अज़ीज़ नाज़रीन
ज़ाफ़रानी महाज़ ख़ास बीजेपी की आम सक़ाफ़त है की अपने पसंदीदा शख़्स को वतन के असासों बैंकों में डाका डालने की पूरी आज़ादी फ़राहम की जाती है।
जितने भी भगोड़े भारत की बैंकों से क़र्ज़ ले कर भारत से बहार भाग गए उनको भगाने में ज़ाफ़रानी हुकूमत का ज़ाहिरी और पोशीदा हाथ रहा था। वैसे ही गटर की पैदाइश (गटर फेम) बीजीपी का रकून पार्लिअमान सनी देओल को बैंक का ५६ करोड़ का क़र्ज़ ना चुकाने की सूरत ए हाल में नीलामी का नोटिस थमाया था।
कल देर रात ११ बजे तक नीलामी की धूम थी और अल सुबह १२ बजे देर रात पूरे नाटक का किरदार ही बदल गया।
भाजपा रकून ए पार्लिअमान सनी देओल के बंबई के जुहू में स्थित बंगले की नीलामी रोक दी गई है. बैंक ऑफ बड़ौदा ने ई-ऑक्शन का नोटिस वापस ले लिया है. इसकी वजह टेक्निकल बताई जा रही है. वहीं, बैंक ऑफ बड़ौदा के यकायक इस यू-टर्न से सभी हैरान हैं और दीगर भगोड़ों की तर्ज़ पर क्या फिर वतन को ज़बरदस्त ख़सारे की भरपाई आम अवाम के खून निकाल कर हुकूमत करेगी।
अब सवाल यह उठता है की क्या गटर फेम ने अदलिया का दरवाज़ा खटखटाया था या हुकूमत ए हिन्द के दरबार में जा कर हाज़री दी थी या अपने ही देश की बैंक को धमकी दे डाली "यह ढाई किलो का हाथ है" या फिर पाक बस्ती को उजाड़ते उजाड़ते गटर फेम अपने ही वतन को उजाड़ बैठा। बैंक मैनेजर की गर्दन इतनी ज़ोर से दबाई की उसका पिचकड़ा निकल गया और बैंक ने डर की वजह से नीलामी महज़ २४ घंटे के अंदर ही रोक दी और बग़ैर किसी क़ानूनी हुकुम के अपने ही नोटिस को वापिस ले लिया।
यहाँ पर सवाल गुज्जू बैंक और बड़ोदा के ऊपर भी उठता है जैसा की बैंक बोल रही है की नोटिस में तकनीकी ख़ामी थी इसलिए वापिस ले लिया गया। अब जिस बैंक में एक रकून पार्लिआमांन वोह भी जो बीजेपी जैसी खूंखार तंज़ीम से हो उसके नीलामी नोटिस में ख़ामी हो जाती है तो आम अवाम के पैसों के साथ क्या क्या होता होगा।
अगर ख़ामी नहीं थी और गुज्जू बैंक ऑफ़ बड़ोदा ने नीलामी नोटिस तमाम नियमों का पालन कर के गटर फेम को भेजा था तो महज़ १ घंटे के अंदर ऐसा किया हुआ की नोटिस वापिस ले लिया गया। फिर नीलामी नोटिस भेजने से पहले बोर्ड ऑफ़ डिरेक्टर की मीटिंग होती है उस नोटिस पर बेहेस होती है वोटिंग होता है फिर उससे ज़्यादा रद्द करने के मामले में होता है तो महज़ १ घटें में वोह तमाम मीटिंग और पेचीदगी बैंक ने पूरी कर ली थी क्या??
यह सब तो चलता ही रहेगा लेकिन अब आम बैंकों के दिवालियां होने के बाद ज़ाफ़रानी बैंक दिवालियां होंगी और उसके ज़िम्मेदार यह चर्बी वाले ज़ाफ़रानी बकरे ही रहेगें। जो खुद कमायेगें और भारत की वाट लगायेगें।
एक और था बकरा जिसने कश्मीर पर झूठी फरेबी कहानी जनता के दरमियान पेश की खुद अरबों रूपये कमाए और पंडित वैसे के वैसे ही भिकारी रहे। अब यह दुसरे महाशय पाकिस्तान में जा कर झूटी बस्ती उजाड़ दी और हक़ीक़त में अपने ही देश की वाट लगा दी। अब कटोरा किस के हाथ में है। भारत के या पाकिस्तान के।
जिस शख़्स ने चूना लगाया बैंक को कंगाल किया फिर कटोरा तो उस बैंक और उस मुल्क के हाथ में होना चाहिए। कियोंके अब क़र्ज़ वसूलने की ज़िम्मेदारी जनता के कन्धों पर होगी। हुकूमत कटोरा ले कर जनता के ऊपर टेक्स लगाएगी या गर्दन पर तलवार रख कर वसूली करेगी।
गटर फेम हाथ में चाहे नाटक में हैंड पंप उठाये ढाई किलो का हाथ दिखाए या बैल गाडी का पहिय्या उठाये हक़ीक़त में अपने ही देश की अर्थी उठा रहा है। और अवाम है बेवक़ूफ़ जो सिर्फ नाम पाकिस्तान, कश्मीर, मुस्लिम, इस्लाम आते ही सिनिमा घरों की जानिब दौड़ पड़ते हैं।
अरे भाई इतना समझो की वोह सब नाटक है हक़ीकत में यह लोग खूब कमा रहें हैं और ऐसे ही काले धंदे कर कर देश को खोकला कर रहें हैं। तुमको क्या मिल रहा है बाबा जी का टुल्लू।
सहाफ़ी ज़ुबेर