अज़ीज़ नाज़रीन,
भारत में जितना अक़लियतों मुस्लिम क्रिस्टी सिख जैन अवाम को हिन्दू दहशतगर्दों और हुकूमत की जानिब से हरासा किया जाता है उतना किसी भी हिन्दू को ना तो मुस्लिम और ना ही क्रिस्टी मुमालिकों में और ना ही आज़ाद सिख मुल्क ख़ालिस्तान में परेशान किया जाता होगा। लेकिन अब वक़त का तक़ाज़ा है की इन जानवरों से उस ही जुबांन में बात की जाए जिसको वोह समझतें हैं। जिसका आग़ाज़ हो चूका है, मुस्लिम अवाम के क़ुर्बानी के तेहवार ईद ए क़ुर्बान पर बवाल मचाने वाले हिन्दू दहशतगर्द बजरंदल ने ख़ुद ही क़ुर्बानी की हिमायत की है।
बिहार
के दरभंगा में मारूफ़ श्यामा माई मंदिर में क़ुर्बानी रिवायत (प्रथा) पर मज़हबी अक़ीदे
के सदर और जैन रहनुमा अखिलेश जैन ने रोक लगा दी है। जैसे ही मां श्यामा मंदिर अहाते में क़ुर्बानी की
रिवायत (प्रथा) पर रोक लगाने की बात सामने आई, दरभंगा में इसकी मुख़ालेफ़त होने लगी है. क़ुर्बानी की रिवायत पर रोक से खूंखार दरिंदा हिन्दू
दहशतगर्द तंज़ीम बजरंग दल तिलमिला उठा है। हिन्दू
दहशतगर्द तंज़ीम को मिर्ची ऐसी लगी की उसने बिहार के मज़हबी अक़ीदे के सदर अखिलेश जैन
का मुजस्समा आतिशे नार किया और उन्हें ओहदे से बर्तरफ़ करने का मुतालबा किया की है.
बिहार
मज़हबी अक़ीदे ने मशहूर श्यामा माई मंदिर में क़ुर्बानी की रिवायत पर रोक लगाने की दरख़्वास्त
की थी। हुकुम नाफ़िज़ होते ही मंदिर में क़ुर्बानी
देने की प्रथा पर पूरी तरह से रोक लगा दी गयी है।
उस फ़रमान के ख़िलाफ़ तमाम शिद्दत पसंद काफ़िर उठ खड़े हुए कोई उसको मुगलियाँ फ़रमान बता रहा है कोई तुग़लकी तो कोई तालिबानी फ़रमान बोल कर अपनी भड़ास निकाल रहा है।
वहीँ
खूंखार हिन्दू दहशतगर्द तंज़ीम बजरंग दल का आतंकवादी राजीव मधुकर बोला कि अखिलेश जैन
को फ़ौरन मज़हबी अक़ीदे से बर्तरफ़ किया जाए. जैन पर सनातन मज़हब का इल्म नहीं होने का इलज़ाम
लगाते हुए आतंकवादी मधुकर बोला कि जो सनातन मज़हब का है ही नहीं, वो भला सनातन
मज़हब की इबादत के तरीक़े को क्या जान पाएगा।
इस मुद्दे पर में सहाफ़ी ज़ुबेर की राये।
हिन्दू दहशतगर्दों से कहना चाहूंगा की हिन्दू मज़हब में अगर
क़ुर्बानी बेज़ुबान जानवर को काटने की है तो उस पर रोक लगना चाहिए। बेज़ुबान जानवर को काटने से क्या हासिल होगा। वैसे भी हिन्दू मज़हब में मासाहार को पसंद नहीं किया
जाता है सख़्त मना है। फिर जानवर की क़ुर्बानी
वोह भी भगवान को खुश करने के लिए यह बात कुछ समझ में नहीं आती है। अगर क़ुर्बानी देना ही है तो हिन्दू रिवायात का लिहाज़
रखते हुए नर बलि देना चाहिए। जो हिन्दू मज़हब
में कही से कही तक ममनूअ नहीं है। हिन्दू अपने
अपने बच्चों की बीवी की या मां बाप की क़ुर्बानी दें ताके उनसे उनका भगवान् खुश हो जाए। सती प्रथा का आग़ाज़ फिर से किया जाए। वैसे भी सिद्धी पाने के लिए हिन्दू साधू नर बलि
देते थे वोह हिन्दू मज़हब का एक हिस्सा रही है।
अब में उन तमाम हिन्दू दहशतगर्दों से जानवर मुहाफ़िज़ तंज़ीमों से ज़ाफ़रानी डाकू और मुर्तद मोहसिन रज़ा से पूछना चाहता हूँ जिनकी मोहब्बत मुसलमानों के तेहवार ईद ए क़ुर्बान पर बेज़ुबान जानवरों के लिए जाग जाती थी। और जानवरों की क़ुर्बानी पर बेन लगाने की बात करते थे। क्या तमाम क़ायदे हमारे लिए ही हैं तुम्हारे लिए नहीं। जानवर की क़ुर्बानी देते वक़्त हम पर ही तनक़ीद तब जानवर बेज़ुबान हो जातें हैं और तुम मंदिरों में काट रहे हो तो वोह तुम्हारा मज़हबी अक़ीदा है।
यही में कहना चाहता हूँ हम तो खाते हैं डंके की चोट पर खातें हैं गाये, बैल, ऊँट, बकरा, मुर्ग़ा कियोंके हमको चौपायों को खाने का क़ुरान में कहा गया है। लेकिन तुम वही काम चोरी छुपे करते हो। और बदनाम हमको करते हो।
ऐसे ही अक्सरियत अज़वाज हिन्दू ज़्यादा रखतें हैं लेकिन तनक़ीद हमारे ऊपर की जाती है। कियोंके हिन्दू चोरी छुपे रखतें हैं और दूसरी तीसरी चौथी औरत को बीवी का दर्जा नहीं मिलता है बल्कि रखेल होती है।जब्कि इस्लाम में एक हो या चार सबको बराबर का हक़ है विरसे में उनको जायदाद तक़सीम पर हक़ मिलेगा। तमाम औलादों को बाप का नाम मिलेगा तमाम औलादें जाइज़ होंगी। लेकिन हिन्दू मज़हब में सिर्फ एक बीवी से औलाद जाइज़ बाक़ी सब हरामी।
वहीँ
क़राबत वाले रिश्तों में शादियां हिन्दू ज़्यादा करतें हैं। और तनक़ीद हम पर होती है। हाँ हम करतें हैं डंके की चोट पर कोई भारत का ज़ाफ़रानी
क़ानून कोई मज़हब की दिवार हमको रोक नहीं सकती कियोंके हमको क़राबत में शादी करने की इजाज़त
हमारा क़ुरान देता है। वही काम हिन्दू चोरी
छुपे करतें हैं। जिस लड़की पर दिल आ गया उसको
बाँध दी राखी। अब माँ बाप हो गए सहज ९ महीने
बाद बेटी अपनी माँ को हाथ में देती है लो मम्मी आप नानी बन गई पिताजी आप नाना और भैया
तुम मामू। यही फ़र्क़ है हिन्दू और मुस्लिम के अंदर मुस्लिम जो भी करतें हैं जाइज़ और ढंके की चोट पर करतें हैं जबकि हिन्दू चोरी छुपे और नाजाईज़ करतें हैं।
हिन्दू मज़हब में देवर भाभी के चक्कर में तो कई भाई को अपनी जान गवानी पड़ी है लेकिन तनक़ीद का मरकज़ होगा तो सिर्फ मुल्ला जी। अरे वोह केप्सूल लल्लू राम चूनावाला लुगाई देख कर फ़रार कहाँ हैं। उसके घर में बच्चे किस के हैं देवर के या किसी साधू के।
इस्लाम मज़हब के ऊपर हर वक़्त तनक़ीद करने वालों टीवी पर हर वक़्त मंदिर मस्जिद हिन्दू मुस्लिम करने वालों मेरी राये है जिस तरह से मंदिर में क़ुर्बानी को बेन किया है उसी तरह से औरतों की एंट्री भी बेन होना चाहिए। मंदिरों में औरतों की वजह से ज़िना होते हैं और साधुओं के लिए मौज का सामान तय्यार होता है। हर जगह इन टीवी वालों और हिन्दू दहशतगर्दों को एक मुल्ला जी और उसका मज़हब ही दिखता है। ज़रा अपने मज़हब पर भी कुछ बोल दो। बंद करो यह नंगा नाच, कितनी बार समझाया तुमको मंदिरों में औरतों को लाना बंद किया जाए, समझ में नहीं आता है।
अगली
कड़ी में जो मस्जिदों को कोर्ट की निगरानी में डाका डालने की हिकमत हो रही है उसके ऊपर
तन्क़ीदी लेकिन हक़ीक़त से रू बरू वाला मज़मून लिखूंगा।
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