अज़ीज़ नाज़रीन,
आज समाज और अहले वतन के दो एहम मुद्दों को ले कर आपके रू बरू आया हूँ. एहले हिन्द में अमूमन मुस्लिम अवाम को ख़ास तमग़े से मुनसलिक कर दिया जाता है और वोह है "ग़द्दार". सयासत की बात की जाए तो किसी भी मुस्लिम ख़ास जमात को अक़लियतों की निस्बत से हक़ गोई करने के ऊपर बीजेपी की "बी" टीम बोल कर रूसवा और ज़लील किया जाता रहा है. उसी हिसाब से अगर कोई सियासी जमात क़ानून, अदलिया या एवान के तोर तरीक़ों पर तनक़ीद करता है या हुकूमत की कारगरदेगी पर ऊँगली उठाता है तो उसको ग़द्दारे वतन बोल कर तोहमत लगाईं जाती है.
जहाँ तक इस सहाफी की ज़हानत और उसको
जो इल्म है उसके हिसाब से इसका फलसफा और ऊपर ज़िक्र एहले
हिन्द के ग़द्दारी के फलसफे से ज़रा अलहदा और मुख़्तलिफ़ है. उम्मीद है
आपमें से काफी कुछ इस सहाफी की राये से इत्तेफ़ाक़ रखते होंगे.
लफ्ज़ "गद्दारी" को दो हिस्सों
में तक़सीम कर सकतें हैं.
१. सियासी गद्दारी।
२. मज़हबी गद्दारी।
चलिए आईये अब ज़रा इन तब्सिरों और तोहमतों की ज़राहत करते हैं.
सियासी गद्दारी: किसी भी सियासी तंज़ीम की हक़ गोई को या किसी ख़ास फ़रीक़ की नुमाइंदगी या उसके हक़ की बात करने को ग़द्दारी तस्सव्वुर करना अहमक़ाना और फ़ितरी सोच है. आज कल मुल्के हिन्द में तमाम नाम निहाद सेक्युलर तंज़ीमे (कांग्रेस, सपा, बसपा, एन.सी.पी., एल.जे.पी., आप, जनता दल नितीश) जिनका किरदार हमेशा से अक़लियतों के मुद्दों (ख़ास मुस्लिम) पर राये शुमारी की वक़्त हमदर्दी लेने की होती है. ऐसा महसूस होता है की इनसे बड़ा मुस्लिम हमदर्द और कोई दूसरा है ही नहीं. लेकिन जब असल मुस्लिम मुद्दों पर काम करने का वक़्त आता था या अमल करने का वक़्त आता है तो यही सेक्युलर तस्लीम की जाने वाली तमाम तंज़ीमे ग़द्दारी कर के मुस्लिम और अक़लियतों की पीठ में खंजर घोप देती हैं. फिर जब उन मुद्दों पर बेहेस और मुबाहिसे में ऐ.आई.एम.आई.एम. के नुमाइंदे या तंज़ीम के सरबराह असदुद्दीन इन सेक्युलर समझे जाने वालों की हजामत करतें हैं तो उनको बीजेपी की "बी" टीम बोला जाता है. संघ का एजेंट तस्लीम किया जाता है. पैसे खा कर ऐसे बयानात दे रहे हो. उसके ऊपर ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियाँ आतिश में पेट्रोल डालने का काम करतें हैं. जो इन सेक्युलर तंज़ीमों के इलज़ाम वोट कटुआ को सही और दुरुस्त ठहराते हैं. सही देखा जाए तो यही नाम निहाद सेक्युलर तंज़ीमें जो अपने आपको मुस्लिम मुहाफ़िज़ बोलती हैं वही असली ग़द्दार हैं. क्योंकि इन्होने मुस्लिम मफ़ात की ज़िम्मेदारी पर राये शुमारी में हिस्सा लिया और ज़ेरे दस्तूर हलफबरदार हुए, फिर इंतेखाब ख़त्म होने के बाद यह तमाम सेक्युलर तंज़ीमे कैसे घिरघिट के जैसे अपना रंग बदलती हैं.
२०१४ के बाद से उन तमाम पेचीदा मसलों पर चाहे वोह बाबरी मस्जिद हो, ट्रिपल तलाक़, कश्मीर ३७०, स्याह क़ानून "का" जिनसे मुस्लिम मज़हबी और जज़्बाती ताल्लुक़ था उन सभी मुद्दों पर इन तमाम नो निहाद सेक्युलर तंज़ीमों ने ऐवान में ग़द्दारी की, बीजेपी का साथ दिया और दस्तूर की रूह का क़त्ल कर के वाक आउट किया. फिर किस बुनयाद पर यह सेक्युलर तंज़ीमें असदुद्दीन और उनकी तंज़ीम पर बीजेपी की "बी" टीम होने का इलज़ाम तराशी करतीं हैं. अमल तो इनका "बी" टीम जैसा है.
अब कांग्रेस की जानिब आतें हैं जो की
मुल्क की सबसे बड़ी मुख़ालिफ़ तंज़ीम है. जो टीवी मुबाहिसों और बेहेस में पुर
ज़ोर अंदाज़ में असद पर बीजेपी की बोली बोल रहे हो आप तो बीजेपी
की "बी" टीम हो ऐसे इल्ज़ामात लगाने में सरे फेहरिस्त होती
थी. कांग्रेस की भी मुस्लिम नस्ल कुशी की एक स्याह तारिख
रही है. बरहाल अभी तमाम बातों का तब्सिरा करने के बजाये २०१४ से आगे की
बात करतें हैं. २०१४ के बाद कितने ऐवाने पार्लिअमान और रकूने
असेम्ली कांग्रेस के सेक्युलर उसूलों पर मुंतखिब हो कर आये फिर बीजेपी की गोंद में
जा कर बैठ गए. जो सिलसिला गोवा से शुरू हुआ था वोह राजिस्थान तक क़याम
रहा. अब तो कांग्रेस मज़ीद बड़ी परेशानी में मुब्तेला है. अवामी सतह पर तबसिरे होने
लगे हैं मरकज़ी नुमाइंदगी के ऊपर बीजेपी से सांठ गाँठ होने के सबूत मिल रहे हैं.
तो यह है असली गद्दारी.
इन सेक्युलर तंज़ीमों को हक़ गोई की कही हुई बात, तनक़ीद पसंद नहीं है. यही लोग अभी तक अपने हलके के पसतमंदा अवाम के महज़ वोट के ऊपर सियासत करते थे, और उनके मसाइल और मुद्दे हल करने पे एक दम पीछे रहते थे. अब किसी तंज़ीम ने जब हक़ की बात कही, गुजिश्ता ७० सालों का हिसाब किताब माँगा तो लगा दिया इलज़ाम की आप तो संघ की बोली बोल रहे हो. आप तो बीजेपी की "बी" टीम हो आप तो मुस्लिम वोट पर सेंध लगा रहे हो. क्योंके इन सेक्युलर तंज़ीमों को अब या तो मुस्लिम मफ़ात के काम करना होंगे या जाना होगा. फिर अब यह तंज़ीमे मुसलमानों को महज़ वोट बैंक के जैसे इस्तेमाल नहीं कर सकते. और ऐसे ही सियसतदाँ जो अपने फ़र्ज़ से गद्दारी करतें हैं. हलफ तो दस्तूर पर लेते हैं लेकिन ऐवान में दस्तूर के बुनयादी ढाँचे को तोड़ने वालों के साथ हम क़दम दिखतें हैं. और हर उस मुद्दे पर ज़ाफ़रानी तंज़ीम के हमक़दम राये रखतें हैं, जो दस्तूर की या अक़लियतों के हुक़ूक़ की खिलाफवर्जी करता है. भले ही दस्तूर की ख़िलाफ़वर्ज़ी हो जाए. और ऐसे ही सियासतदां गद्दार हैं. सियासी गद्दार।
मज़हबी ग़द्दारी: मज़हबी ग़द्दारों की फेहरिस्त और दर्जे में वोह लोग आतें हैं जो अपने मज़हब के उसूलों और क़ानूनों को नहीं मानते उसकी ख़िलाफ़वर्ज़ी करतें हैं. फिर भी दावा की गर्व से कहो हम हिन्दू हैं. शान से कहो में मुसलमान हूँ. मुसलमान होने पर नाज़ है. इस तरह के ग़द्दारों में तमाम सियासतदां तो होतें ही हैं बरक्स इसमें अवाम का एक बड़ा तब्क़ा भी होता है. इस्लाम में हर वोह जुर्म जो शरीयत की रूह से गुनाहे कबीरा है फिर भी एक मुस्लिम अल्लाह के क़ानून की ख़िलाफ़वर्ज़ी करता हैं और अपने आपको इस्लामिक या मुसलमान होने का दावा करता है तो वोह ग़द्दारे मज़हब है.
आज मुस्लिम माशरे में बड़ी तादात में शराबख़ोरी, चोरी दग़ाबाज़ी, जालसाज़ी, फरेब, धोका, झूट, ग़ैर मज़हबी शादी (ज़िना) जैसे अमल मौजूद हैं. फिर भी शान से गोश्त खा कर कहो हम मुस्लिम हैं. सियासी तंज़ीमों के रहनुमा इल्ला माशाल्लाह सभी ग़द्दार हैं. ख़ास जुम्मनों के किरदार को फरामोश नहीं कर सकता के वोह कितने बड़े ग़द्दार हैं. बीजेपी से मुनसलिक हर मुस्लिम, मज़हबी ग़द्दार है. क्योंकि बीजेपी का हर अमल बाबरी मस्जिद से ले कर तो ईदे क़ुर्बान तक मुस्लिम अवाम के मज़हबी और जज़्बाती मुद्दों पर इज़ा पहुंचाने वाला होता है. और जितने भी जुम्मन हैं वोह सभी ऐसी भेड़ें हैं जो सिर्फ सर को नीचे रख कर इन पेचीदा मुद्दों पर हक़ बयानी करने के बजाये बीजेपी की बोली बोलते हैं. हाल ही में मरकज़ निजामुद्दीन तब्लीग़ी जमात पर ज़ाफ़रानी लंगूरों ने जो उधम मचाया था उसके बाद वज़ीरे अक़लियत मुख्तार अब्बास नक़वी के जमात पर जो तास्सुरात थे वोह बेहद तशवीशनाक हैं. मौलाना साद साहब पर बेहूदा बयानबाज़ी और उनकी गिरफ्तारी करने की मांग के बाद उनकी शान में नाज़ेबा अलफ़ाज़ बोलना, वोह क्या है. वही है मज़हबी गद्दारी और ऐसे मुनाफिक़ ही कहलाते हैं, "मज़हबी गद्दार".
ऐसा नहीं है की मज़हबी गद्दार सिर्फ इस्लाम में मौजूद होतें हैं. नहीं, वोह तो हर मज़हब में हैं. हिन्दू मज़हब में भी ऐसे अनासिर देखे जा सकतें हैं. जो राम के नाम पर क़त्ले आम करतें हैं. एक मुसलमान, क्रिस्टी, दलित को पकड़ कर लाठी, डंडों से पीटना और तलवार की दहशत से उसको उनके मज़हब के ख़िलाफ़ नारा लगाने पर ज़ोर डालना. "जय जय ........" यह क्या है, यही है मज़हबी ग़द्दारी. ऐसा हिन्दू मज़हब में कहाँ कहा गया है, की राम के नाम पर अवाम के साथ दहशतगर्दी करो. तलवार के ज़ोर पर राम के नाम पर हिन्दू मज़हब फैलातें हैं.
जो लोग राम मंदिर पर डाका डाल कर मंदिर बना रहे हैं, वोह तमाम मज़हबी ग़द्दार हैं. क्योंकि यह बात किसी से पोशीदा नहीं और सुप्रीम कोर्ट में साबित हुई है की रात की तारीकी में मस्जिद में मूर्तियां रखी गई. मस्जिद को गिरा कर मंदिर बनाना किस राम को पसंद होगा. किसी दुसरे की इबादत गाहा पर डाका डाल कर अपने मज़हबी पेशवा का घर बनाना मज़हबी ग़द्दारी है.
गौ मॉस और गौ हत्या पर जो हिन्दू और गौ
रक्षक, भक्षक बन कर दहशत मचाते हैं वोह सभी मज़हबी ग़द्दार हैं. इनको जो गायें
हर रोज़ हिन्दू क़तल ख़ानों में क़तल कर के बेरुन मुल्क भेजी जातीं हैं, तब गौ प्रेम नहीं दीखता, तब लोग यह कैसे
खामोशी इख़्तेयार कर लेते हैं. जो गाये गोशाला में मौत की आगोश में चली जा
रहीं हैं उस पर काहे को ज़रूरी इक़दाम नहीं करते यह गौ रक्षक. एक पर वार दुसरे पर इक़रार। यह सभी मज़हबी ग़द्दार हैं.
इनका मज़हब से कहीं से कहीं तक कोई ताल्लुक़
नहीं होता है. इन लोगों को इब्तेदा तक नहीं मालूम होती हैं.
चाहे वोह जुम्मन हो जो तब्सिरों और मुबाहिसों में बड़े बड़े इस्लामिक फलसफे देतें
हैं या वोह हिन्दू हों जो गौ माता, राम मंदिर, राम राज पर बड़े बड़े फलसफे और
नज़रिया देतें हों. ऐसे अनासिरों का मज़हब से कोई ताल्लुक़ नहीं होता है.
यह लोग पैसे के पुजारी और इबादत गुज़ार हैं. आज जुम्मानों को संघ और
बीजेपी से मुस्लिम और इस्लाम मुख़लिफ़ बयानात और अमल के लिए पैसे मिल रहें हैं तो
वोह मुस्लिम मुख़ालेफ़त में आमादा हैं. वही कल से अगर पुजारी और राम,
गौ भक्तों और फरेबी वतन परस्तों को कोई बड़ी तंज़ीम लाखो
करोड़ों दे देगी तो यह लोग अपने ही मज़हब और वतन की ख़िलाफ़वर्ज़ी करने
लगेगें.
क्योंकि जो जुम्मन बाबरी की मुख़ालेफ़त में
राम मंदिर की मुवाफ़ेक़त करता हैं, जो गौ हत्या पर अलग ही नज़रिया रखता है की
हिंदुस्तान में नहीं मिलेगा पाकिस्तान या अरेबिया जाओ तो वोह ज़्यादा पैसे
मिले तो कुछ और बयान दे देगा. वहीँ जो हिन्दू राम के नाम पर फरेब मचाते हैं
झूट को सच और सच को झूट साबित करने में लगे होतें हैं ऐसे फरेबी और जालसाज़ों को ज़्यादा रक़म मिली तो वोह राम को ही बेच देंगे.
इस सहाफी के फलसफे के हिसाब से
सियासी ग़द्दार से ज़्यादा खतरनाक और ज़हरीला मज़हबी ग़द्दार होता है. क्योंकि
सियासत में सब कुछ चलता है. लेकिन मज़हब के बुनयादी क़ानून की ख़िलाफ़वर्ज़ी करने
वाले की दीन और दुनियां दोनों ग़ारत हो जाती हैं और वोह ना ही दीन के काम का रह जाता
हैंऔर ना ही दुनिया के काम का.
और ऐसे ही मज़हबी क़ानून (इस्लाम और हिन्दू) की ख़िलाफ़वर्ज़ी करने वाले दोनों ही जुम्मन और हिन्दू "गद्दार" हैं. जो बात राम को पसंद नहीं वोह राम के ऊपर लाद कर करना, दीप से दीप जलायेगे मंदिर वही बनायेगे, सौगंध राम की खातें हैं मंदिर वही बनायेगे. तो क्या राम ने आ कर कहा था, की डाका डाली हुई ज़मीन पर मेरा मंदिर बाना लो. क्या राम ने कहा था दुसरे की इबादत गाहा को तोड़ कर मेरा मंदिर बना लो. "मज़हबी गद्दार".
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