Friday, 28 August 2020

राम मंदिर साबित होगा एक और अज़ाब,

अज़ीज़ नज़रीन,


हिन्दू मज़हबी पाकीज़ा शहर अयोध्या में ग़ैर अख़लाक़ी ग़ैर मय्यारी अमल करदा मामला सामने आया है.  जहां दो ख़ातूनों सीता (ख़याली नाम) और  राधा ने राम मंदिर में शादी कर ली.  हाँ भाई जब राम मंदिर ही ग़ैर अख़लाक़ी और डाका डाली हुई ज़मीन पर बनाया जा रहा है तो शादी वग़ैरा भी राम की नगरी में ग़ैर अख़लाक़ी ही होंगें.  भू माफियाओं पर राम मंदिर ऊपर वाले का अज़ाब साबित होगा, लिख कर रख लो यह मेरी बात.  अभी तो राम के मंदिर में देखो कैसे कैसे कारनामे और बरहना रक्स होतें हैं.  राम मंदिर बनाना बड़ी बात नहीं है लेकिन उनके मर्यादा पुरषात को क़ायम रखना या पालना वोह बड़ी बात है.  और यह मंदिर तो बन ही रहा है ग़ैर अख़लाक़ी तरीक़े कार हिकमत इख़्तेयार कर के डाका डाल कर, दुसरे मज़हब की इबादत गाह को तोड़ कर लाशों पर है.  तो हर काम इस मंदिर में ग़ैर अख़लाक़ी ही होगा.

लाशों का हिसाब करो जब से यह तनज़िया हुआ है तब से ले कर अब तक कितने जहांबाक़ हुए, कितनो को मंदिर के नाम पर क़त्ल कर दिया गया.  जिस काम की इब्तिदा ही गलत हो और शुरू में ही बदशकुनी हो जाए वोह चीज़ कभी परवान नहीं चढ़ती और खुशी सुकून फ़राहम नहीं कर सकती.  ठीक उसी तरह जिस तरह से हिन्दू दहशतगर्दों के तरबियती इदारों में शिद्दत पसंद हिन्दुओं के घरेलू माहौल में एक तालिबे इल्म के हाथ में क़लम के बजाए तलवार दे कर ख़ून ख़राबा चोरी डकैती एक मज़हब के खिलाफ नफरत सिखाई जाती है, ज़ेहनों में ज़हर और आलूद भरा जाता है.  फिर ऐसे तरबियती इदारों से ख़ारिज ज़हरीले मवादी शख्स से उम्मीद रखी जाए की वोह अदलिया की कुर्सी पर बैठ कर इन्साफ करेगा तो ऐसी उम्मीद करने वाला जाहिल ही होगा. वोह बच्चा बड़ा हो कर सिर्फ क़त्ल करेगा और दहशतगर्द बन कर दहशत ही मचाएगा. ऐसा तलवार बाज़ इन्साफ की बात कभी नहीं कर सकेगा बल्कि उसको तो मज़हब के नाम पर तलवार से क़त्ल करने में महारत होगी.  ऐसा दहशतगर्द इंसान क़लम से फैसले करने के बजाये अपने फैसले में लाखों लोगों की गर्दन का नज़राना बख़ूबी पसंद होगा.   

 

भले ही इन इंसानी लाशों और सरों की फेहरिस्त में उसके अपनी क़ौम के लोगों की तादात बे शुमार हो.  ठीक उसी तरह से जिस तरह से मंदिर के बनने से पेश्तर और इस तनज़िया के आग़ाज़ के बाद ही लाखों लोगों की जान चली गई,  इन्साफ का क़त्ल हो गया, क़ुदरती क़ेहर १९९२ से डराने लगा, किल्लारी से ले कर तो करोना तक क़ुदरती क़ेहर आ रहा है; लेकिन मुझको मेरा मक़सद इंसानी सरों का पूरा करना है. मुझे मेरी अना को क़ायम रखना है, उसके लिए मुझे कोई भी क़ीमत चूकानी पड़े चलेगा.  वतन की माशियत भलें ही तबाह हो जाए, क़दीमी असासे फ़रोख़्त हो जाए तब भी चलेगा. फिर उस मंदिर के तामीर होने के बाद खुशहाली आएगी इसका ज़ामिन कौन है.  जो सोचतें हैं की मंदिर की तामीर के बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा ऐसी उम्मीद करने वाले जाहिल हैं, अनपढ़ हैं पंचर बाज़ हैं.  खुशहाली मंदिर के बनने या ना बनने से नहीं आती बल्कि इंसान के किरदार, इन्साफ पसंदी हर मज़हब की इज़्ज़त, इंसानी जान की हिफाज़त, मस्तूरातों की इज़्ज़त करने से आती है.  तालिबे इल्मों को दुरुस्त इल्म देने और उनकी सही रहनुमाई करने से आती है.  ना की उनके हाथों में क़लम देने के बजाये बंदूक, तलवार देने से आती है. और ना ही किसी ख़ास मज़हब के मानने वालों के ख़िलाफ़ ज़हर और आलूद भर कर आती है. ना ही बेईमानी डाका डाल कर इन्साफ का क़त्ल कर के, इंसानी लाशों पर किसी और के मज़हबी घर को तोड़ कर अपने पेशवा का मंदिर बनवाने से आती है.

राम कभी भारत में पैदा हुए ही नहीं थे. ज़बरदस्ती आप उनको यहाँ घुसडे जा रहे हो. अब तो ऐसा ख़ुद हिन्दू मज़हबी रहनुमा श्री श्री धुरेन्दर नाथ जी और दीगर हिन्दू दानिशमंदों का भी सोचना है. इस सहाफी का मानना है भारत जैसे दहशतगर्द, कपटी, फ़िरक़ापरस्त, ना इन्साफ, क़ातिल, दरिंदे मुल्क में राम जैसे अज़ीम हिन्दू रहनुमा कैसे पैदा हो सकतें हैं. वोह तो नेपाल जैसे अमन पसंद मुल्क के हो सकतें हैं.  अगर राम भारत में पैदा हुए थे तब भी अक़ीदतमन्दों का यह आलम है.  उनकी फ़िरक़ापरस्ती, ना इंसाफ़ी, दहशतगर्दी से ख़ास लोग उनके आक़ा के बारे में सोचतें होंगे की उनका क्या आलम होगा. दूसरी बात अभी तो सिर्फ मंदिर की बात शुरू हुई और कोविद से ६५००० और जनवरी २०२० से ले कर तो आज अगस्त २८, २०२० तक रोड हादसात, ख़ुदकशी, एक ने दुसरे को गोली मारी और क़ुदरती क़ेहर से कम से कम १५ से २० हज़ार लोग हलाक हुए. जब मंदिर बनी तो बड़ी तबाही तब आएगी, जब डाका डाली हुई ज़मीन पर दुसरे की इबादत गाह को तोड़ कर भू माफ़िया का मंदिर बयाना जा रहा है. तमाम भू माफिया डाकू लूटेरे मारे जायेगे. जिन्होंने मस्जिद को लूट कर मंदिर बनाया या बनवाने में मदद की इम्दात  किया या उसको उस ही जगह मस्जिद की ज़मीन पर बनवाने की हिमायत किया.

अगर मंदिर के बनने से ही सब कुछ होता तो तमाम अरब देशों में कितने मंदिर हैं. सऊदी में तो एक भी नहीं है. लेकिन आज अगर सऊदी शेख या कोई और अरब देश का बादशाह अपनी गलाज़त भी देगा तो मोदी और भक्त उस मल को भी उठा कर अपने मंदिर में सजा कर रख देंगे.  फिर पाकिस्तान में इमरान के आने के बाद २ तेल और बड़ी तादात में नेचरल गैस के सरमाये कैसे मिले और तुर्की में भी वही हुआ.  ठीक है बना लो मंदिर देखते हैं भारत को तेल के सरमाये मिलते हैं या भारत तेल में जल कर राख होता है. 

सहाफी जुबेर 

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