Thursday, 22 February 2024

ख़ौफ़ज़दा ज़ाफ़रानी हरे को लुभाने लगे।

अज़ीज़ नाज़रीन

जैसे-जैसे ज़ाफ़रानी भारत में पार्लियामेंट इन्तेख़ाब नज़दीक आ रहे हैं, ज़ाफ़रानी दहशत वोट बैंक की सियासत के लिए कुत्ते की तरह इधर-उधर भागता हुआ डरा हुआ दिख रहा है। लेकिन हर जगह इस भगवा जानवर को ज़ोरदार झटका लग रहा है. मुख़ालिफ़ के तौर पर सेक्युलर हिंदू और अक़लियत इसे सियासी अछूत मान रहे हैं।

सूबे शुमाल से ख़बरें आ रहीं हैं कि मुस्लिम वोट बैंक को मज़बूत करने के लिए ज़ाफ़रानी शिद्दत तंज़ीम बीजेपी ने मस्जिदों, मदरसों, दरगाहों और ख़ानकाहों से अपनी मोहीम का आग़ाज़ किया है. जहाँ मस्जिदों, मदरसों, दरगाहों और ख़ानकाहों के बाहर उर्दू में पोस्टर दिखाई दे रहे हैं, "मोदी है तो मुमकिन है।" भाजपा के ज़ाफ़रानी दहशत ने मन की बात का उर्दू तर्जुमे शुरू किया है, ताकी  यह ज़्यादातर मुस्लिम अवाम तक पहुंच सके।

मुस्लिम क़ौम में मौजूद कुछ मुनाफ़िक़ों ने ज़ाफ़रानी दहशत और अवाम के क़साई की सरहाना की। एक बोलता है कि बीजेपी दिलों को मिलाने का अच्छा काम कर रही है. एक और मुनाफ़िक़ बोलता है की ज़्यादातर मुस्लिम दरगाहों, मस्जिदों और मदरसों में जातें हैं, हमने मुस्लिम बरादरी के ज़्यादातर लोगों को बैदार करने के लिए यहां से अपनी मोहीम का आग़ाज़ किया है।

ये सभी मुनाफ़िक़ हैं और सर कलम किये जाने की सज़ा के हक़दार हैं "सरतन से जुदा"। मुख्तार अब्बास, मोहसिन रज़ा, शाहनवाज हुसैन, बासित अली, वसीम रिजवी समेत ये सभी मुनाफ़िक़ एक ही ग्रुप के मेंबर हैं। जो लोग बीजेपी का सरहाना कर रहे हैं.

मोहसिन रज़ा अब मुसलमान नहीं रहा, मैंने उसे लक्ष्मण सीता मंदिर में जाते और रात की तारीकी में पूरे भगवा चोले और पेशानी पर तिलक लगाकर लंगूर चिम्पांज़ी की पूजा करते देखा है।  जब वह यूपी का कैबिनेट में वज़ीर था। अब सवाल यह उठता है सीता और लक्ष्मण की पूजा कर के वोह किस चीज़ को फ़रोग़ दे रहा है।  हनुमान नौकर था जबकी लक्ष्मण और सीता देवर भाभी थे। कहाँ गये राम, क्यों सीता, लखमन और हनुमान। जबकि उसे राम और सीता की परस्तिश करनी थी।  और मियां बीवी के रिश्ते को बढ़ावा देना चाहिए था.   उसने न सिर्फ़ इस्लामी शरीयत के हिसाब से गुनाह ए अज़ीम किया बल्कि हिंदू अफ़सानवी क़िस्सों के हिसाब से भी गुनाह किया है।  उसकी इस तरह की वाहियात और नाज़ेबा हरकत की वजह से ही हो सकता है उसे योगी ने वाज़ारतख़ाने से हकाल पट्टी किया होगा। लेकिन उसके बीजेपी में होने की वजह से हिंदुओं की कोई मज़हबी अक़ीदा नहीं टूटता है. अगर इस तरीक़े का अमल  किसी मुख़ालिफ़ तंज़ीम के फ़र्द ने किया होता तो भाजपा और ज़ाफ़रानी शिद्दत पसन्द तबाही मचा देते।

एक सहाफ़ी होने के नाते मैं यक़ीनन कुछ सवाल बीजेपी और उन सभी मुनाफ़िक़ों से पूछना चाहूंगा जिन्होंने बीजेपी की तारीफ में क़सीदे कसे हैं ब्रद्राने मिल्लत से ज़ाफ़रानी तंज़ीम के लिए वोट करने के लिए कहा। 

१.     ज़ाफ़रानी तंज़ीम के १० साल के दौर ए हुकूमत में मुसलमानों का जो नुक़सान हुआ उसका क्या? मुसलमानों की जान, घर, कारोबार, माश,  मस्जिद, दरगाह, ख़ानक़ाह, मदरसे के नुकसान के बारे में क्या?

२.     उन बेगुनाह मुसलमानों का क्या जो बिना किसी मुकदमे के जेल में हैं।

३.     उन ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों और सियासी नुमाइंदों के बारे में क्या जो मुसलमानों पर फ़िरक़ावाराना तशद्दुत और दहशतगर्दाना हमले भड़काने के मुजरिम हैं। 

        हमारी ब्रदारी पर ज़ुल्म की उन तमाम वाक़ेयात पुलिस और अदालत के दिमाग़ में भाजपा की जानिब से पेवस्त शदीद ज़हर की वजह से तबाह हुए नौजवान मुसलमानों की ज़िन्दगी को हम कैसे भूलेंगे, और तुमको माफ़ करेंगे। ना ही हम उनको फ़रामोश करगें ना ही ज़ाफ़रानी ज़ालिमों को माफ़ करेगें।  

अब मिस्टर ५६ इंची ऐसी बकवास करना बंद करें, हम मस्जिद और मदरसे के लिए अपना सब कुछ क़ुर्बान कर सकतें हैं।  मदरसे, मस्जिद, दरगाह या ख़ानक़ाह से मुसलमानों के लिए कोई पैग़ाम देने की जरूरत नहीं है. हमारा न सिर्फ़ तुम पर बल्कि तुम्हारी इन्तेज़ामियाँ और तुम्हारी अदलिया पर से भी यक़ीन उठ चूका है।  अब तुमको मुसलमानों की फ़लाह के बारे में बोलने की हाजत नहीं है।  अगर कुछ करना है तो अब मुसलमानों के लिए एक और वतन या पाकिस्तान की सरहद की तोहसीह के बारे में बात करो या पूरी तरह से मुसलमानों के लिए एक अलग सूबा।  जिसमे फ़ौज और करेंसी भारतीय होगी लेकिन इन्तेज़ामियाँ, लॉ एंड आर्डर मुसलमानों का होगा।

सहाफ़ी ज़ुबेर

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