अज़ीज़ नाज़रीन,
हाल
ही में पाकिस्तान ने हिन्दू क्रिकेट टीम को आलमी टी-२० कप के पहले ही मैच में शाकिस्त
दे कर तारीख़ के सफों में नए उन्वान का आगाज़ कर दिया। गुजिश्ता ७० सालों में किसी भी आलमी क्रिकेट में
पाकिस्तान ने कभी भी भारत को शाकिस्त नहीं दी थी, उस तारीख़ को पाकिस्तान ने तब्दील कर
डाला। पाकिस्तान की इस अज़ीम फतह पर पाक क्रिकेट
टीम के फेन्स ख़ासे खुश हुए। नाज़रीन जिस तरह
हर शख्स का अपनी इज़हारे खुशी और ग़म का एक पैमाना होता है उसी तर्ज़ पर सहाफियों, दानिशमंदों,
सियासतदानों का भी अंदाज़े बयां उनकी खुशी और ग़म का इज़ाहर करता है। पाकिस्तान की फतह पर सहाफी जुबेर जो ना सिर्फ पाकिस्तान
की क्रिकेट टीम बल्कि पूरे पाकिस्तान के फैन हैं।
उन्होंने अपनी खुशी का इज़हार अपने मज़मूनों के ज़रिये किया।
भारत की इस शाकिस्त पर पाकिस्तान के अज़ीम वज़ीरे दाख़ला भी ख़ासे खुश नज़र आये। उन्होंने इस जीत को आलमे इस्लाम की जीत तसव्वुर किया। अब क्रिकेट को मज़हब से जैसे ही उन्होंने मुनसलिक किया की भारत के ज़ाफ़रानी कीड़े कुलबुलाने लगे। ज़ी न्यूज़ का तिहाड़ जेल का सज़ाई आफ़ता मुजरिम सुधीर चौधरी, मोदी की बांदी देसी कट्टा अंजना ॐ, फ़ौज की ग़द्दार स्वेता वग़ैरा अपने अपने अड्डों पर क्रिकेट को मज़हब से जोड़ने के ऊपर भोंकने लगे। इन लोगों की शायद यादाश्त कमज़ोर है, जब २००७ में पाकिस्तान से भारत टी-२० आलमी कप जीता था तब कैसे कैसे तास्सुरात आ रहे थे। धोनी जैसे एक आम इंसान को राम के रूप में दिखाया गया था। ट्रॉफी को राम मंदिर और बस को रथ की शकल दे कर तमाम भारत में फिरवाया गया था। भारत की उस फतह को "जीत लिया पाकिस्तान" और "हिन्दू योद्धाओं ने अधर्मियों से धर्म युध जीता", ऐसे उन्वानों से मुख़ातिब किया गया था। इतना ही नहीं बीजेपी के ज़ाफ़रानी सियासत दान उनके ज़हरीले बोल भूल गए हिंदुस्तानी जो आज पाकिस्तान के ऊपर तनक़ीद कर रहें हैं। २००७ की उस जीत को बीजेपी और संघ ने हर इंतेखाब यहाँ तक की २०१३-१४ तक भुनाया था और उसमे ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियाँ भी शामिल थे जो आज पाकिस्तान के वज़ीरे दाख़ला पर तनक़ीद कर रहें हैं।
जब
तमाम भारतीय तनक़ीद की इस बहती गंगा में हाथ धो रहे थे तो हमारी तंज़ीम के रहनुमा असदुद्दीन
कैसे इस तनक़ीद से अलहदा रह जाते।
असद
भाई ने पाकिस्तानी वज़ीर की ज़बरदस्त तनक़ीद की और ओछी ज़ुबान का इस्तेमाल भी किया। जो ज़ुबान ओमूमन संघी दहशत, ज़ाफ़रानी कीड़ों के लिए
की जाती है जिनको क़तल करने का हुकुम है। वोह
ज़ुबान उन्होंने एक मोमिन पाकिस्तान के वज़ीर के लिए की। एक जानिब असदुद्दीन बोलतें हैं हमें पाकिस्तान से
क्या करना है और दूसरी तरफ पाकिस्तान के सबर में लौट रहे थे। यह कैसी सियासत है के असदुद्दीन को भी पाकितान को
कौसे बगैर पेट में दर्द होना बंद नहीं होता। अरंडी का तेल क्यू नहीं पीते।
आगे
असदुद्दीन बोलतें हैं पाकिस्तान सुनों तुम भारत से बोहोत पीछे हो तुम भारत का मुक़ाबला
नहीं कर सकते। जिस हिन्दू राष्ट्र (काफिर मुल्क)
भारत को तुम बोल रहे हो बोहोत आगे है उससे पाकिस्तान बोहोत आगे है। जो आशियात इलेक्ट्रिकल
लेडर, शॉपिंग मोल, गैस पाइप लाइन हमने पाकिस्तान में १९७९ में देख ली थी। जो आइसक्रीम
मशीन से कोन में आइसक्रीम ट्री बनाते हैं वोह हमने १९७९ में शॉपिंग मॉल के बहार खाया
था वोह सब चीज़े १९९५ या २००० में भारत में बंबई जैसे शहर में आयी हैं।
असद
उद्दीन मज़हबे इस्लाम का दर्स पाकिस्तान जैसे अज़ीम मुल्क के वज़ीर को देतें हैं। भलां क्रिकेट का मज़हबे इस्लाम से क्या लेना। मज़ीद असद साहब पाकिस्तानी वज़ीरे दाखला को पागल
तक क़रार दे देंतें हैं। इन असद साहब को हिन्दुस्तानी
दरिंदा और दहशतगर्द कुलभूषण जादव की फ़ासी पर पाकिस्तान को दीने इस्लाम सिखाने पर पहले ही धो चूका
हूँ। उसके ऊपर एक मज़मून लिखा है, जिसमे असद
साहब को सच्ची इस्लाम की तालीम दी है और जिस दरिंदे संघ के दहशतगर्द ने मुसलमानों का
क़त्ले आम किया एक इस्लामिक रियासत को तोड़ने की साजिश की उसकी सज़ा के बारे में बता चूका
हूँ। मज़ीद क्रिकेट और इस्लाम में क्या ताल्लुक़
हो सकता है उसके ऊपर बताता हूँ।
किसी दो मुमालिकों के दरमियान जब जंग होती है तो हर मुद्दे पर लड़ाई होती है. क्रिकेट क्या, ज़ुबानी, ज़ेहनी, या नफ़्सानी हर चीज़ जंग करती है. फिर कुफ्र और हक़ के दरमियान जब जब हालात ऐसे बने तो हर महाज़ पर जंग जैसे हालात हुए। फिर इस जंग का आगाज़ ना पाकिस्तान ने किया है और ना ही मुसलमानों ने किया है। २०१९ के इंतेखाब को धर्म युध का नाम किसने दिया था। भोपाल में दहशत और रावण की सीता जीती थी तब उसके क्या तास्सुरात थे ज़रा मुल्हाइज़ा कीजिये। यह जंग पाकिस्तान के ऊपर भारत के शिद्दत पसंद काफिर और हिन्दू दहशत ने मुस्सल्लद की है ना की पाकिस्तान की जानिब से जंग का आगाज़ हुआ है। अब आप बताओ हक़ बनाम बातिल या कुफ्र बनाम इस्लाम की जंग में आप किस जानिब हो, हक़ के सब्ज़ परचम के नीचे या कुफ्र के ज़ाफ़रानी परचम के नीचे.
असद
साहब को एक मशवरा है आप अपनी सियासत करो। काफिरों
की चमचा गिरी मत करो. आपकी ऐसी ही बातें मुसलमानो के वोट में बटवारा करती है. आप शुमाली सूबे में इंतेखाबी
मरहले में हिस्सा लेने आएं हैं या पाकिस्तान में। दूसरी बात सूबे शुमाल का इन्तेख़ाब
और पाकिस्तान की बात लिंक कहाँ से कहाँ तक बैठ रहा है। लेकिन हाँ संघ और बीजेपी का
खौफ साफ़ दिख रहा है। उनके दबाव और ख़ौफ़ की वजह से ऊल जलूल बक रहे हो। क्या मिलेगा यह
सब कर के बल्कि आप अपने ही वोट में बटवारा कर रहे हो मतलब बीजेपी का साथ दे रहे हो। पाकिस्तान की बात कर के आपको क्या हासिल होगा यह
इंतेखाब सूबे का है पार्लियामेंट का नहीं है।
आपको
लगता है संघ या बीजेपी से धमकी आई है। सूबे
का वज़ीर एक दरिंदा सिफ़त, ज़ाफ़रानी क़साई है वोह कब किस को हलाक कर दे कुछ कहते नहीं आता। और आप अभी सूबे शुमाल की हदों में हैं। जैसा उसने आपको हुकुम दे दिया आप ने वैसा ही बोल
दिया।
आज
पाकिस्तानी इंग्लैंड अमेरिका में आला ओहदों पर फ़ाइज़ हैं। क़ानून साज़ों के हेड ऑफ़ दी डिपार्टमेंट हैं और आप
इलज़ाम लगाते हो की पाकिस्तान ने आलम को क्या दिया है। अगर आज हमारे बुज़ुर्ग वहां चले गए होते तो हमें
रशीद साहब जैसे लोगों के पागल पन को ठीक करना पड़ता।
आप
हमेशा पाकिस्तान को कोसते हुए देखे जा सकते हो, संघ और BJP के दबाओ में काम करते हो। आप वज़ीरे दाखला को बोलते हो की तुम्हारी नस्ले बर्बाद
होंगी, इस तरह की ज़ुबान एक मुसलमान मुल्क की नस्लों के लिए कहाँ तक जाइज़ है। वोह आप ही थे पुलवामा के बाद पाक पर मोदी से हमले की सिफारिश की थी। तबाह कर दो अगर पाकिस्तान तबाह हुआ तो मरेंगे मुस्लिम। जबकि पुलवामा में किस का हाथ था उस वक़्त तो यह पता
भी नहीं चला था। बाद में सब बातें इस सहाफी
ने शफ़्फ़ाफ़ कर दी की पुलवामा मोदी और बीजेपी का इन्तेख़ाब को जीतने के लिए किया हुआ अमल
है। सबूत के साथ मज़मून लिखा है, १३ फ़रवरी
को संसद का इजलास ख़तम हुआ और १४ को पुलवामा मोदी को मालूम था की अब कोई इजलास होना
नहीं है फिर जंग की हवा बांदी। हगामी इजलास
भी नहीं हो सकते थे क्योंकि राये शुमारी की हदें नाफ़िज़ हो चुकी थी।
आप भारत से मोहब्बत कीजिये अपने मुल्क के लिए ख़ैर का जज़्बा रखिये लेकिन जब भी आप भारत बा मुक़ाबिल पाकिस्तान या मुसलमानों से करेगें तो आप इस सहाफी को अपने मुक़ाबले में खड़ा पायेगें। और आपकी ज़ुबान से कई गुना तेज़ है मेरी ज़ुबान। फिर जब आपके और हमारे दरमियान ज़ुबानी जंग का आगाज़ होगा तो नुकसान तो उम्मा का ही होगा। और यही संघी चाहते हैं मुसलमानों को ही आपस में लाडवा दो। आप भारत के मुसलमानों की आवाज़ हो, उम्मत का दर्द भी है काम करने का जज़्बा है लेकिन उसको लायानी बातों में फरामोश मत कीजिये। पाकिस्तान में क्या हुआ, पाकिस्तान ने क्या किया उससे आपको क्या करना है।
Zuber
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