इस सहाफी का मई २०१९ को लिखा गया बुर्क़े पर एक तल्ख़, मज़मून। इस्लाम के इब्तेदाई दौर में जिस तरह से मुनाफ़िक़ हर मुमकिन कोशिश करते थे इस्लाम और मुसलमानों को ईज़ा पहुंचाने की, वही सूरते हाल आज कल हिन्द में भी है। काफ़िर शिद्दत पसंद, संघी दहशतगर्द, बीजेपी के अनासिर कभी दाढ़ी बढ़ा टोपी लगा कर तो कभी अपने घर की आवारा लौंडियों को बुर्क़ा पहना कर ऐसा काम करवातें हैं जिससे बदनाम एक नमाज़ी परेहज़गार मुसलमान और बुर्कापोश मुस्लिम बेहेने हों। जैसे रमज़ान शरीफ में दाढ़ी टोपी पैजामे कुर्ते वाले मर्द और बुर्क़ापोश हिन्दू आवारा बद्ज़ात औरतें अवामी सतह पर खाते पीते देखे जातें हैं। क़सदन मुस्लिम अवाम के सामने आ कर बैठते हैं और खाना पीना शुरू कर देतें हैं। और यह महज़ ज़ुबानी जमा ख़र्च नहीं ऐसी कई संघी अनासिरों को दीफाई फोजों ने पकड़ा है। कुछ हिन्दू लड़कियों को बुर्क़े में मंदिरों में जाते हुए तो खुद हिन्दू भाइयों ने पकड़ा और वीडियो बना इस बात की तस्दीक़ की के वोह हिन्दू थी लेकिन हमारी मुस्लिम बहनों को बदनाम करने के लिए बुर्का पहना बाद में ऐसी बदचलन और आवारा लड़कियों को पुलिस के हवाले किया। कुछ हिन्दू लड़कियों को बुर्क़े में अपने टीका लगाए बॉय फ्रेंड के साथ मजलिस के मुहाफिजों ने हैदराबाद, बैंगलोर, औरंगाबाद, मालेगाव में पकड़ा था। ऐसी तमाम वीडियो पहले ही यह सहाफी अपने मज़्मूनों के साथ शाया कर चूका है।
Wednesday, 1 May 2019
बुर्क़े की सियासत रंग लाएगी.......
जिस
तरह से बीजेपी और ज़ाफ़रानी महाज़ को ट्रिपल तलाक़, गौकुशी, कसरते अज़वाज पे ज़लील और ख़्वार
होना पड़ा है अब बारी बुर्क़े की सयासत की है.
हालांकि ये सहाफी ऊपर निशानदेही किये हुए मुद्दों पे बीजेपी से मुख्तलिफ राये
रखता था और उन मुद्दों पे मुस्लिम अवाम के मुवाफ़ेक़त में उनके साथ शाना बा शाना खड़ा
था जिसको के बीजेपी ने अपनी विक़ार का मुद्दा तस्लीम कर के आला दर्जे तक जा पहुंची थी. फिर इस फेहरिस्त में बीजेपी ने हद दर्जे की ज़लील
हरकतें करना शुरू की और हिन्दू मस्तूरात को बुर्का पहना के हद दर्जे की इस्लाम, मुस्लिम
अवाम और मौलानाओं की जमात के खिलाफ ज़हर अंगेशी करवाई. उन मुस्लिम ख्वातीनों को मिडिया के रू बरू पेश
किया जिनका इस मुद्दे से कुछ भी ताल्लुक़ नहीं था.
कुछ को बीजेपी से टिकट की पेशकश की गई.
फिर झूटी और फरेबी ऑफ.आई.आर. का दौर शुरू किया गया. हर दुसरे रोज़ ऐसी खबरे आम
हो गई जहाँ किसी ना किसी मस्तुरात को ट्रिपल तलाक़ दे कर उसके शोहर ने घर से निकाल दिया. बिल आखिर बीजेपी की हर ततबीर, मुनाफ़िक़ों की हर मदद
ना काफी साबित हुई और जो मस्तुरात इस्लाम के क़वानीन को तब्दील करने की गलीज़ और कमज़र्फ
सोच रखती थी हस्बे मंशा ज़लील और रूसवा हुई और सुबह क़यामत तक उनके गलों में लानत का
तोग डाल दिया गया. इसलिए नहीं की उन्होंने
इस्लाम के कानून की खिलाफवर्जी की या शरीयत में तब्दीली की वकालत की थी, बल्कि इसलिए
की किसके बहकावे में आ कर की और किसके इशारे पे की थी.
ट्रिपल
तलाक़, गौकुशी के बाद अब बारी बुर्क़े की थी.
यहाँ पर भी ये सहाफी बीजेपी से मुख़्तलिफ़ राय रखता है. बीजेपी बुर्क़े के साथ किसी भी किस्म की छेड़ छाड़
नहीं करना चाहती है जबकि ये सहाफी खुले आम बुर्क़े पहन के गलीज़, गन्दी और बेहयाई करने
पर उसपे पाबन्दी लगाने की हिमायत करता है.
आज
जितना बुर्क़े को ज़लील एक पर्दा नशीन औरत ने नहीं किया उससे ज़्यादा हिन्दू लड़कियों और
मस्तुरात ने किया है. दूसरी जमात उन मुस्लिम
ख्वातीनों की है जो बुर्क़े की आड़ में अपने सियाह कारनामों, बदबख़्तियों और बदकारिओं को पोशीदा रखना चाहती हैं. आज कल हिन्दू लड़कियाँ कस्दन बुर्का पेहेन कर मंदिरों
में और ऐसी अवामी जगह जाती हैं जहाँ जाना इस्लाम की रूह से हराम और गुनाहे कबीरा है. दूसरी बात कुछ मस्तुरात और लड़कियाँ बुर्का पेहेन
के अपने आशिक़ के साथ अय्याशी करती हैं. खुले
आम बोस किनार और बगल ग़ीर होती हुई पाई जाती हैं. अपने पोशीदा आज़ा को उसको हाथ लगाने
देतीं हैं और उसके ज़ाती हिस्से (शर्म गाह) को ना सिर्फ छूती है बल्कि शहवत के साथ पकड़ती हैं. फिर अगर ये सब करना ही था तो बुर्क़े का कफ़न डालने
की क्या ज़रूरत है. बुर्का मक़सद होता है अपने
जिस्म को एक ग़ैर मेहरम की गलीज़ और गन्दी निगाह से पाक, मेहफ़ूज़ और शैतानी फ़ैल से अपने आपको मेहफ़ूज़ रखना. फिर अगर वही सब कुछ बरहना अंदाज़ में अवामी हलकों
में दुनिया की नज़रों के सामने करना था तो बुर्क़े की पोशीदगी का नाटक क्यों. और ऐसा करने के पीछे का मक़सद क्या है. क्या तुम्हारे
इस एक अमल से जो हज़ारों पर्दा नशीन बहनें हैं जो अपनी इज़्ज़त ग़ैर मेहरम और शैतानी नज़रों
से अपने आपको मेहफ़ूज़ रखना चाहती हैं उनकी पाकीज़गी पे भी दुनिया शक नहीं करेगी. और जिस अंदाज़ में तुम एक ग़ैर मेहरम को लुत्फ़ अन्दोज़
कर रही हो तो क्या तुम्हारी इस ना ज़ेबा हरकत से हज़ार पर्दा नशीन लड़कियों की इज़्ज़त पामाल
नहीं होगी. दुनिया तो उनको भी उसी नज़र से देखेगी
जिस अंदाज़ में उसने तुमको देखा है. इस मुद्दे
पे इस सहाफी ने आज तक की एक डिबेट में अपनी राय रखी है.
1 hr ·
सही बात है बुर्क़े पे बैन का समर्थन करता है ये पत्रकार. आज बोहोत सी हिन्दू लड़किया जान बूझ कर बुर्का पेहेन कर मंदिरों और दिगर ऐसी जगह जातीं हैं जहाँ मुसलमानों
को
जाना
सख्त
मना
है,
जिससे
इस्लाम
बदनाम
होता
है.
और
देखने
वाले
का
पहला
तास्सुर
इस्लाम
की
निस्बत
से
गलत
होता
है.
दूसरी
बात
ये
बदचलन
और
आवारा
लड़किया
मस्तुरात
बुर्का
पहन
के
अपने
बॉय
फ्रैण्डों
के
साथ
अय्याशी
करती
हैं.
सावर्जनिक
स्थानों
पे
उसके
साथ
मू
काला
तक
करने
से
बाज़
नहीं
आती.
ऐसी
सूरत
में
आम
देखने
वाले
का
तास्सुर
मुस्लिम
मस्तुरात
के
लिए
गलत
होता
है.
अगर
बैन
नहीं
किया
जाता
है
तो
बुर्का
खरीदते
वक़त
पैन
कार्ड
और
आधार
कार्ड
ज़रूरी
कर
देना
चाहिए.
फिर
अगर
कोई
हिन्दू
या
मुस्लिम
बुर्का
पेहेन
के
बदचलनी
करते
हुए
या
किसी
और
ऐसे
फ़ैल
में
पाई
जाती
है
जो
मुल्क
या
इस्लाम
की
निस्बत
से
गुनाहे
कबीरा
है
तो
उसको
तो
सजा
होना
ही
चाहिए
बल्कि
जिससे
उसने
ने
बुर्का
लिया
या
जिसने
उसको
बुर्का
फ़राहम
किया
उसके
ऊपर
भी
सख्त
सजा
का
प्रावधान
होना
चाहिए.
इस
लेन
देन
में
दुकानदार,
ताजिर
दोस्त
पड़ोस
भी
शामिल
होना
चाहिए.
क़्योंके
कभी
कभी
दोस्ती
खाते
में
या
पास
पड़ोस
में
रहने
वाले
किसी
भी
मुस्लिम
से
बुर्का
उधार
ले
लिया
जाता
है
और
बदकारी,
बदबख्ती
कर
के
उसको
वापिस
लौटा
दिया
जाता
है.
पकडे
जाने
पे
ऐसे
देने
वालों
पे
भी
कारवाही
होना
चाहिए.
बुर्का पे अगर हुकूमते हिन्द पूरी तरह से पाबन्दी नहीं लगाती है तो जैसा की अपनी राय इस सहाफी ने आज तक पर रखी है उसको इस्तेमाल
करने वाली और पहनने वालीयों पे
कुछ सख़्त शराइत लगाना चाहिए. आज बुर्का तो पर्दा नशीन मस्तुरात कम और बे हया, आवारा किस्म की औरतें ज़्यादा ही पेहेन रही हैं.
क्योंकि जिसको अपनी इज़्ज़त, इस्लाम और शरीयत का एहतेराम होगा, वो
बुर्क़े में क्या अगर बग़ैर बुर्क़े में है और कोई ग़ैर मरहम उसको सिर्फ गलीज़ निगाह से
भी देखेगा तो उसकी आँखे नोचने का माद्दा रखतीं हैं. फिर उसको अपने आपको मेहफ़ूज़ दिखाने के लिए एक काले कम्बल में लपेटने की ज़रुरत ही नहीं है.
शुरफ़ा को बुर्क़े की अज़मत मालूम होती है लेकिन जो गैर ज़रूरी अनासिर है (ओमुमन गैर मुस्लिम लड़किया और मुनाफ़िक़ों
की जमात) जो बुर्क़े की आड़ में काली करतुत करती हैं उसके ऊपर हुकूमते हिन्द को सख़्त होने की ज़रुरत है.
ट्रिपल तलाक़ मुद्दे पे जितनी भी मस्तुरात
थी टी वी के सामने अपने मज़हब की नुमाइश लँगूरनियों
के बहकावे में आ कर करवा रही थी वो सब नक़ाब पौश थी. अब ऐसे बुर्क़े का क्या फ़ायदा जो पराये मर्दों से बेहेस करे और शरीयत को ख़त्म करने की वकालत करे. फिर अपने आपका खुद का हलाला करने की सिफारिश एक नमाज़ी परेज़गार असदुद्दीन जैसे जलील कद्र सियासतदां से करे.
लँगूरनियों
और बीजेपी, तशद्दुत पसंद हिन्दुओं
को ये गुमान ना जाने कहाँ से हो गया था की अगर औरत को बुर्क़े पे टी वी के सामने पेश करेंगे तो उसके असरात दीगर मुस्लिम खावतीनों
पे मुवाफ़िक़ पड़ेगें. उसी वक़त इस सहाफी ने अपने एक मज़मून में कह दिया था बुर्का पेहेन के गन्दी, गलीज़ ओछी बात करना हलाला की बात करना इस बात की दलील है की ये औरते ज़मीर फरोश और बाज़ारूं हैं, बुर्का तो इनको सिर्फ नाम के लिए पहनाया गया है. क्योंकि जिस औरत को अपनी इज़्ज़त, मज़हब और शरीयत की एहमियत और एहतेराम मालूम है वो कभी भी अवामी सतह पे अपनी इज़्ज़त को पामाल करने की बात हरगिज़ नहीं करेगी.
१२ मार्च २०२१ की इज़ाफ़त के साथ
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