Friday, 15 December 2023

एवांन के हमले के दहशतगर्दों का हुलिया कैसा है।

अज़ीज़ नाज़रीन,

पाकिस्तान के ऊपर फब्तियाँ कसने वाले संघी, बीजेपी के रकून, कट्टर हिन्दू और चिड़िया घर के खूंखार जानवर लंगूर और लँगूरनियाँ कभी भी उनके वतन भारत में क्या होता है कैसे होता है उसके ऊपर कुछ नहीं बोलते और ऐसे ख़ामोश हो जातें हैं जैसे गधे को सांप सूंग गया हो। 

आडवाणी के वज़ीर ए दाखाला और अटल बिहारी वाजपाई के वज़ीर ए आज़म होते हुए जो हमला पुराने एवांन में हुआ था वैसा ही हमला २०२३ के नए एवांन में कड़क वज़ीर ए आज़म मुँह से अंगारे निकालने वाले वज़ीर ए दाखाला और दहशत की हामी अक़लियतों की दुश्मन बीजीपी की हुकूमत  होते हुए हो गया।  मतलब पुराने भारत और नए भारत में कुछ भी नहीं बदला।  बस अगर बदल गया है तो हमलों का रस्म अल ख़त बदल गया है।  

नाज़रीन दो तीन बातें आप लोगों के ज़ेहन नशीन करना चाहूंगा पहली बात यह वही ज़ेहनियत है जो दरिंदे, जल्लाद आज़ाद इंडिया का पहला दहशतगर्द और शैतान नाथूराम गोडसे की हामी दिखती है।  दरिंदे नाथूराम ने एक ६० साल के निहत्ते ज़ईफ़ मिस्टर गांधी को गोली मारने से क़ब्ल जो शबी इख़्तेयार की थी बरोज़ बुध १३ दिसम्बर २०२३ को हुए हमले में तमाम दहशतगर्दों ने इख़्तेयार की हुई थी।  नाथूराम ने पायजामा कुर्ता पहन कर मिस्टर गांधी को गोली मारी थी।  उससे क़ब्ल उसने अपना खतना करवा लिया था और पूना के जिस अखबार के लिए काम करता था उसने उसको साल भर के लिए मदरसे में इस्लामिक इल्म की तालीम दिलवाई।  ताके पकड़े जाने पर वोह इस्लामिक इल्म क़ुरान और हदीस बता कर जांच अधिकारी को गुमराह कर तमाम इलज़ाम मुसलमानों और पाकिस्तान के ऊपर लगा दे।  ऐसा कर के वोह अपने मक़सद में कामयाब हो जाएगा और इंडिया में होंगे शदीद हिन्दू मुस्लिम फ़साद या तब का भारत पाकिस्तान के ऊपर हमला कर देगा।   

लेकिन पाकिस्तान ने फ़ौरन इस हमले की मज़्ज़म्मत की और इंडिया के साथ इस ग़म के मौक़े पर यकजहदी दिखाई। फिर तमाम चीज़ें आईने की तरह शफ़्फ़ाफ़ हो गई। 

१३ तारीख़ के हमले में तमाम दहशतगर्दों ने दाढ़ी बढ़ा रखी थी ताके रकून ए एवानों को पहली नज़र में गुमराह कर के चिड़ियाघर के ख़ूंखार जानवर लंगूर और लँगूरनियों को उसमे मसाला मिला कर मुस्लिम किरदार कुशी की जा सके और उसके तार पाकिस्तान, हमास, फ़लस्तीन आई.अस.आई.अस. से जोड़ कर दो तीन मुस्लिम नौजवानों को गिरफ़्तार कर के इस मसले को चिड़ियाघर में इन्तेख़ाब तक ज़िंदा रखा जा सके।   फ़िर २०२९ में इसी मुद्दे पर जीतने की कवायत की जा सके हम संसद के हमले के मुजरिमों को फ़ांसी देंगें।  और जीतने के बाद मासूम मुसलमानों को फ़ांसी के तख़्ते पर टांग दिया जाए। 

अफ़ज़ल गुरू को ऐसे ही झूठे इलज़ाम में पकड़ कर फ़ांसी दे दी गई थी।  जिसमे चिड़ियाघर के ज़ालिम तरीन जानवर लंगूर लँगूरनियों ने नुमाया किरदार अदा किया था।  काने दज्जाल सलवार वाले बाबा और तमाम हिन्दू शिद्दत पसंदों को ले कर मुबाहिसे करते थे ताके मसला गर्म रहे।  बिल आख़िर कांग्रेस ने अपनी खोती हुई साख को बचाने के लिए एक बेगुनाह को फांसी के तख़्ते पर लटका दिया।  और मुसलमानों के नाम एक इलज़ाम दे दिया "दहशतगर्द"।

नाज़रीन १३ दिसम्बर २००१ में जिन दहशतगर्दों ने सांसद पर हमला किया था उनके पास से आडवाणी के वज़ारत खाने के पास मिले थे।  जिस एम्बेस्डर से वोह आये थे उसके ऊपर लाल बत्ती लगी थी और वोह वज़ीर ए दखाला के दफ़्तर की गाड़ी थी।  लेकिन यह तमाम बातें अदालत के सामने पेश ही नहीं होने दी और तमाम काले कोट वाले संघी जानवरों ने बायकाट की मोहीम का आग़ाज़ कर दिया। 

जिसकी वजह से असली मुजरिम तो बच गए और एक बेगुनाह तिब्बी उलूम (मेडिकल साइंस) की तालीम लेने वाले अफ़ज़ल गुरू फांसी के फंदे का शिकार हो गए।  जो मुजरिम बच गए थे उन्होंने फ़िर से वही हिकमत इख़्तेयार की और किसी बेगुनाह मुसलमान को फ़िर से फांसी दिलवानी चाही लेकिन इस बार अल्लाह मुसलमानों के साथ था।  भला हो पार्लिअमेंटेरियन दानिश अली का उन्होंने  आतंकवादी को पकड़ कर उसकी शिनाख़्त पूछी और उसका एंट्री पास देखा।   फ़ौरन उन्होंने इस बात को आम किया की हमलावर शर्मा है और उसके पास बीजेपी के मेंबर ऑफ़ पार्लिअम्नेट का पास है।  नहीं तो ख़ूंखार जानवर लंगूर लँगूरनियों ने तो फ़िर से इंसानी गोश्त वोह भी मुसलमान को खाने की पूरी मंसूबा बंदी कर ली थी।  फ़िर से वही हिकमत इख़्तेयार की जाती फ़िर से बेगुनाह मुसलमान को जब तक फ़ांसी नहीं दे दी जाती लंगूर लँगूरनियाँ हर रोज़ मुसलमानों के ख़ून से अपनी डीबेट में प्यास बुझाते।  

इस तरह से भारत में सदियों से इन्साफ का क़तल होता आया है और मुजरिम अपने मक़सद में हर वक़्त कामयाब होते आये हैं।     

सदियों से मुसलमानों के खिलाफ चली आ रही इस नाइंसाफ़ी का बदला लिया जाएगा और ज़रूर लिया जाएगा।  जब कोई अबू ओबेदा भारत के मज़लूमों में से उठेगा तब ना ही कोई ज़ालिम बचेगा और ना ही उसका मुहाफ़िज़।  ना ही लंगूर लँगूरनियाँ बचेगी और ना ही हिन्दू हो कर मुस्लिम नाम से बदगुमानी फ़ैला कर अवाम को गुमराह करने वाले मुजरिम। 


सहाफ़ी ज़ुबेर

No comments:

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...