ज़ाफ़रानी भारत में ए.आई.एम.आई.एम. के पाकीज़ा सियासी फ़ौजिओं शुमाल फतह करने के बाद ज़ाफ़रानी दहशत की मादर सरज़मीन की जानिब कूच कीजिये। जिस गोधरा को हर बेहेस और मुबाहिसे में हिन्दू शिद्दत पसंद मुस्लिम अवाम और सहाफियों को याद दिहानी करते रहते थे, की गोधरा भूल गए हो तो मुज़्ज़फ़्फ़रनगर याद करो. गोधरा को हिन्दू दहशत और गुलामी से सियासी पाकीज़ा फ़ौजिओं ने फतह कर लिया है। गोधरा बल्दिया ज़ाफ़रानी हाकिमों, दहशत और २५ साल की ज़ाफ़रानी क़त्ले आम, ज़ुल्म, और ग़ुलामी से आज़ाद है। अब जंग शुमाल और मुज़्ज़फ़्फ़रपुर फतह करने की है.
अभी तक ज़ाफ़रानी दहशतगर्द भारत को ग़ुलाम बना कर उस पर हुकूमत कर रहे थे क्योके कांग्रेस और तमाम नो निहाद सेक्युलर ग़द्दार उन ज़ालिमों, मौत के सौदागरों, ज़ाफ़रानी साधू के साथ मौजूद थे। दूसरी बात किसी भी ज़ालिम की तलवार रोकने और उसका हाथ पकड़ कर उसकी ही ज़ुबान में उसको जवाब देने के लिए जिस्मानी क़ुव्वत से ज़्यादा रूहानी क़ुव्वत की ज़रुरत होती है। और जहाँ तक कांग्रेस, सपा, बसपा और दिगर नो निहाद सेक्युलर जमातें हैं वोह तो किसी ज़नखे की मानिंद जंग लड़ने से क़ब्ल ही हथियार डाल देतें हैं। चाहे वोह जंग एवान में किसी मुद्दे पर मुबाहिसा हो या इन्तेख़ाबी मरहले में सियासी हिकमते अमली हो मुखालिफ तंज़ीमें तो जंग लड़ने से क़ब्ल ही ज़ाफ़रानी दहशत और हुकूमत से मरऊब और ख़ौफ़ज़दा हो कर वैसा ही करतें हैं जैसा की ज़ाफ़रानी तंज़ीम चाहती है।
गुजरात जिसको अभी तक ज़ाफ़रानी दहशत ने अवाम को ग़ुलाम बना रखा था जो अब आहिस्ते आहिस्ते ग़ुलामी की ज़ंजीरों को तोड़ने की हिकमते अमली की जानिब गामज़न है। ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों का अब हर मंसूबा तबाह करना होगा। गुजरात के अहमदाबाद बल्दिया ने ऐसा क़ानून नाफ़िज़ करने की बात कही है जिसमे सड़क के किनारे भूने हुए गोश्त और मुर्गे की दुकानों को बंद किया जाएगा। ऐसा ही फैसला राजकोट और बड़ोदा बल्दिया भी लेने वाली है। इन ज़ाफ़रानिओं की ख़बासत महज़ मुस्लिम माश को तबाह करने की है। इनके दिलों दिमाग में ज़हर और आलूद उस हद तक पेवस्त हो चूका है की इनको हर मुद्दे पर मुस्लिम ही याद आतें हैं। गाये, बेल, सांड और गाये के बच्चे को काटने पर यह लोग बोलते हैं की हमारे मज़हबी अक़ीदे पर चोट पहुँचती है। फिर यही ज़ाफ़रानी गुजराती, मारवाड़ी यहाँ तक की जेनी और साधू पंडित खुद ना सिर्फ बकरे के गोश्त बल्कि गाये, बैल का गोश्त कसाब की दूकान से खरीद फरोख्त करते हुए देखे जातें हैं तब इनका मज़हबी अक़ीदा कहाँ चला जाता है।
फिर बड़े जानवर का गोश्त का शोरबा और नल्ली खाते
हुए कई वीडियो वायरल हुए। साधुओं को ज़ाफ़रानी
कपड़ों में वोह सब वीडियो देख कर यह बात साबित हो जाती है की गाये के जाबीहे पर पाबन्दी महज़ सियासी है
उसका मज़हब से कोई ताल्लुक़ नहीं है। फिर अगर
कोई भी ज़ाफ़रानी सियसतदाँ वीडियो को झूठा बोलता है, तो यह सहाफी इस बात की गवाही देता
है और उसने खुद मारवाड़ी, जैनी और गुजराती अवाम को अपने साथ मॉस का सेवन करते देखा है। बल्कि खुद ही गुजराती, मारवाड़ी और जैनी बोलते हैं
खान साहब गोश्त की पार्टी दो। यह बात अलहदा
है की वोह बकरे या मुर्गी का गोश्त खातें हैं।
फिर बात वहीँ आ जाती है जिसका ज़िक्र ज़ाफ़रानी दहशतगर्द कर रहें हैं की अवाम को
भूने हुए गोश्त की खुश्बू से तकलीफ होती है। जब खुद गुजराती, मारवाड़ी, सिंघी, जैनी, हिन्दू जम
के सिका हुआ, शोरबे वाला, मुगलाई, बिरयानी, कबाब खा रहें हैं उनको कोई तकलीफ नहीं होती
तो अवाम की तकलीफ वाला फलसफा तो महज़ ख़बासत साबित हो रहा है। अब बात वही है जब खुद बकरा हलाल होने आ रहा है तो
बरियानी पकेगी भी और सब के अंदर बटेगी भी।
Zuber
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