अज़ीज़ नाज़रीन,
हाल ही में बॉलीवुड के बादशाह अवामी और आलमी शोहरत आफ़ता शख़्सियत शाहरुख़ ख़ान के फ़रज़न्द आर्यन की गिरफ्तारी की गई है वोह भारतीय जनखा पार्टी की ते शुदा साजिश का एक हिस्सा है।
नाज़रीन यह बात अब आईने की तरह शफ़्फ़ाफ़ और अवाम पर ज़ाहिर हो चुकी है की जनखा पार्टी में अब क़ुव्वत और ताक़त नहीं बची है की वोह अपने मर्दों और जंगजूओं के ज़ोर पर विकास को पैदा कर सके। इसीलिए वोह उछल कूद कर के अपनी इज़्ज़त और लुगाई को पराये हाथों में सौंप कर विकास को पैदा करवाना चाहती है। और वोह पराये जवां मर्द सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम ही हैं।
अभी तक तमाम भारत के अवाम को इस बात का इल्म हो चूका है की जब कभी भी इन्तेख़ाब की दर्जे हरारत (गर्मी) बढ़ती है की पाकिस्तान, कश्मीर, लव जिहाद, इस्लामिक दहशत जैसे जवां मर्दों के पास यह जनखे अपनी लुगाई (इन्तेख़ाब) को भेजते हैं। अब अगर पाकिस्तान, कश्मीर की बात की तो अवाम पकड़ कर जूते से पीटेगी इसलिए किसी ऐसी अवामी शख़्सियत को परेशान और हरासा किया जाए जिससे की वोट जनखा पार्टी की झोली में आ गिरें।
अवामी शख़्सियत को इस हद तक हरासा और परेशान करो जिससे ख़ौफ़ ज़दा हो कर वोह जनखा पार्टी की लुगाई के साथ हो जाए और इन्तेख़ाब में बढ़ चढ़ कर जनखा पार्टी की लुगाई के बारे में क़सीदे पड़े। इन्तेख़ाब ख़तम उस अवामी शख़्सियत पर लादे हुए केस ख़तम। नाज़रीन आपको बंगाली काला नाग याद आया, हाँ सही पहचाना मिथुन दा, उसको कैसे इन जनखों ने अपनी लुगाई के जाल में फसाया था। मिथुन के फ़रज़न्द पर एक ज़िना का केस खोल दिया फिर क्या था जिस मिथुन ने कभी सियासत नहीं की उसको उस हद तक मजबूर और हरासा किया की वोह मजबूरी में जोकर से नाग में तब्दील हो गया। और अवामी जलसों में अपने आपको एक एक्क्टर के बजाये नाग से मुख़ातिब करने में फ़ख़्र महसूस करने लगा।
गुजिश्ता कुछ सालों में जनखा पार्टी की साख़ और विकार काफी कमज़ोर हुआ है वोट बैंक भी काफी हद तक छिटक गया है तो अब अपने वोट बैंक को कैसे मुस्तहकम किया जाए उसके लिए हर तरीके के हथकंडे, जालसाज़, धोकेबाज़ी, क़तल, शराबखोरी और ना जाने क्या क्या करके इन्तेख़ाब को मुत्तासिर कर के जीतने की इन जनखा पार्टी के नुमाइंदों की हिकमत होती है।
इसी कड़ी में अब जनखा पार्टी ने शाहरुख को हरासा करने का आगाज़ किया है, अगर आज शाहरुख जनखा पार्टी के ज़ेरे बैनर आ जाए और उसकी शान में क़सीदे बाज़ी करना शुरू कर दें अपने ज़मीर का सौदा कर लें तो उनके फ़रज़न्द पर ना कोई केस रहेगा और ना ही उनका फरज़ाद मज़ीद जेल में रहेगा।
इन्तेख़ाब आते ही इस्लामिक दहशतगर्दों की धर पकड़ शुरू हो जाती है सरहद गर्म हो जाती है कश्मीर में फौज के जवान मारे जातें हैं। यह तो मौत का सौदागर है अपने साथ मौत ले कर आया है, आज २०१४ के बाद से ट्रैक रिकॉर्ड है जब जब किसी भी सूबे या मरकज़ का इन्तेख़ाब आया की २५ से ३० फौजियों की बली दी जाती है महज़ इंतेखाब को मुत्तासिर कर के अपने हक़ में एक लहर चलाने और फिर अक्सरियत तबके के वोटों की यकजेहदी की जाती है। और जहाँ फौज के जवानों की मौत हो और मारा पाकिस्तान, कश्मीर या इस्लामिक जिहादियों ने हो तो फ़ौरन तमाम मुल्क का अवाम एक सूर में हुकूमत की जानिब खड़ा दिखता है। फिर ना कोई मज़हब होता है और ना कोई ज़ात बस फौज के बारे में इन जनखा पार्टी के कारकून ऐसी हवा बाँधते हैं की अवाम का दिल भर आता है, रही सही कसर नंगी लँगूरनियाँ पूरा कर देती हैं जो कभी मोदी की रखेल बन कर अपने नाम के पीछे मोदी लगा लेती है तो कोई टॉनिक पीला कर उस बूढ़े चौकीदार से गर्म जोश रहने का राज़ जानना चाहती है।
नाज़रीन
सहाफी का मज़मून लिखने के पीछे मक़सद किसी की ताईद करना नहीं है और ना ही इस सहाफी को
शाहरुख ख़ान या उनके फ़रज़न्द से कोई हमदर्दी है।
लेकिन मक़सद हक़ की आवाज़ और इन्साफ के परचम को बुलंद करना है। एक जानिब तो एन.आई.ऐ. बोल रही है की आर्यन के पास से कोई मादी (नशीला)
आशियात बरामद नहीं हुआ बिल फ़र्ज़ ३० ग्राम की जो बात निकल कर आ रही है उसके ऊपर अगर
आर्यन को जेल हो रही है तो ३००० किलो जो अडानी जैसे ग़द्दार, क़ातिल के गुजरात पोर्ट
पर उतरा तो उस हिसाब से अडानी फ़ासी होनी चाहिए। यकीन जानिये मसला वही है अगर अडानी को गिरफ्तार किया तो
संघी और अक्सरियत तबक़े के वोट तीतर बितर हो जायेगें और उसका फायदा मुख़ालिफ़ों को मिलेगा
और जनखा पार्टी के हाथ लगेगी रूस्वाई। जबकी
किसी ख़ान, डिसूज़ा या बलविंदर को पकड़ा तो वोट मुस्तहकम होंगे और मुख़ालिफ़ों को शाकिस्त
मिलेगी और जनखा पार्टी को फतह। यह सब इन्तेख़ाबी
हिकमते अमली है। इस कड़ी में झूठे और फरेबी केसस भी लादे जातें हैं मौलाना कलीम सिद्दीक़ी जिसकी बेहतरीन मिसाल हैं.
यह
सहाफी हमेशा इन्साफ की ताईद करता है और करता रहेगा और हक़ के साथ खड़ा रहेगा भले ही नाइंसाफी
अगर उसके दुश्मन संघी या जनखा पार्टी के नुमाइंदे के साथ ही क्यों ना हो यह सहाफी सदा
उनके हक़ में लिखेगा और कई मज़मून जिन भाजपा वालों के साथ नाइंसाफी हुई है उनके हक़ में
लिखे भी हैं। अब यह बात अलहदा है की माज़ी
में जिनका किरदार मशकूक रहा होगा और उसके साथ कुछ ग़लत हुआ तो उसको उसके गुनाहों का
कफ़्फ़ारा या सजा मिली यह सोच कर नहीं लिखा है।
आडवाणी बेहतरीन मिसाल है।
बोहोत से लंगूर और संघी फितरत इस सहाफी से इन्साफ और हक़ के सवाल पर कश्मीरी पंडितों पर हुए मज़ालिमों के ऊपर दोहरा रवैया अपनाने का इलज़ाम लगाते हैं और बोलतें हैं अगर इन्साफ की इतनी पैरवी करते हो तो कश्मीरी पंडितों के ऊपर क्यों कुछ नहीं लिखते। उनको इससे पेश्तर भी जवाब दिया जा चूका है। यहाँ दो बातें वाज़े करना चाहता हूँ।
१. कश्मीर भारत का लाज़मी हिस्सा नहीं है वोह एक मुतनाज़ा हिस्सा है, और कश्मीरी अवाम की मांग है हुर्रियत या तो भारत कश्मीर को अलहदा करे या पाक के साथ ज़म करे फिर अगर कुछ भी ग़लत होता है तो ज़रूर लिखा जाएगा।
२. क्या भारत जमुहरियत मुल्क है और जमहूरी उमूर पर यक़ीन करने वाला मुल्क है या हिटलर और
हुकुम शाही पर काम करने वाला। अगर हिटलर शाही
पर यक़ीन रखता है तो उसमे जंग, खून रेज़ी सब होती है। और वही हो रहा है फिर फ़ौजिओं और
अवाम की हलाकत पर वबेला करने की कोई गुंजाइश नहीं है। और अगर जमहूरी उमूर जम्हूरियत पर यक़ीन करने वाला
मुल्क है तो अवाम की आवाज़ को सुनना होगा और कश्मीर का अवाम क्या चाहता है उसके ऊपर
फैसला करना होगा। कश्मीर का सो फीसद अवाम
अब भारत के साथ नहीं है. क्योंकि उसकी ग़द्दारी गले लग कर पीठ में खंजर उतारने के हिकमते अमली से अवाम आजिज़ आ चूका
है। अब कश्मीरी अवाम को चाहिए अपनी पहचान, यहाँ तक की अवाम के साथ अब तो कश्मीर की
सियसत भी भारत की हुकूमत से अलहदा बात करते हुए देखी जा सकती है।
भारत के तमाम अवाम पर यह बात आशकार हो चुकी है की भाजपा हर वक़्त इंतेखाब से क़ब्ल इस तरह की ग़द्दारी भरी हिकमते अमली करती है। क्योंकि विकास उनके जनखे सियसतदाओं से पैदा नहीं हो सका तो अब लुगाई को कभी मुसलमानों के पास, कभी पाकिस्तान, कभी इस्लामिक जिहादी, कभी लव जिहाद के पास भेजते हैं। ताके अक्सरियत तबके के वोट एक हो सकें और जनखा पार्टी को उसका फायदा मिल सके। इंदौर गरबा में ४ मुस्लिम तालिबे इल्मों पर लव जिहाद पर दहशतगर्द बजरंगदल का बवाल जग जाहिर है.
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