अज़ीज़ नाज़रीन,
यह बात अब वाज़े हो चुकी है इजराइल की यहूदी दहशत जंग के महाज़ पर हमास, अबू ओबेदा, अल क़ासम, हिज़्बुल्लाह, हूती मुजाहिदों से शाकिस्त खा रही है। इजराइल तक़रीबन जंग हार चूका है और उसके फौजी गले में तख़्तियां टांग कर घूम रहें हैं। हम जंग नहीं कर सकते हम हार चुके हैं।
इतना ही नहीं ऐसे ही बैनर इजराइल
के टेंकों और बख़्तर बंद गाड़ियों में लगे हुए देखे जा सकतें हैं। हाल ही में बरोज़ पीर इजराइल को इस जंग का ज़बरदस्त
झटका लगा जब उसके २५ के क़रीब फौजी एक बारूदी सुरंग फटने से ढेर हो गए। यह बारूद भी इजराइल ने हमास लड़ाकों के लिए बिछाई
थी। लेकिन मालिक ए मुतलक़ को कुछ और ही मंज़ूर
था। जिसने गड्ढा खोदा वोह ख़ुद ही उसका का शिकार
हो गया।
अब आतें हैं असल मुद्दे पर जंग
की इस गहमा गहमी में इजराइल को अपने मुल्क में रहने वाले यहूदिओं और जंगजू की कमी महसूस
होने लगी। कियोंके इस जंग के मद्दे नज़र ज़्यादातर
यहूदी आबादी या तो भाग खड़ी हुई या मारी गई है।
इस ख़सारे को पूरा करने के लिए इजराइल ने भारत जैसे मुफ़लिस फ़क़ीरों के मुल्क से
कुछ १.५ लाख ग़रीब मज़दूरों की ज़रुरत तलब की थी।
कुछ ७००० मज़दूरों ने सूबे शुमाल, हरयाणा, हिमाचल से अपना रजिस्ट्रेशन करवाया
था। और उनमे से अब ५००० का इन्तेख़ाब (सिलेक्शन)
हो चूका है और उनको अपॉइंटमेंट लेटर मिल चूका है।
अब सवाल यहाँ पर बड़ा यह है यहूदी
अवाम अपने आपको दुनियां की आला तरीन क़ौम तसव्वुर करता है। बाक़ी सभी को गुलाम की हैसियत से देखता है। यह रव्वैया उनका आज से नहीं बल्कि बरसों से चला
आ रहा है।
फिर भारत तो उनके नज़दीक एक मुफ़लिस देश है जिसके ग़रीब मज़दूर उनके यहाँ नौकरी करने गये हैं।दूसरी बात जंग जैसे हालात में इजराइल हुकूमत ने बड़ी चालाकी से अपने यहूदी अवाम को बचा लिया और भारत जैसे ग़रीब मुल्क से मज़दूरों के नाम पर जंग में मरने के लिए मज़दूरों को बुलवा लिया। वैसे भी सूबे शुमाल, हरयाणा, हिमाचल, उत्तराखंड में मुफ़लिसी ग़ुरबत अपने उरूज पर है। इन लोगों का होना या ना होना एक जैसा है। भारत में मरे या इजराइल में, है कोई इनके हक़ के लिए आवाज़ उठाने वाला।
आज की तारिख में योगी बड़ी बड़ी बातें करता है लेकिन सबसे ज़्यदा ख़ून ख़ुदकशी रोड हादसे अगर कहीं हो रहें हैं तो वोह सूबे शुमाल में ही हो रहें हैं। अगर उनको उनके ख़ुद के वतन ख़ुद के सूबे ख़ुद की हुकूमत होते हुए कोई पूछ नहीं है तो पराये देश पराये लोगों के सामने क्या पूछ होगी।
इस्लामिक स्टेट के जंगी मरहले में मज़दूरी करने के लिए हरयाणा, शुमाल और बिहार से कई मज़दूर गए थे। अहले ख़ाना को उनकी लाशें भी नहीं मिली बस नाम वापिस आया। उस वक़्त के अमूर ख़ारजा जनरल वी की सींग की क़ियादत में सिर्फ़ नाम वापिस आये। कहने को तो कॉफिन आये थे जिसमे लाशें थी लेकिन उनको देखने की इजाज़त नहीं थी। कॉफिन के ऊपर मज़दूर का सिर्फ़ नाम लिखा था।
तमाम आलम को मालूम है भारत एक नियायत ही ग़रीब मुल्क है जिसका हाकिम एक ऐसा शख्स है जो ज़ालिम तरीन और रियाया को अपना गुलाम समझता है। जो हाकिम ख़ुद अपनी रियाया पर ज़ुल्म करता है वोह दूसरों को भी ऐसा ही करने की तरग़ीब करेगा। पांडव अपनी लुगाई हुकूमत रुपया पैसा सब जुव्वे में हार गए थे आज का हाकिम मज़दूरों और हिंदुस्तान को हरवा रहा है।
जैसा इजराइल हुकूमत ने दावा किया था २४ घंटों में हमास साफ़ वैसा कुछ भी नहीं हुआ। आज जंग को ६ महीनों से ज़ाईद हो गए अमेरिका, ब्रिटेन जैसे आलमी क़ुव्वत के साथ होते हुए ना ही इजराइल अपने क़ैदिओं को वापिस ला पाया ना ही फ़लस्तीनी अवाम का हौसला तोड़ पाया और ना ही जंग में उनको हरा पाया। यह इजराइल के लिए शाकिस्त है।
सहाफ़ी ज़ुबेर की पेशकश