अज़ीज़
नाज़रीन,
आज कल जो मुल्के हिन्द के हालात हैं बोहोत ही पेचीदा हैं. २०१४ से २०१९ तक अवाम जो हुकूमत के मुख़ालिफ़ बोलता था उसको मौत के घाट उतार दिया जाता था. लेकिन ज़ाफ़रानी महाज़-२ में, अब तो सियसतदाँ अगर मुख़ालेफ़त में बोलेगे तो उनको सीधा गोली नहीं मारी जाएगी. बल्कि साजिश के तहत ऐसे हालात पैदा कर दिए जायेगे की उनकी मौत हो जाए. राजिव त्यागी के साथ जो कुछ भी हुआ वोह महज़ एक हादसा नहीं था. बल्कि सोची समझी साजिश के तहत उनका क़त्ल किया गया है. जहाँ तक इस सहाफी और उसकी टीम ऑटोनोमस जौर्नालिस्ट ने जानकारी निकाली है उससे साफ़ ज़ाहिर हो रहा है की त्यागी के सामने ज़ाफ़रानी महाज़ का स्पोक पर्सन और ज़ाफ़रानी सहाफी की सख़्त ज़ुबानी और तल्ख़ लहजे ने उनका क़त्ल किया. दोनों, तीनो, चारों ने मिल कर उनका मोब लीच किया है. दूसरी एक और बोहोत ही एहम खुलासा करता हूँ. बेंगलोर का वाक़िया भी इस मुद्दे से जुड़ा हुआ है. और उनके क़त्ल पर ज़ाफ़रानी पार्टी और उसका स्पोक पर्सन, साहाफी चारो जानिब घिरे तो उस तपिश को ठंडा करने के लिए पैगम्बर की शान में ग़ुस्ताख़ी की गई. अब उसका पूरा फायदा बोलने की आज़ादी को ले कर ज़ाफ़रानी पार्टी उठा रही है. ताके त्यागी के खून को महज़ एक हादसा क़रार दिया जा सके. और बैंगलोर की आतिश में सब कुछ जल कर राख हो जाए. जब मुस्लिम अपने पैगम्बर की शान में पूरा बंगलोर आतिशे नार कर सकतें हैं तो मुल्क की दिफ़ा के लिए क्या हमारे स्पोक पर्सन सख़्त अलफ़ाज़ का इस्तेमाल नहीं कर सकते. लेकिन फ़र्क़ है. मज़हबी और सियासी शख़्सियत में ज़मीन आस्मां का फ़र्क़ होता है. दूसरी बात राजिव त्यागी की हत्या एक सोची समझी साजिश थी. उस साजिश और क़त्ल के ऊपर कफ़न पैगम्बर की शान में गुस्ताखी कर के की गई. लेकिन उसके बाद के जो बंगलोर में हालात हुए वोह अवाम के जज़्बात और उनका गुस्सा था. हर बद अमली, खून, दहशत में ज़ाफ़रानी तंज़ीम उसके कारिंदे और खरीदे हुए सहाफी, पुलिस, फौज शामिल हैं अवाम नहीं. अवाम ने वही किया जो उसको करना था.
सख़्त
घडी है आई,
यह
कैसी भगवा आंधी आई,
अपने
साथ तबाही लाई.
एक
ही मज़हब एक ही खून
फिर
कियूं करते हो लड़ाई
मौतों
के सौदागर बन गए हो तुम आज
जो
कभी करते थे अमन की बात
ख़रीद
लाये कफ़न भी साथ
कर
दिया खूने जिगर
त्यागी
मर्यादा
सहाफत
हो या सयासत
सब
ने कर दिया बर्बाद भारत
कहने
ना देते हो, वोह बात, जो है हुकूमत के ख़िलाफ़
फिर
करते हो दावा की हम है आज आज़ाद.
हर
उस आवाज़ को दबा डाला,
हर
उस आवाज़ को कर दिया क़ैद
जो
करते थे हक़ की बात
तालिबे
जामिया, मशरिक़ या शुमाल
अलीगढ़
हो या जवाहरलाल
सहाफत
या हो सियासत
जो
करे तुम पर तनक़ीद या हक़ की बात
कर
दिया उसको क़त्ल या पस्त
लगा
कर मज़हबी इलज़ाम, तिलक या गद्दार
जिस
आज़ादी में अवाम कर ना सके हुकूमत के ख़िलाफ़ दिल की बात
ऐसी
आज़ादी से तो कई गुना अच्छी थे गुलामो वाली बिसात
उस
दौर में एक आस थी एक उम्मीद थी के होंगे हम कामयाब
होंगे
हम एक दिन आज़ाद.
आज
बोहोत तनहा हूँ.
ना
ही कर सकता हूँ अपने दिल की बात
ना
ही कर सकता हूँ हुकूमत के ख़िलाफ़ एहतेजाज
किस
के साथ बनाऊं जश्ने आज़ादी
कैसे
कहूँ में हूँ आज़ाद.
अब
तो ना कोई उम्मीद रही बाक़ी
ना
है कोई राह गुज़ार
चारो
तरफ अमवात हैं, तारीकी है
मायूसी,
ना उम्मीदी, और है ख़ामोशी
फिर
भी शान से कहो
तुम्हे
मुबारक हो आज़ादी.
सहाफी जुबेर

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