अज़ीज़ नाज़रीन
गुजिश्ता हफ्ते भारत के ज़ाफ़रानी ज़ालिमों की क़ियादत में एवान में दरअंदाज़ी की वारदात हुई। इस पूरी वारदात पर ना सिर्फ़ सनकी तानाशाह मोदी बल्कि ख़ूंखार जानवर लंगूर और लँगूरनियाँ भी मुख़ालिफ़ों के पीछे ग़ुस्ल कर के पड़ गए। जहाँ एक जानिब मोदी इन्तेज़ामियाँ ने मुख़ालिफ़ों के कुछ १४१ रकून ए पार्लियमान मुअत्तिल कर दिए वहीँ लंगूरों की जमात बजाये ज़ाफ़रानी तानाशाही के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने के मुख़ालिफ़ों को ही कटघरे में खड़ा करने लगे। और सवाल जवाब भी मुख़ालिफ़ों से ही पूछे जाने लगे।
नाज़रीन
इस पूरे मुद्दे को यह सहाफ़ी ईवीएम की कारगरदेगी से जोड़ कर देखता है। जो लुगाई को देख कर फ़रार केप्सूल पूनावाला ई.वी.एम. की सदाक़त पर हलफ दे रहा था की ई.वी.एम. पूरी तरह से मेहफ़ूज़ है। अब में ज़ाफ़रानी तंज़ीम के दहशतगर्दों और ख़ूंखार जानवर
लंगूर लँगूरनियों से पूछता हूँ की एवान से ज़्यादा मेहफ़ूज़ कोई और जगह हो सकती है क्या?? फिर
उसमे भी तो दरअंदाज़ी हुई। और दरअंदाज़ एवान
की प्रोसीडिंग में ख़लल डालने में कामयाब हो गए।
इतना ही नहीं अपनी मर्ज़ी से बेंचेस कूदते हुए स्पीकर सामने पहुंच गए।
जब
एवान में दरअंदाज़ी की जा सकती है तो ई.वी.एम. में कियों नहीं की जा सकती वोह तो एक मशीन
है जो कंप्यूटर से ऑपरेट होती है। जबकि एवान
में तहफ़्फ़ुज़ज़ घेरा इंसानों का होता है उनके पास जदीद टेक्नोलॉजी होती है असलहा होता
है फ़िर भी तमाम ज़हानत धरी की धरी रह गयी और खेला हो गया।
दूसरी
एक और बोहोत अहम बात जिन लोगों ने दरअंदाज़ी की वोह ज़ाफ़रानी तंज़ीम के रकून ए पार्लियमान
के कार्ड पर अंदर पहुंचे थे तो ई.वी.एम. भी उन्ही हल्क़ों में हैक की जाती है जहाँ से ज़ाफ़रानी
तंज़ीम के नुमाइंदे खड़े होतें हैं।
नाज़रीन
आज की तारीख़ में इन ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों ने इंडिया की इज़्ज़त को कौड़ी का कर दिया है। यहाँ तक की अदलिया की इज़्ज़त और विक़ार (डेकोरम) की
धज्जियाँ उड़ा कर रख दी हैं। २०१४ से जिस तरह
के फ़ैसले अदालत ए उज़मा से आएं हैं ख़ास मुस्लिम अवाम की निस्बत से वोह तमाम फ़ैसले नाइन्साफ़ी
पर मब्नी हैं। मुसलमानों के समाजी, मज़हबी और
सियासी किसी भी मुद्दे पर इंसाफ़ नहीं हुआ है।
जिसकी वजह से भारत में इंसाफ़ की उम्मीद लगाए बैठे मुसलमान इंसाफ़ के लिए अब दुसरे
जाविये से सोच रहें हैं।
में तमाम ज़ाफ़रानी लुगाई को देख कर फ़रार दहशतगर्दों से केप्सूल पूनावाला को मिला कर यह कहना चाहता हूँ अदालत को काहे को बदनाम कर रहे हो उसके विक़ार और इज़्ज़त की नीलामी मत करो। वैसे भी फैसला अदालत का हिन्दू अक्सरियत और अक़ीदे पर ही आएगा तो यह अदालत में जाने की नौटंकी और अदालत का वक़्त बर्बाद करने की क्या ज़रुरत है।
अगर
ग़ैर क़ानूनी तरह से मुग़लों ने मंदिरों को तोड़ कर मस्जिद बनाई थी तो जैसे भारत में २०१४
के बाद से हूकूमशाही आ चुकी है और तुम जब मुसलमानों के ज़ाती मकान दूकान बंगले कोठीयां
बेदर्दी से तोड़ डालते हो तो तुमको किस चीज़ ने रोके हुआ है चलाओ बिलडोज़र मस्जिदों पर
और तोड़ डालो। अगर कोई मुसलमान बीच में आता
है तो मारो गोली भगाओ सब मुसलमानों को।
जब
ज्ञान वापी का मसला काफ़िरों ने पैदा किया था तब अबू आसीम जी ने यही अलफ़ाज़ बोले थे जिसकी
में आज तस्दीक़ करता हूँ।
तीसरी
बात साबित होती है की ज़ाफ़रानी कमज़ोर क़ुव्वत वाले और हिजड़ा फ़ितरत होतें हैं। तभी तो जब इक़्तेदार मिला उच्चक उच्चक कर सभी बहार
निकलने लगे। औरंगज़ेब की तलवार के सामने अपनी
सुन्नत करवा ली थी। अगर दम था तो तभी जंग करना
थी और अपनी मंदिरों को बादशाह से उसी वक़्त हासिल कर लेना थी। कमोज़र आदमी।
आज
भी तुम्हारे पास मुतलक़ अक्सरियत है एवान तुम्हारा फ़ौज तुम्हारी तमाम शुमाल तुम्हारा
अदालत तुम्हारी इन्तेज़ामियाँ तुम्हारी फ़िर भी अदालत के कन्धों पर बंदूक रख कर वार कर
रहे हो।
हम
तो आज इतने कमज़ोर होने के बावजूद भी जंग की बात करतें हैं। तुम्हारे दादा अब्बू जिसके ऊपर ज़ाफ़रानी लुगाई को
देख फ़रार बोहोत पोंगाते थे हमास जैसे मुजाहिदों ने उसकी बैंड बजा रखी है। १८ दिसम्बर को अमेरिका जैसे आलमी क़ुव्वत के १० फौजी
सुरंग तलाशते हुए हमास ने चीथड़े उड़ा दिए। ऐसे
जाल में फसे की १३७ इस्राएली फौजी और १० अमेरिकी फौजी मारे गए।
ज़ाफ़रानी
काफ़िरों की चर्बी इसरायली दहशत से थी अभी इसरायली दहशतगर्दों की गाज़ा चर्बी निथर रही
है और ग़ाज़ा क़बरस्तान साबित हो रहा है रूको
ज़रा गाज़ा से निपटने के बाद तुम्हारी चर्बी निथारेगें।
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