बढ़ाने और सख्ती से निबटने के पुलिस को हूकूम देने के काम के रह गए हो.  

जो तालिबे इल्म अपने घरों से कोसों दूर यूनिवर्सिटीज में आपकी जहालत की वजह से फस गए है उनको अपने घरों तक पहुंचाने का इंतज़ाम मरकज़ को करना चाहिए. 

अगर सभी काम अवाम और स्टेट्स अपने आप कर लेंगे तो आपकी फिर क्या ज़रुरत है.  सिर्फ ट्रैन चला देना काफी नहीं है और ना ही आपने इन गरीबों पर ट्रैन चला कर कोई एहसान किया वोह तो आपकी ज़िम्मेदार थी.  उसके ऊपर भी आप अपना सरकारी खज़ाना भर रहे हो.  दूसरी बात लॉक डवून करने का तानाशाही हुकूम आपने जारी किया था तो उसका कफ़्फ़ारा स्टेट्स काहे को अदा करेगी.  जब हूकूम मरकज़ का था तो उसके ऊपर होने वाले इख़राजात खर्च भी मरकज़ को ही उठाना चाहिए.  वाबाई क़ाइदे के हिसाब से मरकज़ को कही से कही तक यह क़ुव्वत फ़राहम नहीं है की वोह स्टेट्स की खुदमुख्तारी में दखल अंदाज़ी करे.  वाबाई हालात में स्टेट्स के पास पॉवर होता है की वोह चाहे तो अपने सूबे को बंद रखे या चालू.  लेकिन आपने तो फेडरल स्ट्रैक्क्टर की धज्जिया उड़ा दी और स्टेट्स की क़ुव्वत को भी अपने हाथों में ले लिया.  और तमाम हिन्द को एक साथ ताले में क़ैद कर दिया.  ऐसा तो सिर्फ इमर्जेन्सी या हगामी हालात में होता है.  या तो आप खुल के तस्लीम कीजिये की भारत में इमर्जेन्सी लग चुकी है या फिर स्टेट्स के पावर उनके वज़ीरे आला को लोटा दीजिये. 


फिर कोई भी काम करने के पीछे हुकूमतों का कुछ तो मक़सद होना चाहिए.  अपने मक़सद को अगर खुद मोदी जैसा अज़ीम और सख्त तरीन वज़ीरे आज़म हासिल नहीं कर सका है तो में समझता हूँ की अब उनको उस अज़ीम ओहदे पर बने रहने की हाजत नहीं होनी चाहिए.  २०१४ से तक़रीबन उन तमाम मसलों पर मोदी जी फेल हुए जिसको उन्होंने भारत की अज़मत से जोड़ा था.  ट्रिपल तलाक़, नोट बंदी, बाबरी मस्जिद, ३७०, एन.आर.सी. और अब लॉक डाऊन.  लॉक डाऊन का एलान २३ मार्च को किया गया था उस वक़्त मुश्किल से ५० मुत्तासेरीन होंगे.  और अब क्या हालात है ४५००० मुत्तासिर और तक़रीबन १४०० जहांबाक.  और इस गहमा गहमी में लोक डाऊन से फसे अपने घरो को रोड पर जाने वाले मज़दूर, गरीब और इस वबा से खौफ ज़दा हो कर खुदकशी करने वाले अफ़राद २८० के क़रीब है.  फिर भूक, और मुफलिसी से भी कई अफ़राद हलाक़ हो गए हैं. 

जब ऐसे चुब्ते हुए सवालात किये जातें हैं और करोना में भी मरकज़ की ग़फ़लत को बयान किया जाता है तो फरारी इख्तियार की जाती है.  कभी तब्लीगी कभी जमाती कभी थूक लगाया कभी नंगे हुए जैसे मसलों में अवाम को उलझा कर गुमराह किया जाता है.  इस मुद्दे पर ३० मार्च २०२० जब से तब्लीगी का मसला लंगूरों ने उछाला था और झूट फरेब फैलाया बोहोत से ट्वीट आज तक और नव भारत टाइम्स पर किये हैं.  करोना फैलाने की असल ज़िम्मेदारी मरकज़ की है क्योंकि तमाम बातें जानते हुए ट्रम्प को भारत बुलाया और उनको अहमदाबाद, आगरा और दिल्ली फिरवाते रहे.  और आज उन्ही तीन सूबों में सबसे ज़्यादा करोना मुत्तसरीन हैं.  इस मुद्दे पर ३० मार्च के बाद हर कुछ वक़्फ़े के बाद कई ट्वीट्स किये हैं.  

यह सहाफी तो सिप्ला, अज़ीम प्रेम जी और टाटा जैसे हर उस ताजिर, अवामी शख़्सियत या इमदादी को जाहिल तस्सव्वुर करता हूँ जिन्होंने मोदी की अवाम को बेवक़ूफ़ बनाने की हिकमत को हर बार आज़माया फिर भी इमदाद खुल के मोदी केयर और वज़ीरे आज़म रहत कोष में की.   और में हर उस इमदादी को जिन्होंने वज़ीरे आज़म के नाम इस वबा में इमदाद की है, मोदी के हर शर, ज़ुल्म, झूट, दहशत में बराबरी का हिस्सेदार और ज़िम्मेदार मानता हूँ.  जिन्होंने वज़ीरे अज़ाम को यह जानते हुए इमदाद की के उनका इमदाद किया हुआ पैसा खरीद फरोख्त और तमाम जालसाज़ी में लगेगा और गरीबों के काम ना आएगा.  क्योंकि जब इन जैसे लोगों को एक बार नहीं हर बार इस बात का एहसास हो गया था की मोदी को दिया हुआ पैसा अवाम के फलाही कामों में  इस्तेमाल नहीं होता है बल्कि दूसरी इक़्तेदार वाली सरकार को गिरा कर विधायकों की ख़रीद फ़रोख़्त में इस्तेमाल होता है, फिर भी इन्होने करोना वबा में मोदी के नाम पर मदद करने में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया.  और नतीजा आपके सामने है.  मज़दूरों तक तो कुछ पंहुचा नहीं वही बेचारे पैदल जा रहे हैं या ट्रैन का किराया दे कर भी पुलिस वालों की लाठिया खा रहें हैं.  बरक्स जो चोर डाकू अवाम के पेसो का गबन कर के बैंको को चूना लगा कर फरार हो गए थे उन सभी भगोड़ों के बैंक क़र्ज़ माफ़ कर दिए.  अपनों को जैन, संघ और दीगर दहशतगर्दों को करोड़ों रपये की राहत दे दी, और उनका क़र्ज़ माफ़ कर दिया.  अब इस गहमा गहमी में भगवा रंग का ताजिर कैसे अलहदा रह सकता था वोह भी इस जालसाज़ी और बहती गंगा में हाथ धो कर इस जालसाज़ी का हिस्सा बन गया और अपना भी करोड़ों का क़र्ज़ माफ़ करवा लिया.  इन ताजरों की पहले की दी हुए इमदाद और चैरिटी कर्णाटक और एम.पी. की हुकूमतों को गिराने में इस्तेमाल हो गया.  अब हमला महाराष्ट के ऊपर है. 

क्योंकि महाराष्ट्र के वज़ीरे आला हक़ और इन्साफ से काम कर रहें हैं तो अब वोह इन जैसे झूठे और फरेबी लोगों के आँख में अटकता हुआ पत्थर साबित हो रहे हैं.  लेकिन वज़ीरे आला को भी सच्चाई का दामन नहीं छोड़ना चाहिए जो सच है हक़ है उसी की पैरवी करना चाहिए.  हो सकता है उनको तकलीफ का सामना करना पड़े.  क्योंकि झूटों के साथ ज़माना होता है, झूट बोलने वाले झूठे सबूतों की लाइन लगा देतें हैं.  लेकिन सच की पैरवी करने वाले के पास ना ही अवाम होता है और ना ही ऐसे फरेबी सबूत.  बस अगर कुछ चीज़ होती है तो वोह सच और हक़.  लेकिन बावजूद तमाम झूट फरेब जालसाज़ी के भी, बिल आखिर सच की ही जीत होती है.

सच छुपाया जा सकता है लेकिन ना ही डराया जा सकता है और ना ही ख़त्म किया जा सकता है.  लेकिन बात वही है सच के रास्तें में हर मुश्किल का सामना कर के जो इन्साफ की आखिर कील को पातळ से खोज के निकालता है वही असली बाज़ीगर होता है.   और ऐसे फरिश्तों के साथ रूहानी मदद शामिल होती है.  चाहे वो किसी भी क़ौम या मज़हब का मानने वाला हो. 

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