मोदी का हाल आज ऐसा है जीत कर भी हार गया। एक सिनेमा आई थी "रेस" उसमे जो दरिंदा शैतान डाकू विलेन होता है वोह बोहोत बड़ा व्यापारी और अहंकारी दरिंदा होता है। वोह मैजिक गेम को अपने चमचे व्यापारी दोस्तों को फायदा पहुँचाने के लिये घोड़ों की रेस पर जूआ खेलता है। उसका मुक़ाबला हीरो से होता है। वोह दरिंदा शैतान हीरो के घोड़े की जीत पर खरबों रुपये का दाँव लगा देता है। रेस मे अपने घोड़े को धीरे चलवाता है। हीरो उस दरिंदे के घोड़े से अपने घोड़े को और धीरे करवा देता है। होता वहीं है जो राम को लाया है हम उसको लायेगें। और क़ातिल दरिंदा शैतान जीत जाता है। लेकिन उसने खरबों रुपये का जूआ जो हीरो के घोड़े पर लगा दिया था वोह सब डूब गया। आलिशान महल से निकल कर रोड पर आ गया दिल का दौरा पड़ा सो अलग। उस जीत का जश्न ही नही बना पाया।
जिस तरह विलेन ने हीरो के घोड़े पर दाव लगाया था उसी तरह हीरो ने खरबों डॉलर विलेन के घोड़े की जीत पर लगाए थे। जब विलेन का घोड़ा जीत गया तो वोह तमाम पैसा हीरो को मिला और विलेन के हाथ आया भिकारी का कटोरा।
मोदी जीत कर भी हार गया। भक्तों की ऐसी हालत है ना खुल के हँस पा रहे हैं और ना ही सबके सामने रो पा रहे हैं। उनको ख़ुद को नही समझ आ रहा है ख़ुशी बनाये या सोंग।
वही हाल सियासत के घोड़े पर सवार जीत कर आये मोदी का है। अगर वज़ीर आज़म बन भी जाता है तो उसको ग़ुलाम के जैसे गले मे खीच तान का पट्टा हर वक़्त बँधा रहेगा। वोह कोई भी फेसला ग़ैर क़ानूनी मन माने तरीके से नही ले पायेगा।
जितनी अय्याशी मौज मस्ती जनता के टैक्स पर करना थी कर ली अब पाई पाई का हिसाब देना होगा।
Journalist ज़ुबेर