अज़ीज़ नाज़रीन,
इन्तेख़ाब आते ही सियासी तंज़ीमों की मुस्लिम ग़ुलाम और मुफ़लिस सोच भाजपा की गुलामी करने को तैयार हो जातें हैं। इन गुलामों को इस बात का शहूर और इल्म नहीं के इनकी गुलामी से उम्मा का कितना नुकसान हो रहा है लेकिन यह ग़ुलाम सियासतदान अपने ख़ुद के मुस्तक़बिल को बालाये ताक़ कर के अपने सियासी आक़ा और संघी रहनुमा का अक़्स चमकाने में लगे होतें हैं।
नाज़रीन
मेरा इशारा नो निहाद सेक्युलर तंज़ीमों के ग़ुलाम मुस्लिम सोच से है। जिनको तंज़ीम के सरबारह से सख़्त हिदायत होती है
की कोई भी बात ज़ुबान से मुस्लिम मफ़ात या हक़ के लिए नहीं निकालना नहीं तो तुम्हारी गर्दन
क़लम कर दी जाएगी। मतलब पार्टी से छुट्टी हो
जाएगी।
नाज़रीन
इस ग़द्दार सोच में अभी तक सिर्फ कोंग्रेसी ही थे लेकिन सपाई, बसपाई, आर जे डी और तमाम
दिगार नो निहाद भी आ गए। सपा जिस नुमाईंदे
की बॉम्बे के मुस्लिम अवाम में ख़ास पहचान थी जब उसको बरहना किया तो उसकी भी पोशीदा
चड्डी खाकी ही निकली। अब ऐसी गुलाम सोच को
क्या कहिये जो खुद उस ग़द्दार ज़ेहनियत का शिकार हुआ जिसके लिए आज वोह मुस्लिम क़यादत
को कौस रहा है। यह महाशय इश्तेआल अंगेज़ी के
जुर्म में कई महीनों तक जेल में सड़े हैं। फिर
इनकी रिहाई ठाणे जेल से हुई थी तब भी कोई समाजवादी इनके हक़ में खड़ा नहीं हुआ था। जैसा की आज आज़म खान के लिए कोई भी समाजवादी खड़ा
नहीं हुआ उनको जेल में सड़ा दिया।
लेकिन इनकी ग़ुलामी का पैमाना इतना अज़ीम हैं की ज़र्रा भर दिमाग में वस्वसा और जुम्बिश नहीं। फिर जो शख़्स मुस्लिम मफ़ात की बात कर रहा है मुस्लिम क़यादत की बात कर रहा है मुस्लिम हक़ के लिए लड़ रहा है तुम उसी को कोसने लगे, पाकिस्तान भेजने लगे। अरे शर्म कर, संघी ग़ुलाम। तेरे मुलायम की क्या सोच है मालूम। और तेरी क्या सोच है वोह भी मालूम। जब तेरे को महाराष्ट्र में हलफ बरदारी में थप्पड़ पड़े थे और शिव सेना के एकनाथ शिंदे और दीगर नुमाइंदों ने तुझे मंत्रालय के बहार रोका था तब तेरा किया बयान था। “में तो मुलायम के सिद्धांतों पर चल रहा हूँ और हिंदुस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश की यकजहदी पर अमलपेरा हूँ, और इन तीनों मुमालिकों को ज़म कर के एक महाज़ बनाऊंगा।“ अबे यह बात तो संघी बोलतें हैं और RSS का मिशन ही वही है। अखंड भारत।
इतना इनकी अनदेखी की गई, मुसख्तार अंसारी, अतीक अहमद जैसे सियासतदाओं को उनकी तंज़ीमों ने तबाह कर दिया फिर भी इन महाशय की जुबां से अपने सियासी आक़ा और ग़द्दार रहनुमा के लिए शीरीं अलफ़ाज़ निकलते हैं। अब यह जो बोल रहा है की पाकिस्तान चले जाओ तो ऐसी जुबां हमेशा भाजपा वाले या संघी बोलते हैं। अब जो बी टीम का फलसफा है वोह असद पर कैसे लागू होता है। वोह बी टीम कैसे हुई जो मुक़ाबला करने की बात करती है अपनी क़यादत मज़बूत करो ऐसी बात करती है या वोह हुई जो भाजपा और संघ की ताईद करती है और भाजपा की जुबां बोलती है।
नाज़रीन यह बात आईने की तरह शफ़्फ़ाफ़ और मुस्लिम अवाम पर ज़ाहिर हो चुकी है की भाजपा कभी भी मुस्लिम मफ़ात की बात नहीं करेगी और हर उस काम में सरे फेहरिस्त होगी जिसमे मुस्लिम हक़ तल्फी होती होगी। जहाँ तक नो निहाद कांग्रेस का सवाल है वोह भाजपा को पीछे से हिफ़ाज़ती इक़दाम करती है। और कांग्रेस का हर अमल मशकूक और किरदार दोगला है। हालांके इस सहाफी को १९९२ में बाबरी मस्जिद की शहादत, बम्बाई, महाराष्ट्र में मुस्लिम मुखालिफ़ सख़्त तरीन दंगे और उससे पेश्तर राजीव गांधी के मुस्लिम मफ़ात के साथ ग़द्दारी भरे किरदार का इल्म हो चूका था। लेकिन उस वक़्त नौ उमरी और अक्सरियत तबक़े (हिन्दू दहशत) के ख़ौफ़ के चलते कोई भी बात मन्ज़रे आम पर लाने में दुशवारी थी। जब इस सहाफी ने तहक़ीक़ात का आगाज़ किया तो नतीजे बेहद चौकाने वाले और तशवीशकुन निकल कर आये।
५ सालों की मुतावातिर मशक़्क़त के बाद वोह तमाम वाक़ेयात अपनी किताब में शाया किये। तहक़ीक़ात में पता चला की कांग्रेस ने तो मुनज़्ज़म तरीक़े से मुसलमानों को तबाह और बर्बाद करने की संघ की ते शुदा साजिश को बंद दरवाज़े मीटिंग में अमल पेरा किया। जिनको दंगे बोल कर कांग्रेस हमेशा पलड़ा झाड़ लेती थी, दरअसल मेरी उस किताब में चस्पा है की यह दंगे होते नहीं हैं बल्कि सोची समझी साजिश के तहत सिर्फ मुस्लिम माश को तबाह और बर्बाद करने की नियत ले कर करवाए जाते हैं।
फिर २०१० से सहाफत और मज़मून कुशाई करने का आगाज़ किया तो कांग्रेस, नेशनलिस्ट कांग्रेस जैसी मुस्लिम दुश्मन और ग़द्दार तंज़ीमों के ख़िलाफ़ लिखने का आगाज़ किया। आहिस्ता आहिस्ता इस बात का इल्म हुआ की ना सिर्फ कांग्रेस, नेशनलिस्ट कांग्रेस बल्कि हर नो निहाद सेक्युलर चाहे सपा हो, बसपा, आरजेडी, जनता दल (यूं), ग़द्दार है। इनको मुस्लिम वोट तो चाहिए लेकिन मुस्लिम क़ियादत इनको क़ुबूल नहीं है। जिसका ज़िक्र २०१० से खूब चिल्ला चिल्ला कर हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ़ इंडिया और नव भारत की हर मुबाहिसे में किया। टोपी लगाने, इफ्तार पार्टी देने, या ईद पर बैनर लगाने से आप मुस्लिम हमदर्द नहीं हो जाते, असल हमदर्द तब बनोगे की जब आप मुस्लिम मसाइल हल करोगे। तालीम, माशी, रोज़गार के मसाइल हल करोगे। फिर मुबाहिसे में हज सब्सिडी का भी संघी खूब ताना मारते थे, की हमारी हुकूमत पैसा देती है तो तुम हज करते हो। उसके ऊपर भी कहा था नहीं चाहिए हमें हुकूमत की भीक या ख़ैरात। हमें हमारे मज़हब का काम करने के लिए किसी काफिर हुकूमत की भीक नहीं चाहिए बंद कर दो हज सब्सिडी। और नतीजा निकल कर आ गया जिस साल हज सब्सिडी बंद हुई उसके दो साल तक पहले से ज़्यादा मुस्लिम हज पर गए। बाद में लॉक डाउन हो गया।
अब बढ़ते हुए मुस्लिम हज यात्रियों की तादात को देखते हुए ज़ाफ़रानी दहशत और मोदी ख़ौफ़ ज़दा हुआ तो लाया नए नए क़ानून जिससे किसी तरह बढ़ती हुई हज यात्रियों की तादात पर अंकुश लगाया जा सके। लेकिन बेफिक्र रह मोदी जिसको अल्लाह अपने हरम में बुलाना चाहेगा वोह कैसे भी पहुंच जाएगा। तू दुनियां के क़ानून बना सकता है रब्बे क़ायनात का निज़ाम और क़ानून तब्दील नहीं कर सकता। होगा वही जो मेरे रब ने प्लान कर रखा है। तू लाख ततबीर कर लाख मंसूबे बना लेकिन कामयाब मेरे रब का मंसूबा ही होगा और ग़ालिब मुस्लिम ही होंगे।
नाज़रीन २००६ के बॉम्बे लोकल बलास्ट में मुलव्विस और जिहादियों से मिली भगत नमाज़ के लिए रोकना और दीगर झूठे फरेबी इल्ज़ामात लगा कर कांग्रेसी सियासतदां ने इस सहाफी को जुलाई २००७ में नौकरी से मुअत्तिल कर दिया था। फिर इस सहाफी ने अपनी क़ौम पर किये हुए रिसर्च पर मज़ीद काम करने का आगाज़ किया। लेटर बाज़ी करना शुरू की। २००८ में पहला लेटर मरहूम सलाहुद्दीन ओवेसी जी और उनके फ़रज़न्द असदुद्दीन ओवेसी को दरुसलाम में भेजा और उनसे मुस्लिम क़यादत खड़ी करने की बात कही। जिसमे उनको बताया था पार्लियामेंट में कमो बेश १०० हल्क़े ऐसे हैं जिनमे मुस्लिम नुमाया किरदार अदा कर सकतें हैं। असद उद्दीन से सीधा मुखातिब हो कर लिखा कांग्रेस की गुलामी छोड़ दीजिये अपना मुस्तक़बिल अपने हाथों से बनाइये।
मरहूम सलाहुद्दीन ओवेसी जी का इंतेक़ाल से कुछ अर्से क़ब्ल फोन आया क्योंकि सहाफी के वालिदे मोहतरम उनसे बाख़ूबी वाक़िफ़ थे और मिलते रहते थे। तो उन्होंने ख़ाक़सार को भी डॉक्टर साहब बोल कर मुख़ातिब किया और मेरे ख़त का हवाला दिया मज़ीद उन्होंने कहा आपकी तजवीज़ पर हम अमल पेरा हैं और जल्द आपको खुशगवार नताइज देखने को मिलेगें।
बिल
आख़िर चारमीनार और महालष्मी मंदिर मुद्दे पर कांग्रेस और AIMIM में रस्सा खींच का आग़ाज़ हुआ,
ख़बरों का बवंडर आया फिर हिंदुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ़ इंडिया में साफ़ अलफ़ाज़ में इस
सहाफी ने बोला की असद साहब को कांग्रेस का साथ नहीं देना चाहिए और कांग्रेस से अपनी
अलहदा पहचान बनाना चाहिए। आज नतीजा सामने है। जो कांग्रेस आज तक मुस्लिम गद्दारी करती रही वोह
खुद ही बैसाखी की मोहताज है। और यही हाल तमाम
नो निहाद तंज़ीमों का होगा। जिन्होंने गद्दारी
की अपने फ़र्ज़ के साथ और मुस्लिम अवाम के हुक़ूक़ के साथ। वोट माँगा मुस्लिम फलाही काम करेगें, मुस्लिम माश
पर अमल करेंगें, मुस्लिम नाइंसाफी नहीं होने देंगें और एवान में उन्ही तमाम मसलों पर
या तो ख़ामोशी इख़्तेयार कर ली या गद्दारी कर के हुकूमत की ताईद कर ली।
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