अज़ीज़ नाज़रीन,
इससे पेश्तर इस सहाफी ने अपने कई मज़मूनों में इस बात को मन्ज़रे आम किया है, की जब कभी भी भारत में इन्तेख़ाबी मरहले का आग़ाज़ होता है लंगूर और लँगूरनियों को ज़्यादा ही मशक़्क़त का सामना करना पड़ता है. फिर लँगूरनियों में से कोई मोदी की बाँधी बन अपने नाम के पीछे मोदी का नाम लगाने में फख्र समझती है. नमश्कार में आ ......... ओ मोदी। तो कोई उस बूढ़े शख़्स को टॉनिक पिला पिला कर मसल मसल कर जवान करती है. इतना ही नहीं अवामी चेंनल पर फ़ख्र से बोलती है में कभी कभी थक जाती हूँ और अपने पती को मना कर देती हूँ, नहीं आज नहीं आज बोहोत थक गई. लेकिन आप तो थकते ही नहीं कोई टॉनिक वग़ैरा लेते हो क्या। बस मेरे राजा बस करो......... बोहोत थकाते हो मेरे को. एक चली तो मोदी इश्क़ में इतनी दीवानी हो गई की भारतीय फौज जिसको पाकिस्तान के साथ अगर जंग का माहौल हो तो बड़ी बड़ी मराआत से नवाज़ा जाता है. उसकी शान में कसीदे कसे जाते हैं, लेकिन उसी फौज पर जब चीन के मसले पर मोदी के ऊपर बात आई तो यह मोहतरमा अब फौज को ही कोसने लगी. अपने बूढ़े आशिक़ की जान जो बचाना थी. अवामी चेंनल पर बोल बैठी, अगर चीन की जानिब से दरअंदाज़ी हुई है तो मोदी जी थोड़ी ज़िम्मेदार हैं. वोह तो फौज की नाहेली है और फौज ज़िम्मेदार है. अब मोदी जी थोड़ी सरहद पर जा कर जंग करेगें।
ऐसी ही कुछ चटपटी और इन्तेख़ाबी मरहले से ताल्लुक़ रखने वाली ख़बरों के साथ आपके जानिब हाज़िर हुआ हूँ. नाज़रीन जिस अंदाज़ में इन संघी कीड़ों की वेस्ट बंगाल में धुलाई हुई है सफ़ाई हुई है पिटाई हुई है फिर से इंतेखाब में पिटाई खाने के लिए वही घीसी पीटी हिकमते अमली के साथ आ रहें हैं। कश्मीर, पाकिस्तान, मुसलमान।
लेकिन इस बार पुरानी हिकमते अमली को नए लिबास पहना कर पेश किया जा रहा है. जिस कश्मीर में २०१९ से दफा ३७० मंसूख कर दिया था अब २ साल बाद उसी कश्मीर पर वज़ीरे आज़ाम क्या नया फार्मूला ले कर आएं हैं. आपने कश्मीर में हिंदी घुसा डाली, तमाम आला ओहदो पर दहशतगर्द बिठा दिए, फ़ौज की मिक़्दार पहले से और बढ़ा दी तो अब ऐसी सूरते हाल में आप कश्मीर के सियासतदानों से क्या गुफ्तगू करोगे। आपका हिंदी इश्क़ दिखाई देता है लेकिन क्या यह इश्क़ सिर्फ कश्मीर के लिए है. आपके अपने गुजरात में तो मरकज़ी इदारों में काम काज बोल चाल गुजराती में होती है.
रेलवे हो या बैंक या कोई और मरकज़ी इदारा सभी जगह गुजराती ही चलती है. वैसे ही हर सूबे का अपना निज़ाम होता है. केरला से ले कर तमिलनाडू और कर्नाटक, फिर वेस्ट बंगाल से ले कर महाराष्ट्र हर सूबे की अपनी अलग तहज़ीब है बोली है तो कश्मीर जिसको आप भारत का हिस्सा तस्लीम करते हो उससे इतना ख़ौफ़ज़दा क्यों हो की वहां की बोली तहज़ीब में हिंदी घुसा रहे हो.
दूसरी बात इस मीटिंग का कोई एजेंडा ही नहीं था. क्या नहेली है. वज़ीरे अज़ाम से एक मुतनाज़ा ज़मीन पर मीटिंग और एजेंडा ही फिक्स नहीं। मज़ाक है क्या। कुछ नहीं यह सिर्फ इन्तेख़ाबी स्कीम है. जैसे होली, दिवाली, गूड़ी पड़वा पर बड़ी बड़ी कंपनियां अपने बचे कूचे साल साल दो दो साल पुराने माल को कम क़ीमत में खपा देतें हैं और उसको नाम तेहवारों पर भाव में भारी कमी का नाम देतें हैं, गाहक भी खुश और कंपनी के तो वारे न्यारे जो माल दो साल से पड़ा था उसको खपा दिया। वैसा ही है हर इंतेखाब में कुछ ना कुछ जूनी स्कीम को नया जामा पहना कर अवाम के रू बरू लाया जाता है. उसके ऊपर ज़ाफ़रानी मीडया की नंगी लँगूरनियाँ उस स्कीम पर इंतेखाब तक बवाल मचा कर रख देती हैं. इस बवाल में इनका साथ देतें हैं संघी दहशतगर्द, शिद्दत पसंद हिन्दू और खुद बीजेपी के नुमाइंदे.
फिर इंतेखाब ख़तम वोह मुद्दा ख़तम.
जिस अंदाज़ में जम्मू कश्मीर के मसले पर वज़ीरे आज़म ने कश्मीर के सियसतदांओं की मीटिंग बुलाई है कुछ नहीं वोह इन्तेख़ाबी झुनझुना है. कुछ होने जाने वाला नहीं है. इतना बेवक़ूफ़ तो शायद सिर्फ भक्त और अंध भक्त ही होंगे की मोदी जी अगर सूऊऊररररर से हवा ख़ारिज कर दें तो भी उनको उसमे बदबू नहीं बल्कि खुशबू आएगी। लेकिन दानिशमंद, जानकार, सयासी समझ रखने वाले सहाफी खूब जानतें हैं की कुछ होने जाने वाला नहीं है. सीधी सी बात है जब मुद्दा अदालत की ज़ेरे निगरानी आ जाता है तो कोई भी हिकमते अमली या रज़ा मंदी (Consent terms) करने से पेश्तर दोनों फ़रीक़ों को अदालत को इत्तेला करना होती है. फिर कश्मीर मसला तो आलमी अदालत के ज़ेरे नज़र है. जिसमे भारत पर जंगी जराइम करने, कश्मीरी अवाम की नस्ल कूशी करने मस्तूरातों के साथ ज़िना बिल जब्र गिरोह गर्दाना ज़िना इंसानी हुक़ूक़ की ख़िलाफ़वर्ज़ी
जैसे संगीन इलज़ाम लगे हैं. जो की आलमी बारादरी और अक़वामे मुताहिदा की टीम की जानिब से तहक़ीक़ात में ज़ेरे ग़ौर हैं. फिर पाकिस्तान भी इस मुद्दे में एक फ़रीक़ है उसको फरामोश कर के मसला ये कश्मीर कैसे हल हो सकता है. पाकिस्तान को फरामोश कर ही नहीं सकते।
कुछ नहीं होने वाला ऐसी ही हाय तोबा २०१४ से पेश्तर हर संघी हर शिद्दत पसंद हिन्दू हर बीजेपी वाले ने मचाई थी. मोदी जी को आने दो फिर कश्मीर हमारा होगा। फिर भी कुछ नहीं हुआ तो कश्मीर में हमारी हुकूमत आने दो तो कश्मीर हमारा होगा। उसके बाद ३७० हटा दो तो कश्मीर हमारा होगा। गुजिश्ता ७ सालों में तमाम हथकंडे अपना लिए लेकिन नतीजा सिफर रहा. तो अब अगले इंतेखाब में किस मुँह से अवाम के रू गरू होंगे। फिर वही मरे हुए मुद्दे को नया जामा पहना कर अवाम को बेवक़ूफ़ बनाया जा रहा है.
अभी ज़ाकिर नायक भी याद आ गए, मुस्लिम अवाम साजिश के साथ इस्लाम क़ुबूल करवाने वाले गिरोह का परदा भी फाश हो गया. फिर उस गिरोह के तार पाकिस्तान, खलीज मुमालिकों से भी जुड़ गए. इतना ही नहीं इनके तार दहशतगर्दों से भी जोड़ दिए गए. वह क्या बात है. यह गिरोह पिछले ७-८ सालों से एक्टिव था और करीबन १००० से ज़ाइद अफ़राद को इस्लाम में दाखिल करवा चूका था लेकिन योगी जी मोदी जी अमित जी जैसे जनखों को खबर उत्तर प्रदेश में इंतेखाब से महज़ ७ माह क़ब्ल लगती है. वह क्या बात है. योगी जी आप तो बोहोत ही कुशल अडमिंस्ट्रेटर हो फिर पिछले ५
साल से क्या कर रहे थे. जो अभी आपकी नज़र इन लोगों पर पड़ी.
रज़ाई में सो रहे थे क्या
और आपकी पुलिस को हर चौराहों और नुक्क़ड पर बिठा रखा है.
कुछ नहीं होगा २०१४ ने भी ऐसी ही हाय तोबा की गयी थी, कश्मीर में हुकूमत बनाई तब भी ऐसी ही हाय तोबा की गई थी. ३७० हटाई गई तब भी ऐसी ही हाय तोबा। यह सिर्फ इन्तेख़ाबी हथकंडा है. नतीजा कुछ नहीं निकलेगा। ट्रिपल तलाक़, "का" और NRC पर भी ऐसा ही उधम मचाया था. फिर उन सब का इंतेखाब में लाभ लिया। रही कश्मीर की बात तो कुछ हल नहीं होगा यह सिर्फ चुनावी झुनझुना है जो चुनाव तक संघी, बीजेपी, लंगूर और लँगूरनियों के हाथों खूब बजेगा। चुनाव ख़तम झून्झूने की आवाज़ बंद.
जुबेर